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देश के प्रति जिम्मेदारी के भाव को सशक्त बनाना ही संघ का उद्देश्य : मोहन भागवत

Date : 08-Nov-2025

बेंगलुरु, 8 नवंबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने शनिवार को कहा कि मुस्लिम और क्रिश्चियन को जानबूझकर यह विश्वास दिलाया गया है कि वह हिंदुओं से अलग हैं, जबकि पूर्वज सभी के समान हैं और परंपरागत चिंतन भी एक जैसा है। उन्हें कई मुस्लिम और क्रिश्चियन मिले हैं जो अपना गोत्र भी बताते हैं।

डॉ. भागवत संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत यहां आयोजित दो दिवसीय (8 एवं 9 नवंबर) व्याख्यानमाला को संबोधित कर रहे थे। इसका आयोजन यहां के बनशंकरी स्थित होसाकेरेहल्ली रिंग रोड पर पीईएस विश्वविद्यालय में किया गया है। पहले दिन विभिन्न राज्यों के लगभग 1,200 प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत वंदे मातरम् से हुई।

सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और हिंदू होने का अर्थ है देश के प्रति जिम्मेदार होना। उन्होंने कहा कि विविधता का सम्मान करते हुए एकता बनाए रखना भारत की खूबसूरती है। विविधता हमारी सजावट है। उन्होंने कहा कि “बीइंग हिंदू, आय रिस्पॉन्सिबल फॉर भारत।” भारत एक हिंदू राष्ट्र है और संघ का कार्य इसी भावना को सशक्त करना है। संघ आज बड़ा हुआ है, पर हम संतुष्ट नहीं हैं। हमारा उद्देश्य पूरे समाज को एक सूत्र में बांधना है।

डॉ. भागवत ने कहा कि इतने वर्षों में संघ के विरोध में बहुत कुछ कहा गया, परंतु विरोध केवल मुख से रहा, दिलों में नहीं। हम जब समाज में घूमे तो कोई विरोधी नहीं मिला। हम सेवा के लिए आए हैं और अब समाज इस पर विश्वास कर रहा है। उन्होंने कहा कि विरोधी भी हमारे लिए उपयोगी हैं, जैसे निंदक नियरे राखिए।

संघ के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि यह संस्था अद्वितीय है, जिसकी तुलना किसी अन्य संगठन से नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि संघ किसी प्रतिक्रिया से नहीं जन्मा। वर्ष 1857 की क्रांति के बाद यह विचार किया गया कि थोड़े लोग हम पर शासन कैसे कर रहे हैं। इसमें डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार भी शामिल थे। डॉ. हेडगेवार ने 1916-17 से इस दिशा में प्रयोग शुरू किए और 1925 में संघ के रूप में यह सामने आया। वर्ष 1939 तक कार्यकर्ताओं ने इसे एक सिद्ध मॉडल के रूप में स्वीकार किया।

संघ प्रमुख डॉ. भागवत ने कहा कि व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र दोनों आवश्यक हैं। इसी विचार से शाखा की परंपरा बनी- एक घंटे के अभ्यास के माध्यम से व्यक्ति और समाज दोनों का निर्माण। उल्लेखनीय है कि संघ ने 02 अक्टूबर 2025 को अपने 100 वर्ष पूर्ण किए हैं। शताब्दी वर्ष के दौरान देशभर में व्याख्यानमालाएं, युवा सम्मेलन, सामाजिक सद्भाव कार्यक्रम और संवाद शृंखलाएं आयोजित की जा रही हैं, जिनका उद्देश्य समाज के सभी वर्गों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में जोड़ना है।


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