भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के अग्रदूत डॉ. विक्रम साराभाई की पुण्यतिथि 30 दिसंबर को होती है। उनकी मृत्यु सामान्य परिस्थितियों में हुई थी, लेकिन उनके योगदान और देश की परिस्थितियों को देखते हुए इस घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए थे। डॉ. साराभाई न केवल भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक थे, बल्कि वे एक महान वैज्ञानिक भी थे। उनके योगदान के कारण आज हम इसरो जैसी विश्व प्रसिद्ध संस्था का हिस्सा हैं।
उनकी मृत्यु के समय देश में एक खास माहौल था। 1971 में भारत पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजय प्राप्त कर चुका था और बांग्लादेश एक नया राष्ट्र बन चुका था। इस समय भारत परमाणु अप्रसार संधि पर विचार कर रहा था, और किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि अगले दिन डॉ. विक्रम साराभाई के निधन की खबर पूरे देश को शोक में डुबो देगी।
डॉ. साराभाई की मृत्यु तिरुवनंतपुरम के कोवलम बीच स्थित उनके पसंदीदा रिसॉर्ट में हुई थी। उस दिन उन्होंने रूसी रॉकेट का प्रक्षेपण देखा था और थुम्बा रेलवे स्टेशन का उद्घाटन भी किया था। इसके बाद वे बंबई (मुंबई) जाने वाले थे। उसी दिन उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से स्पेस लॉन्च व्हीकल के डिज़ाइन की समीक्षा की थी और एक घंटे बाद उनकी मृत्यु हो गई। बताया जाता है कि उनका निधन हृदयाघात के कारण हुआ था।
इस घटना के बाद एक चौंकाने वाली बात सामने आई। उनके जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति की मृत्यु पर कोई औपचारिक जांच नहीं की गई। उनके नजदीकी सहयोगी, पद्मनाभन जोशी, ने बताया कि डॉ. साराभाई का हमेशा ख्याल रखा जाता था, और उनकी यात्रा के दौरान उनके पास हमेशा एक पूरी टीम होती थी। यह असाधारण सुरक्षा उनके महत्व को दर्शाता था।
साराभाई अपनी मृत्यु से एक दिन पहले तक बिल्कुल स्वस्थ थे। उन्होंने प्रसिद्ध आर्किटेक्ट चार्ल्स कोरिया से समुद्र में तैरने का वादा किया था, और फिर वैज्ञानिकों से मिलकर उन्हें अहमदाबाद जाने का था। उनकी मृत्यु से पहले किसी भी प्रकार की बीमारी का कोई संकेत नहीं था, और उनके परिवार ने इस घटना के बाद पोस्टमार्टम न कराने का फैसला लिया। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई ने अपनी किताब में लिखा कि उन्हें पोस्टमार्टम कराने का कोई कारण नहीं दिखा।
डॉ. साराभाई के योगदान को देखते हुए यह बात भी महत्वपूर्ण है कि उनके परिवार और सहयोगियों ने कभी भी उनकी मृत्यु को संदेहास्पद नहीं माना। फिर भी, उनके काम और विचारों के कारण यह सवाल खड़ा होता है कि उनकी मौत का कारण क्या था।
डॉ. विक्रम साराभाई का जन्म 12 अगस्त 1919 को अहमदाबाद में हुआ था। उनका विचार था कि भारत को अपना अंतरिक्ष कार्यक्रम शुरू करना चाहिए, और उन्होंने इसी दिशा में अथक प्रयास किए। उनके प्रयासों से ही 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना हुई, और वे इसके पहले अध्यक्ष बने। उनका योगदान न केवल भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में, बल्कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अमूल्य था। यही कारण है कि उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक कहा जाता है।
उनकी मृत्यु के बाद, भारत ने जिस तरह से इसरो को आगे बढ़ाया और देश को अंतरिक्ष तकनीक में महान उपलब्धियां हासिल कीं, वह डॉ. साराभाई की दूरदर्शिता और मेहनत का प्रमाण है। हालांकि उनके निधन के समय कई सवाल उठे, लेकिन आज भी उनका योगदान भारत के वैज्ञानिक क्षेत्र में अमिट है।
