सनातन परंपरा में मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का विशेष महत्व माना गया है। यह तिथि मोक्षदा एकादशी व्रत के साथ-साथ गीता जयंती के रूप में भी मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान प्रदान किया था, जिसे हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र, पूजनीय और जीवन-मार्गदर्शक ग्रंथ माना जाता है।
गीता जयंती का धार्मिक महत्व
गीता को हिंदू धर्म का सर्वोच्च आध्यात्मिक ग्रंथ माना जाता है, जिसके उपदेश आज भी जीवन की चुनौतियों का मार्ग दिखाने में सहायक हैं। यह धर्म, कर्म, भक्ति और ज्ञान का समन्वय है। श्रीकृष्ण के संदेश व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य का पालन करते हुए धर्म के मार्ग पर अडिग रहने की प्रेरणा देते हैं। वास्तव में गीता जीवन की हर समस्या का समाधान प्रस्तुत करती है और मनुष्य को संतुलित, जागरूक एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की दिशा दिखाती है।
गीता के प्रथम श्लोक का मर्म
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।।”
गीता के पहले श्लोक के प्रथम दो शब्द—धर्मक्षेत्रे और कुरुक्षेत्रे—पूर्ण गीता का सार समेटे हुए हैं। इसका संदेश है कि जीवन के हर क्षेत्र में धर्म का अनुसरण किया जाना चाहिए। श्रीकृष्ण बताते हैं कि धर्म ही मनुष्य का सच्चा रक्षक, स्वामी, माता, पिता और मित्र है, इसलिए किसी भी परिस्थिति में धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
श्रीकृष्ण द्वारा गीता में दिए गए प्रमुख संदेश
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“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”
अर्थात मनुष्य को केवल कर्म करने का अधिकार है, फल पर नहीं। इसलिए उसे कर्तव्य समझकर निष्काम भाव से कर्म करना चाहिए। -
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत”
यानी जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब-तब भगवान स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं।
गीता जयंती का पर्व हमें स्मरण कराता है कि धर्म, कर्तव्य और सत्य के मार्ग पर चलकर ही जीवन में स्थायी शांति, सफलता और आत्मिक कल्याण प्राप्त किया जा सकता है।
