कुष्ठ रोग निवारण के पथिक: बाबा आमटे | The Voice TV

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कुष्ठ रोग निवारण के पथिक: बाबा आमटे

Date : 07-Feb-2025

बाबा आमटे, एक महान समाजसेवी और मानवता के पुजारी, का जन्म 26 दिसंबर 1914 को महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के आनंदवन में एक संपन्न देशस्थ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता, देवीदास आमटे, ब्रिटिश शासन के अंतर्गत हिंगणघाट में सरकारी अधिकारी थे। बाल्यकाल में ही उन्हें "बाबा" उपनाम मिला, और वह अपने आठ भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। एक समृद्ध ज़मींदार परिवार से आने के बावजूद, उन्होंने समाज में व्याप्त वर्गभेद और असमानता को गहराई से अनुभव किया।

बाबा आमटे ने विधि की पढ़ाई पूरी कर वर्धा में एक सफल कानूनी व्यवसाय स्थापित किया। लेकिन उनका मन केवल वकालत तक सीमित नहीं रहा। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए और 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में गिरफ्तार नेताओं के बचाव वकील के रूप में कार्य किया। सेवाग्राम आश्रम में गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने सत्य, अहिंसा और सेवा का मार्ग अपनाया। महात्मा गांधी ने उनके अदम्य साहस से प्रभावित होकर उन्हें "अभय साधक" यानी सत्य का निडर साधक कहा।

एक दिन बाबा आमटे की मुलाकात कुष्ठ रोग से ग्रस्त तुलसीराम नामक व्यक्ति से हुई। पहले तो वह भयभीत हुए, लेकिन इस घटना ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने महसूस किया कि समाज में कुष्ठ रोगियों के प्रति गहरी उपेक्षा और अज्ञानता है। इस भ्रांति को दूर करने के लिए उन्होंने स्वयं अपने शरीर में कुष्ठ रोग के जीवाणु इंजेक्ट कर लिए, यह सिद्ध करने हेतु कि यह रोग उतना संक्रामक नहीं है जितना लोग समझते हैं।

कुष्ठ रोगियों के पुनर्वास और आत्मनिर्भरता के लिए उन्होंने 1949 में "आनंदवन" की स्थापना की। यहाँ उन्होंने पीड़ितों के लिए चिकित्सा सुविधाएँ, व्यावसायिक प्रशिक्षण और हस्तशिल्प उद्योगों की शुरुआत की, जिससे वे सम्मानजनक जीवन जी सकें। बाद में महाराष्ट्र में दो और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना कर उन्होंने कुष्ठ रोगियों, विकलांगों और समाज के उपेक्षित वर्गों के जीवन को नवजीवन दिया।

1985 में बाबा आमटे ने शांति और सामाजिक एकता का संदेश देने के लिए "निट इंडिया मिशन" शुरू किया, जिसके तहत उन्होंने 72 वर्ष की उम्र में कन्याकुमारी से कश्मीर तक 3000 मील की पदयात्रा की। इसके अलावा, उन्होंने 1990 में "नर्मदा बचाओ आंदोलन" से जुड़कर सात वर्षों तक नर्मदा नदी के किनारे रहकर पर्यावरण संरक्षण और विस्थापन के खिलाफ संघर्ष किया।

बाबा आमटे के अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं:

  • पद्मश्री (1971)
  • डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार
  • गांधी शांति पुरस्कार
  • रेमन मैग्सेसे पुरस्कार
  • टेम्पलटन पुरस्कार
  • जमनालाल बजाज पुरस्कार

उन्हें "भारत के आधुनिक गांधी" के रूप में भी जाना जाता है।

9 फरवरी 2008 को बाबा आमटे का महाराष्ट्र के आनंदवन में निधन हो गया। उनका संपूर्ण जीवन सेवा, समर्पण और मानवता की सच्ची मिसाल है। उन्होंने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार दिलाया और सेवा की जोत को जीवनभर जलाए रखा। उनका कार्य और विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे।

 


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