- डॉ. सत्यवान सौरभ
हिंदी सिनेमा ने अपने लंबे सफर में कई सितारों को जन्म दिया पर उनमें कुछ ऐसे हैं जिनकी रोशनी समय के साथ कम नहीं होती बल्कि हर पीढ़ी की आँखों में एक नई चमक लेकर जीवित रहती है। धर्मेंद्र उन्हीं दुर्लभ सितारों में से थे, जो सिर्फ अभिनेता नहीं बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक ताने-बाने का हिस्सा बन चुके थे। उनका जाना एक ऐसी खामोशी छोड़ गया है, जिसे शब्दों में बाँध पाना मुश्किल है। वे सिर्फ पर्दे पर दिखने वाली एक छवि नहीं थे; वे ऐसे इंसान थे, जिनकी गर्माहट और विनम्रता ने दर्शकों को अपने परिवारों के किसी सदस्य की तरह उनसे जोड़ दिया था।
धर्मेंद्र की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं। पंजाब के एक छोटे से गांव नसराली से शुरू हुई यह यात्रा संघर्ष, मेहनत और सपनों की शक्ति का जीवंत उदाहरण है। एक साधारण किसान परिवार में जन्मा लड़का जब फिल्मों की दुनिया की चमक-दमक में पहुंचता है, तो आमतौर पर व्यक्ति अपनी मूल पहचान खो बैठता है लेकिन धर्मेंद्र ऐसे नहीं थे। उन्होंने अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। वही सादगी, वही देसीपन, वही अपनापन उनकी हर मुस्कान में दिखाई देता था। यही कारण है कि वे सिर्फ ‘स्टार’ नहीं बने, वे ‘दिलों का हीरो’ बने।
1960 के दशक में जब उन्होंने सिनेमा के परदे पर कदम रखा, तब दर्शकों ने यह अंदाज़ा नहीं लगाया होगा कि यह युवक अगले कई दशकों तक हिंदी फिल्मों का सबसे प्रिय चेहरा बनने वाला है। शुरुआत भले धीमी रही हो, पर उनकी आँखों में मौजूद मासूमियत और व्यक्तित्व में छिपा गहरा आत्मविश्वास बहुत जल्द ही लोगों के दिलों तक पहुँच गया। उनकी शुरुआती फिल्मों ने यह दिखाया कि उनमें संवाद की सरलता, भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति और अपने किरदार के प्रति ईमानदार दृष्टिकोण जैसी विशिष्ट खूबियाँ हैं।
समय के साथ धर्मेंद्र ने दिखाया कि वे सिर्फ एक रोमांटिक हीरो नहीं बल्कि हर शैली में फिट बैठने वाले अभिनेता हैं। उन्होंने अभिनय के हर रंग को जीया- रोमांस की कोमलता, कॉमेडी की सहजता, एक्शन की तीव्रता और भावुक दृश्यों की गहराई। "अनुपमा" और "अनपढ़" में उनकी रोमांटिक छवि दर्शकों का दिल चुरा लेती थी तो "मेरा गांव मेरा देश" और "शोले" में उनका एक्शन नुमा अंदाज़ उन्हें ‘ही-मान’ की उपाधि दिलाता था। यह उपाधि किसी फैशन के कारण नहीं बल्कि उनके स्वाभाविक दृढ़ व्यक्तित्व का प्रमाण थी।
“शोले” का वीरू भारतीय सिनेमा के इतिहास का वह चरित्र है, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं। वीरू की मस्ती, दोस्ती, बेफिक्री और दिल की गहराई ने इस किरदार को अमर बना दिया। धर्मेंद्र कोई भूमिका निभाते नहीं थे, वे उसे जीते थे। यही कारण है कि वीरू आज भी दर्शकों के चेहरों पर मुस्कान ला देता है। लेकिन धर्मेंद्र का जादू सिर्फ वीरू तक सीमित नहीं था। “चुपके चुपके” में उनकी गंभीर-स्वभाव वाली कॉमेडी यह साबित करती है कि हास्य अभिनय हमेशा उछल-कूद या अतिरंजना से नहीं आता; वह शालीनता और समयबद्ध संवादों से भी पैदा हो सकता है। धर्मेंद्र इस बात का जीता-जागता उदाहरण थे।
उनके अभिनय का आधार हमेशा ‘सच्चाई’ रहा। वे अभिनय नहीं करते थे, वे सत्य को अभिव्यक्त करते थे। यह सत्य कभी प्रेम की कोमलता के रूप में जागता था, कभी संघर्ष की तल्ख़ी के रूप में। आज के समय में जब अभिनय तकनीक और बाहरी सजावट पर अधिक निर्भर होता जा रहा है, धर्मेंद्र हमें याद दिलाते हैं कि अभिनय का सबसे बड़ा केंद्र ‘दिल’ होता है। यही वह विशेषता है, जिसने उनकी फिल्मों को समय की सीमाओं से मुक्त कर दिया।
