वाराणसी, भारतीय ज्ञान-परंपरा की चर्चा काशी और नालंदा के बिना अधूरी है। शनिवार को काशी साहित्य कला उत्सव के मंच–4 पर “काशी और नालंदा: भारतीय ज्ञान-परंपरा के शाश्वत सारस्वत केंद्र” विषय पर आयोजित बौद्धिक संवाद में अतिथि वक्ता प्रो. सिद्धांत सिंह ने काशी और नालंदा को भारतीय सभ्यता की दो ऐसी धुरी बताया, जिनके बिना भारत की सांस्कृतिक आत्मा अधूरी है।
इस अवसर पर काशी को “केवल एक नगर नहीं, बल्कि एक धरा” बताते हुए उसके जीवंत लोकबोध और नालंदा की समृद्ध बौद्धिक परंपरा पर गहन विमर्श हुआ।
प्रो. सिद्धांत सिंह ने कहा कि काशी केवल एक नगर नहीं, बल्कि हर गली में बहता जीवन-दर्शन है, जो ग़मों को सहजता से भुलाना सिखाता है और कठिन समय में संबल बनता है।
उन्होंने इतिहासकारों और विद्वानों के संदर्भ में “बंगाल नाइट” व इलियाडे की प्रेम-कथा जैसी कृतियों का उल्लेख करते हुए काशी को ज्ञान, प्रेम और जिज्ञासा का संगम बताया—एक ऐसी ‘सिटी ऑफ लाइट’, जहाँ साधारण व्यक्ति भी असाधारण सीख दे जाता है और जहाँ ज्ञान हर जगह उपलब्ध है।
नालंदा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि पाँचवीं शताब्दी से उसका उत्कर्ष विश्व-इतिहास में अमिट छाप छोड़ता है। शब्द, शिल्प, तर्क, दर्शन और उद्देश्यपरक अध्ययन का यह केंद्र जैन-बौद्ध परंपराओं के साथ-साथ सभी विचारधाराओं को समेटे रहा—यही भारतीय परंपरा की आत्मा है। इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए 1951 में नवनालंदा बिहार विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
काशी और नालंदा आज के युवाओं को यह संदेश देती हैं कि जीवन को “पूरान से जियो” और ज्ञान को केवल संग्रह नहीं, बल्कि आचरण बनाओ। यही भारतीय संस्कृति का सार है,जहाँ जीवन का उत्सव, ज्ञान की गहराई और करुणा का संतुलन एक साथ चलता है।
