रामानन्द सागर बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्तित्व थे, जिनका जन्म 29 दिसम्बर 1927 को अविभाजित भारत के लाहौर ज़िले के असलगुरु नामक ग्राम में एक समृद्ध परिवार में हुआ। उनका मूल नाम चंद्रमौली चोपड़ा था, किंतु नानी द्वारा गोद लिए जाने के बाद उनका नाम रामानन्द रख दिया गया। माता-पिता का सान्निध्य उन्हें नहीं मिल सका, लेकिन नानी के संस्कारों और धार्मिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को गहराई से प्रभावित किया।
1947 के देश विभाजन ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। अपनी जन्मभूमि छोड़कर वे सपरिवार भारत आए। विभाजन के दौरान देखी गई अमानवीय और भयावह घटनाओं ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, जिन्हें उन्होंने बाद में “और इंसान मर गया” नामक संस्मरण में शब्दबद्ध किया। शरणार्थी के रूप में भारत आते समय उनकी जेब में केवल पाँच आने थे, लेकिन भारतीय संस्कृति, धर्म और साहित्य के प्रति अटूट आस्था उनके साथ थी। आगे चलकर यही आस्था रामायण, श्रीकृष्ण, जय गंगा मैया और जय महालक्ष्मी जैसे धार्मिक धारावाहिकों के निर्माण का आधार बनी, जिन्होंने दूरदर्शन के माध्यम से पूरे देश में भक्ति और सांस्कृतिक चेतना का वातावरण बनाया।
रामानन्द सागर बचपन से ही मेधावी थे। मात्र 16 वर्ष की आयु में उनकी गद्य कविता श्रीनगर स्थित प्रताप कॉलेज की पत्रिका में प्रकाशित होने के लिए चुनी गई। सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस उनमें प्रारंभ से था। दहेज प्रथा का विरोध करने पर उन्हें घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद संघर्षपूर्ण जीवन की शुरुआत हुई। पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने ट्रक क्लीनर और चपरासी जैसी नौकरियाँ कीं। दिन में काम और रात में अध्ययन उनके जीवन की दिनचर्या बन गई। उनकी प्रतिभा का परिणाम यह रहा कि उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय से स्वर्ण पदक मिला और फ़ारसी भाषा में दक्षता के लिए ‘मुंशी फ़ज़ल’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता को अपनाया और शीघ्र ही समाचार संपादक के पद तक पहुँचे। लेखन उनका निरंतर कर्म रहा। 1940 के दशक से ही उनका झुकाव फ़िल्मों की ओर था, लेकिन उन्हें औपचारिक पहचान तब मिली जब उन्होंने राज कपूर की सुपरहिट फ़िल्म ‘बरसात’ के लिए कहानी और पटकथा लिखी। स्वतंत्रता के बाद 1950 में उन्होंने “सागर आर्ट कॉरपोरेशन” की स्थापना की और ‘मेहमान’ फ़िल्म से निर्माता के रूप में अपने सफर की शुरुआत की। इसके बाद इंसानियत, कोहिनूर, पैगाम, आँखें, ललकार, चरस, आरज़ू, गीत और बग़ावत जैसी अनेक सफल फ़िल्मों का निर्माण किया।
1985 में उन्होंने टेलीविज़न की दुनिया में कदम रखा और 1980 के दशक में प्रसारित धारावाहिक ‘रामायण’ के साथ उनका नाम घर-घर में प्रसिद्ध हो गया। भगवान राम के जीवन पर आधारित इस धारावाहिक ने टेलीविज़न इतिहास में कीर्तिमान स्थापित किया और भारतीय समाज में अभूतपूर्व सांस्कृतिक जागरण पैदा किया। रामायण की प्रत्येक कड़ी में रामचरितमानस की घटनाओं और पात्रों की उनकी सरल, सरस और भक्तिपूर्ण व्याख्या ने उन्हें एक लोकप्रिय प्रवचनकर्ता के रूप में भी प्रतिष्ठित किया।
रामानन्द सागर ने फ़िल्मों के साथ-साथ अनेक प्रसिद्ध टेलीविज़न धारावाहिकों का निर्देशन और निर्माण किया, जिनमें कृष्णा, विक्रम बेताल, दादा-दादी की कहानियाँ, अलिफ़ लैला और जय गंगा मैया विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उन्होंने 50 से अधिक फ़िल्मों के संवाद लिखे और पत्रकार, साहित्यकार, पटकथा लेखक, निर्माता और निर्देशक—इन सभी भूमिकाओं का अद्भुत समन्वय अपने व्यक्तित्व में किया।
लेखन के क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने 22 छोटी कहानियाँ, तीन वृहत लघु कथाएँ, दो क्रमिक कहानियाँ और दो नाटक लिखे। प्रारंभ में उन्होंने चोपड़ा, बेदी और कश्मीरी जैसे तख़ल्लुसों से लेखन किया, लेकिन बाद में ‘सागर’ नाम से ही उनकी स्थायी पहचान बनी।
उनकी सेवाओं के लिए वर्ष 2001 में उन्हें पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया। फ़िल्म ‘आँखें’ के निर्देशन के लिए उन्हें फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला, वहीं ‘पैगाम’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ लेखक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ।
12 दिसम्बर 2005 की रात मुंबई के एक अस्पताल में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जूहु स्थित श्मशान घाट में उनके बड़े पुत्र सुभाष सागर ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस अवसर पर बड़ी संख्या में कलाकार, निर्माता, निर्देशक और उनके प्रशंसक उपस्थित थे।
उनकी लोकप्रियता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि हरिद्वार में आयोजित धर्मसंसद में संतों और प्रमुख धर्माचार्यों ने उनकी स्मृति में मौन रखा। विश्व हिंदू परिषद ने रामजन्मभूमि आंदोलन में उनके योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि इतिहास में उनका नाम सदैव अमर रहेगा। रामानन्द सागर द्वारा निर्मित और निर्देशित धारावाहिक ‘रामायण’ आज भी भारतीय सांस्कृतिक चेतना का एक उज्ज्वल स्तंभ माना जाता है।
