हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा... | The Voice TV

Quote :

"हिम्मत और मेहनत मिलकर हर असंभव को संभव बना देते हैं।"

Editor's Choice

हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा...

Date : 23-Dec-2025

 भारत के राजनीतिक इतिहास में अटल बिहारी वाजपेयी का संपूर्ण व्यक्तित्व शिखर पुरुष के रुप में दर्ज है। उनकी पहचान कुशल राजनीतिज्ञ, प्रशासक, भाषाविद, कवि, पत्रकार व लेखक के रूप में है। अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में उदारवाद, समता एवं समानता के सबसे बड़े समर्थक माने जाते हैं। उन्होंने राजनीति को दलगत और स्वार्थ की वैचारिकता से अलग हट कर अपनाया और उसको जिया। जीवन में आने वाली हर विषम परिस्थिति और चुनौती को स्वीकार किया। नीतिगत सिद्धांत और वैचारिकता का कभी कत्ल नहीं होने दिया। राजनीतिक जीवन के उतार-चढ़ाव में उन्होंने आलोचनाओं के बाद भी अपने को संयमित और तटस्थ रखा। राजनीति में धुर विरोधी भी उनकी विचारधारा और कार्यशैली के कायल थे लेकिन पोखरण जैसा आणविक परीक्षण कर तीसरी दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के साथ दूसरे मुल्कों को भारत की शक्ति का एहसास कराया। आपातकाल के दौरान डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की श्रीनगर में मौत के बाद सक्रिय राजनीति में दखल दिया। हालाँकि, उनके राजनीतिक मूल्यों की पहचान बाद में हुई और भाजपा सरकार में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 25 दिसंबर 1924 को हुआ था। उनके पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी शिक्षक थे। वैसे वे मूलतः उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के बटेश्वर गांव के रहने वाले थे, लेकिन पिता जी मध्य प्रदेश में शिक्षक थे। इसलिए उनका जन्म वहीं हुआ। लेकिन उत्तर प्रदेश से उनका राजनीतिक लगाव सबसे अधिक रहा। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से वे सांसद थे। जबकि उन्हें श्रेष्ठ सांसद और लोकमान्य तिलक पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

कविताओं को लेकर उन्होंने कहा था कि मेरी कविता जंग का एलान है, पराजय की प्रस्तावना नहीं। वह हारे हुए सिपाही का नैराश्य-निनाद नहीं, जूझते योद्धा का जय संकल्प है। वह निराशा का स्वर नहीं, आत्मविश्वास का जयघोष है। उनकी कविताओं का संकलन ‘मेरी इक्यावन कविताएं‘ खूब चर्चित हुई जिसमें....हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा...खास चर्चा में रही।

राजनीति में संख्या बल का आंकड़ा सर्वोपरि होने से साल 1996 में उनकी सरकार सिर्फ एक मत से गिर गई और उन्हें प्रधानमंत्री का पद त्यागना पड़ा। यह सरकार सिर्फ तेरह दिन तक रही। बाद में उन्होंने प्रतिपक्ष की भूमिका निभायी। इसके बाद हुए चुनाव में वे दोबारा प्रधानमंत्री बने। संख्या बल की राजनीति में यह भारतीय इतिहास के लिए सबसे बुरा दिन था लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी विचलित नहीं हुए, उन्होंने इसका मुकाबला किया। 16 मई से 01 जून 1996 और 19 मार्च से 22 मई 2004 तक वे भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे साल 1968 से 1973 तक जनसंघ के अध्यक्ष रहे।

राजनीतिक सेवा का व्रत लेने के कारण वे आजीवन कुंवारे रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया था।

अटल बिहारी वाजपेयी गैर कांग्रेसी सरकार के इतर पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता से भाजपा को देश में शीर्ष राजनीतिक सम्मान दिलाया। दो दर्जन से अधिक राजनीतिक दलों को मिलाकर उन्होंने राजग बनाया। जिसमें 80 से अधिक मंत्री थे, जिसे जम्बो मंत्रिमंडल भी कहा गया। सरकार ने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।

अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में कभी आक्रमकता के पोषक नहीं थे। वैचारिकता को उन्होंने हमेशा तवज्जो दिया।

राजनीति के शिखर पुरुष अटलजी मानते थे कि राजनीति उनके मन का पहला विषय नहीं था। राजनीति से उन्हें कभी-कभी तृष्णा होती थी लेकिन वे चाहकर भी इससे अलग नहीं हो सकते थे। क्योंकि विपक्ष उन पर पलायन का मोहर लगा देता। वे अपने राजनैतिक दायित्वों का डट कर मुकाबला करना चाहते थे।

