प्रदूषण अब केवल दिल्ली और एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) की समस्या नहीं है, यह देश के करीब साठ फीसदी इलाके की समस्या बन गया है। दिल्ली में तो वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 450 पार कर चुका है और प्रदूषण को नियंत्रित करने वाले मानक-ग्रैडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (गैप)-चार को पूरे एनसीआर में बार-बार लागू किया जा रहा है। इसे प्रदूषण के मामले में आपात स्थिति माना जाता है। निर्माण कार्य और बड़े वाहनों की आवाजाही रोकने के अलावा लोगों को घरों से बाहर निकलने को एक तरह से सीमित कर दिया जाता है। खासकर बच्चे और साठ साल से ज्यादा उम्र वालों पर इस हालात का ज्यादा असर होता है। सांस की बीमारियों के अलावा अनेक भयावह बीमारियों का सबसे बड़ा कारण प्रदूषण माना जाता है।
अब मुंबई जैसे समुद्र के किनारे बसे महानगर में भी एक्यूआई 150 पार करने पर गैप लागू कर दिया गया है। एक्यूआई का 100 पार हो जाना ही खतरनाक माना जाता है। मुंबई में प्रदूषण का बड़ा कारण बेहिसाब हो रहे निर्माण कार्य और वाहनों की भीड़ माना जा रहा है। दक्षिण भारत के बड़े शहरों के अलावा पुणे, रांची और पहाड़ों पर बसे शहरों के साथ पूरा देश प्रदूषण के भयावह संकट का सामना कर रहा है। यह संकट जितना बड़ा है, समाधान उससे ज्यादा कठिन हो रहा है। अदालतों की फटकार और वैज्ञानिकों के तमाम सुझाव इस संकट को कम नहीं कर पा रहे हैं। अब तो प्रदूषण एक तरह से स्थाई समस्या बन गया है। जाड़ों की सुबह आसमान कोहरे से ढंका रहे, अब यह असंभव लगने लगा है। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के इलाके में सवेरे-शाम ही नहीं दिन-रात के ज्यादातर समय प्रदूषण से ढंका रहने लगा है।
सरकारें चाहे जो दावा करें लेकिन हर साल हालात बदतर होते जा रहे हैं। जिनके बूते में है या जिनके पास विकल्प है, वे इस इलाके से पलायन कर रहे हैं या जाड़े के समय किसी अन्य स्थान पर जा रहे हैं। हालांकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है। ज्यादातर लोग जान जोखिम में रख कर दिल्ली-एनसीआर में जीने को मजबूर हैं। इस भीषण प्रदूषण के कारण अनेक लोगों की जान चली गई और बड़ी तादाद में लोग विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। देश का सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल एम्स इसे मेडिकल इमरजेंसी तक मान चुका है। तभी बार-बार प्रदूषण से लोगों की जान बचाने के लिए गैप-4 लागू किया जा रहा है।
दिल्ली में यह कई साल पहले साबित हो चुका है कि केवल आधे कारों को हर रोज सड़क पर आने से रोकने से वायु प्रदूषण में ज्यादा कमी नहीं आने वाली है दूसरे, सरकारी कुव्यवस्था को झेल रहे सार्वजनिक परिवहन प्रणाली इस बार इस हालत में भी नहीं है कि दिल्ली सरकार इस बार निजी कारों का सम-विषम का फिर से प्रयोग कर सके। दिल्ली की लाइफ लाइन बनी मेट्रो रेल को सामाजिक दूरी के हिसाब से तमाम एहतियात के साथ चलाया जा रहा है। उसे पहले की तरह हर रोज 60 लाख से ज्यादा यात्रियों को यात्रा कराने की क्षमता बनाने अभी समय लगेगा। इतना ही नहीं मेट्रो भी अब कम आय वालों के बूते से बाहर होती जा रही है।
दिल्ली की बेहिसाब आबादी को प्रदूषण का कारण माना जा रहा है। पहले अवैध औद्यौगिक इलाके, एक राज्य से दूसरे राज्य जाने वाले ट्रक-बस आदि के चलते भी दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण बढ़ने का कारण माना जाता था। वैसे अभी भी अवैध उद्योग हैं, भले उनकी संख्या कम हुई है। दिल्ली सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए किसी भी नए उत्पादन ईकाई (मैनिफ्कैचरिंग यूनिट) को लाईसेंस देने पर पाबंदी लगा दी। दिल्ली के चारों ओर ईस्टर्न पेरिफेरियल और वेस्टर्न पेरिफेरियल सड़क बन जाने से दिल्ली होकर एक राज्य से दूसरे राज्य जाने वाले ट्रकों का दिल्ली के भीतर आना कम हुआ है।
देश के कई शहरों और राज्यों में प्रदूषण की यही हालत हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की 60 फीसदी आबादी प्रदूषण से जूझ रही है।
दिल्ली और एनसीआर में रह रहे लोग प्रदूषण नियंत्रण करने की विभिन्न योजनाओं और उपायों से लगातार परिचित होते जा रहे हैं। इनकी फेहरिस्त देखें तो कभी डीजल के वाहनों पर पाबंदी, कभी निर्माण कार्यों पर रोक, कभी स्कूल बंद तो तभी दफ्तरों में घर से काम करने के आदेश से लेकर कोरोना की तरह बेहद जरूरी होने पर ही घर से निकलने की सलाह सरकार दे रही है। किसानों के पराली (फसलों के अवशेष) जलाने पर सजा के प्रावधान से लेकर कारों को सम-विषम चलाने का प्रयोग दिल्ली देख चुकी है। बावजूद इसके हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। लगातार दो साल कोरोना में हजारों अपनों को खोने वाले अब और किसी महामारी को झेलने की हालत में नहीं हैं।
कोरोना प्राकृतिक आपदा थी जबकि प्रदूषण पूरी तरह मानव निर्मित, जो हमारी गलतियों और सरकारों की लापरवाही या गलत नीतियों के चलते समाज को भुगतनी पड़ रही है। वास्तव में प्रदूषण संकट से देश घिरता जा रहा है। लंबे इंतजार के बाद केन्द्र सरकार के बाद दिल्ली में भाजपा की सरकार बनी है। भाजपा ने चुनाव प्रचार में दिल्ली के प्रदूषण का समाधान निकालने का वायदा किया था। अभी तक उस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं दिख रही है। दिल्ली के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने सार्वजनिक रूप से अब तक प्रदूषण कम न करने के लिए माफी मांगी है। उनका कहना था कि सरकार प्रयास कर रही है लेकिन कुछ महीने में सबकुछ ठीक नहीं हो सकता है। दिल्ली सरकार समेत एनसीआर में आने वाले दूसरे राज्यों की सरकारों ने भी आदेश जारी कर प्रदूषण से फौरी राहत दिलाने के प्रयास किए लेकिन इससे न तो वाहनों का सड़क पर आना कम हुआ और न ही प्रदूषण में कोई कमी आती दिख रही है।
पर्यावरण को राजनीतिक मुद्दा के बजाए आम जन के जीवन को बचाने का मुद्दा बनाया जाए। चालू समाधान नहीं स्थायी समाधान तलाशे जाने की जरूरत है। देरी खतरनाक साबित होती जा रही है। स्थिति इतनी विकट है कि इसका समाधान अकेले दिल्ली सरकार के बूते नहीं हो सकता। केन्द्र सरकार के साथ मिलकर दिल्ली के सभी पड़ोसी राज्यों और दिल्ली की नगर निगमों के साथ-साथ दूसरी सरकारी एजेंसियों को साथ लेकर जनता की सक्रिय भागीदारी से इसका समाधान निकाला जा सकता। यह केवल कहने से नहीं होगा, इसे जन भागीदारी से सफल करवाना होगा।
- मनोज कुमार मिश्र