धर्मेंद्र की एक और महानता थी- जमीन से उनका जुड़ाव। उन्होंने कभी खुद को महान या बड़ा साबित करने की कोशिश नहीं की। सैकड़ों फिल्मों की सफलता, लाखों प्रशंसक और दशकों की लोकप्रियता के बाद भी वे साधारण ग्रामीण की तरह बात करते थे। उनकी विनम्रता किसी बनावटी विनम्रता का परिणाम नहीं थी; वह उनके स्वभाव का हिस्सा थी। यही कारण है कि वे उद्योग के भीतर और बाहर-दोनों जगह समान आदर के पात्र बने रहे।
धर्मेंद्र ने अपनी निजी और राजनीतिक जिंदगी में भी अपने मूल्यों को नहीं छोड़ा। वे वर्ष 2004 में लोकसभा के लिए चुने गए और अपने तरीके से जनता की सेवा की। हालाँकि वे राजनीति में गहराई से सक्रिय नहीं रहे लेकिन यह साफ समझ आता है कि वे समाज के प्रति एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में अपनी भूमिका को समझते थे। उनका चरित्र उतना ही सीधा और स्पष्ट था जितना उनका अभिनय।
उनकी जीवनशैली की सादगी ने भी लोगों को हमेशा प्रभावित किया। मुंबई की भीड़भाड़ से दूर उनका फार्म हाउस, धरती पर काम करना, खेतों को सींचना, पशुओं के साथ समय बिताना- ये सब उनकी आत्मा को सुकून देते थे। यह उस अभिनेता की तस्वीर है जो चमकते पर्दे से परे, असली जिंदगी में प्रकृति की गोद में अपने आप को पूरा महसूस करता था। यह गुण किसी अभिनेता में शायद ही देखने मिलता हो।
उनका योगदान सिर्फ उनके समय तक सीमित नहीं। आज की पीढ़ी भी धर्मेंद्र की फिल्मों में वही ताजगी, वही मानवीय संवेदना और वही संवाद शक्ति महसूस करती है, जो 40-50 साल पहले दर्शक महसूस करते थे। यह बहुत कम कलाकारों के हिस्से आता है कि उनकी फिल्मों की ताकत पीढ़ियों की सीमाएँ लांघ जाए। धर्मेंद्र यह विरासत अपने साथ लेकर नहीं गए; वे इसे समाज में छोड़ गए हैं।
आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं तो उनके चेहरे की वह सहज मुस्कान तुरंत आँखों के सामने आ जाती है। ऐसा लगता है जैसे वह अभी भी किसी दृश्य की तैयारी कर रहे हों या किसी इंटरव्यू में अपनी प्रसिद्ध विनम्रता के साथ कह रहे हों- “अरे, मैं कौन-सा बड़ा कलाकार हूँ, बस अपनी कोशिश करता हूँ।” उनकी यह बात ही उन्हें बड़ा बनाती थी।
धर्मेंद्र का जाना भारतीय सिनेमा के लिए सिर्फ एक कलाकार की विदाई नहीं; यह एक युग का अवसान है। वह युग जिसमें सादगी, भावनाएँ और मानवीयता अभिनय की रीढ़ हुआ करती थीं। वह दौर जब सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि समाज, परिवार और रिश्तों का आईना होता था। धर्मेंद्र उस आईने की सबसे चमकदार किरण थे। हर महान कलाकार की तरह धर्मेंद्र भी यह सिद्ध करके गए हैं कि शरीर भले चला जाए, कला कभी नहीं जाती। उनकी आवाज़, उनकी हँसी, उनकी आँखों की चमक, उनकी फिल्मों के दृश्य- यह सब कहीं न कहीं हमारे भीतर जीते रहेंगे। वह इसलिए नहीं कि उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया बल्कि इसलिए कि उन्होंने लोगों के दिलों में जगह बनाई। सिनेमा की असली शक्ति यही है- जब दर्शक अभिनेता को सिर्फ अभिनेता न मानकर परिवार का हिस्सा मानने लगे।
आज, जब हम श्रद्धांजलि देते हुए यह पंक्ति याद करते हैं- “अभी न जाओ छोड़ के…”- तो यह सिर्फ एक गीत की पंक्ति नहीं रह जाती। यह एक युग की पुकार जैसी लगती है। लेकिन महान कलाकार कभी सचमुच नहीं जाते। धर्मेंद्र भी नहीं गए। वे हमारे गीतों में हैं, संवादों में हैं, फिल्मों में हैं और सबसे बढ़कर हमारे दिलों में हैं। भारतीय सिनेमा के उस ‘ही-मान’ को शत-शत नमन, जिसकी सादगी ने हमें इंसान होना सिखाया और जिसकी मुस्कान ने पीढ़ियों को जीवन की सुंदरता का एहसास कराया।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
