15 दिसंबर 2025 को सफला एकादशी का पावन व्रत रखा जाएगा। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है कि जो भक्त इस व्रत को विधि-विधान और पूर्ण श्रद्धा के साथ करता है, उस पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। श्रीहरि न केवल उसके कष्टों का नाश करते हैं, बल्कि उसे सम्मान, समृद्धि और सौभाग्य भी प्रदान करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के दौरान राजा महिष्मान के पुत्र लुम्पक की कथा का श्रवण करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
बहुत प्राचीन काल में चम्पावती नाम की नगरी में महिष्मान नामक एक प्रतापी राजा शासन करता था। उसके चार पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र लुम्पक अत्यंत दुराचारी और पाप कर्मों में लिप्त था। वह अनुचित आचरण, अनैतिक कार्यों और गलत संगति में लीन रहकर अपने पिता की संपत्ति का दुरुपयोग करता था। साधु-संतों, ब्राह्मणों और भगवान के भक्तों की निंदा करना उसे सुख देता था। उसकी करतूतों से नगर की प्रजा त्रस्त थी, किंतु राजकुमार होने के कारण कोई भी उसके विरुद्ध बोलने का साहस नहीं कर पाता था।
एक दिन राजा को जब अपने पुत्र के कुकर्मों का ज्ञान हुआ तो वह अत्यंत क्रोधित हो उठा और उसने लुम्पक को राज्य से बाहर निकाल दिया। निर्वासित होने के बाद लुम्पक असमंजस में पड़ गया कि अब वह कहां जाए और कैसे जीवित रहे। अंततः उसने यह निश्चय किया कि दिन में वह राज्य से बाहर रहेगा और रात के समय चोरी करने के लिए नगर में प्रवेश करेगा। वह लोगों को भयभीत करता, हिंसा करता और वन में जाकर निर्दोष जीवों का शिकार करता। कई बार पकड़े जाने पर भी राजपुत्र होने के कारण पहरेदार उसे छोड़ देते थे।
कहा जाता है कि कभी-कभी मनुष्य अनजाने में भी ईश्वर की कृपा प्राप्त कर लेता है। लुम्पक के जीवन में भी ऐसा ही हुआ। वह जिस जंगल में रहता था, वह भगवान को अत्यंत प्रिय माना जाता था। उस वन में एक प्राचीन पीपल का वृक्ष था, जिसे देवताओं का निवास स्थल माना जाता था। उसी वृक्ष के नीचे लुम्पक का ठिकाना था। पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को, वस्त्रों के अभाव में, कड़ाके की ठंड से वह मूर्छित हो गया। पूरी रात वह पीड़ा से जूझता रहा, न सो सका और उसके अंग शिथिल हो गए।
अगली सुबह भी वह अचेत अवस्था में पड़ा रहा। एकादशी के दिन दोपहर के समय जब सूर्य की किरणों से कुछ गर्माहट मिली, तब उसे होश आया। अत्यंत दुर्बल अवस्था में वह भोजन की तलाश में उठा, किंतु उस दिन शिकार करने में असमर्थ रहा। उसने धरती पर गिरे कुछ फल एकत्र किए और पीपल के वृक्ष के पास पहुंच गया। फल उसे अच्छे नहीं लगे, इसलिए उसने उन्हें वृक्ष की जड़ों के समीप रख दिया और अत्यंत व्यथित होकर ईश्वर को समर्पित करते हुए बोला कि ये फल वह प्रभु को अर्पित करता है। इसके बाद वह रोने लगा और पूरी रात जागते हुए बिताई।
इस प्रकार अनजाने में ही उससे एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण संपन्न हो गया। उसके इस अनजाने तप से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उसके समस्त पाप नष्ट हो गए। अगले दिन प्रातःकाल एक दिव्य रथ प्रकट हुआ और उसके सामने आकर ठहर गया। उसी समय आकाश से वाणी हुई कि भगवान नारायण की कृपा से उसके सारे दोष मिट चुके हैं और अब वह अपने पिता के पास लौटकर राज्य का अधिकारी बने।
यह सुनकर लुम्पक आनंद से भर गया, उसने प्रभु का स्मरण किया, दिव्य वस्त्र धारण किए और अपने पिता के पास जाकर सारी घटना सुनाई। पुत्र की कथा सुनकर राजा का हृदय परिवर्तित हो गया। उन्होंने राज्य का भार लुम्पक को सौंप दिया और स्वयं वन की ओर प्रस्थान कर भगवान की भक्ति में लीन हो गए। समय आने पर उन्होंने मोक्ष की प्राप्ति की।
इस कथा के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ सफला एकादशी का व्रत करता है, उसके जीवन से पापों का अंत हो जाता है और अंततः उसे मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। जो लोग इस एकादशी के महत्व को नहीं समझते, उन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से अज्ञान माना गया है। इस व्रत की कथा का पाठ या श्रवण करने से मनुष्य को महान यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।