यह उनके जीवन संघर्ष की भी खूबी रही।

वे एक कुशल कवि के रूप में अपनी पहचान बनाना चाहते थे लेकिन बाद में इसकी शुरुआत पत्रकारिता से हुई।

पत्रकारिता ही उनके राजनैतिक जीवन की आधारशिला बनी। उन्होंने संघ के मुखपत्र पांचजन्य, राष्ट्रधर्म और वीर अर्जुन जैसे अखबारों का संपादन किया। अपने करिअर की शुरुआत उन्होंने पत्रकारिता से की। साल 1957 में देश की संसद में जनसंघ के सिर्फ चार सदस्य थे। जिसमें एक अटल बिहारी वाजपेयी थे। संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंदी में भाषण देने वाले अटलजी पहले भारतीय राजनीतिज्ञ थे। विदेशी धरती पर हिन्दी को सम्मानित करने का काम अटल ने किया।

उन्होंने सबसे पहले साल 1955 में पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़ा लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। बाद में साल 1957 में गोंडा की बलरामपुर सीट से जनसंघ उम्मीदवार के रूप में जीत कर लोकसभा पहुंचे। उन्हें मथुरा और लखनऊ से भी लड़ाया गया लेकिन हार गए। उन्होंने बीस साल तक जनसंघ के संसदीय दल के नेता के रूप में काम किया।

इंदिरा गांधी के खिलाफ जब विपक्ष एकजुट हुआ और बाद में जब देश में मोरारजी देसाई की सरकार बनी तो अटल बिहारी वाजपेयी को विदेशमंत्री बनाया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी राजनीतिक कुशलता की छाप छोड़ी और विदेश नीति को बुलंदियों पर पहुंचाया। बाद में साल 1980 में उन्होंने जनता पार्टी से नाराज होकर पार्टी का दामन छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की। उसी साल उन्हें भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष की कमान सौंपी गयी। इसके बाद साल 1986 तक उन्होंने कुशलता के साथ भाजपा अध्यक्ष पद का नेतृत्व किया और इंदिरा गांधी के कार्यों की सराहना की थी।

उन्होंने इंदिरा सरकार की तरफ से साल 1975 में लगाए गए आपातकाल का विरोध किया लेकिन बांग्लादेश के निर्माण में इंदिरा गांधी की भूमिका को सराहा। उनका साफ कहना था कि जिसका विरोध जरुरी था उसका विरोध किया और जिसकी प्रशंसा चाहिए थी उसे वह सम्मान मिलना चाहिए। वाजपेयी हमेशा से समाज में समानता के पोषक थे। विदेश नीति पर उनका नजरिया साफ था। वह आर्थिक उदारीकरण एवं विदेशी मदद के विरोधी नहीं थे लेकिन वह देशहित के खिलाफ हो ऐसी नीति को बढ़ावा देने के हिमायती नहीं रहे। उन्हें विदेश नीति पर देश की अस्मिता से कोई समझौता स्वीकार नहीं था।

अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की तरफ से दिए गए जय जवान-जय किसान के नारे में अलग से जय विज्ञान भी जोड़ा। देश की सामरिक सुरक्षा पर उन्हें समझौता गंवारा नहीं था। वैश्विक चुनौतियों के बाद भी राजस्थान के पोखरण में 1998 में पांच परमाणु परीक्षण किए। इस परीक्षण के बाद अमेरिका, आस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों की तरफ से भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया गया, लेकिन उनकी दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति इन परिस्थितियों में भी उन्हें अटल स्तंभ के रुप में अडिग रखा। कारगिल युद्ध की भयावहता का भी डट कर मुकाबला किया और पाकिस्तान को धूल चटाई।

दक्षिण भारत के सालों पुराने कावेरी जल विवाद का हल निकाला। इसके बाद स्वर्णिम चर्तुभुज योजना से देश को राजमार्ग से जोड़ने के लिए कारिडोर बनाया। मुख्य मार्ग से गांवों को जोड़ने के लिए प्रधानमंत्री सड़क योजना बेहतर विकास का विकल्प लेकर सामने आयी। कोंकण रेल सेवा की आधारशिला उन्हीं के काल में रखी गई थी। भारतीय राजनीति में अटल बिहारी वाजपेयी एक अडिग, अटल और लौह स्तंभ राजनेता के रूप में आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे। हमें उनकी नीतियों और विचारधराओं का उपयोग करना चाहिए।


RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement