जो अन्न दे वह अन्नदाता,
धन दे वह धनदाता,
जो विद्या दे वह विद्यादाता,
पर जो रक्त दे वह जीवनदाता…
शरीर के सुचारू रूप से कार्य करने के लिए खून की जरूरत होती है। अगर शरीर में खून की कमी हो जाए तो व्यक्ति का जीवन खतरे में पड़ सकता है। इसलिए लोगों से रक्तदान की अपील की जाती है। अगर रक्तदाता दिवस के इतिहास के बारे में बात किया जाये तो इसकी शुरुआत कार्ल लैंडस्टीनर की जयंती के रूप में मनाया जाता है इनका जन्म 14 जून 1968 को हुआ था तथा इन्होंने ए ,बी ,ओ, ब्लड ग्रुप सिस्टम की खोज कर विज्ञान मैं उनके अपार योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार सम्मानित भी किया गया था और सन 2004 में डब्ल्यूएचओ द्वारा पहली बार विश्व रक्तदाता दिवस मनाया गया ताकि लोगों को रक्तदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके और ब्लड बैंकों में पर्याप्त मात्रा में रक्त उपलब्ध हो और तब से ही हर वर्ष 14 जून को रक्तदाता दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इससे पहले ब्लड ट्रांसफ्यूजन बिना ग्रुप के जानकारी में होता था। हालांकि दुनिया का पहला रक्त आधान 1665 में माना जाता है जिसे इंग्लैंड में फिजिशियन रिचर्ड लोअर ने किया था। रिचर्ड ने दूसरे कुत्तों के रक्त को एक कुत्ते में ट्रांसफर करके उसकी जान बचाई थी। कार्ल लैंडस्टीनर ने पता लगाया कि एक व्यक्ति का खून बिना जांच के दूसरे को नहीं चढ़ाया जा सकता है क्योंकि सभी मनुष्य का ब्लड ग्रुप अलग होता है। कार्ल लैंडस्टीनर का तर्क था कि दो व्यक्तियों के विभिन्न ब्लड ग्रुप संपर्क में आने के साथ रक्त अणुओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
1900-1901 दौरान कार्ल लैंडस्टीनर ने इंसानी खून के ए,बी,ओ, रक्त समूह और रक्त में मिलने वाले एक अहम तत्व आरएच फैक्टर की खोज की।
1930 में नोबल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।
अपनी महान खोज के कारण उन्हें ट्रांसफ्यूजन मेडिसन का पितामह भी कहा जाता है।
1818 में, ब्रिटिश प्रसूति विशेषज्ञ जेम्स ब्लंडेल ने सब से पहले रक्तदान की बात किया
कोलकाता, पश्चिम बंगाल में पहला ब्लड बैंक स्थापित किया गया था।
भारत में सबसे पहले रक्तदान लीला मूलगांवकर ने 1954 किया
भारत में सबसे अधिक 248 बार रक्तदान करने वाले शख्स हरीशभाई पटेल हैं|
