6 जनवरी विशेष : अंग्रेजी वातावरण के बीच हिन्दी साहित्य की प्रतिष्ठापना का अभियान चलाया : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का निधन
Date : 06-Jan-2025
6 जनवरी 1885 : सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का निधन
अंग्रेजी राज से भारत की मुक्ति केलिये एक ओर सशस्त्र और अहिसंक आँदोलन हुये वहीं सामाजिक और साहित्यिक जागरण के अभियान भी चले । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने 1857 की क्राँति की असफलता के बाद समाज का मनोबल बढ़ाने केलिये हिन्दी जागरण का अभियान चलाया ।
परिवार ने उनका नाम हरिश्चन्द्र ही रखा था । साहित्य की अद्भुत साधना केलिये उन्हें "भारतेन्दु" अर्थात "भारत का चन्द्र" उपाधि से विभूषित किया गया । उन्होंने अपने सम्मान को नाम के आगे लिखा और "भारतेन्दु हरिश्चन्द्र" के नाम से प्रसिद्ध हुये। उन्होंने जब होश संभाला तब भारतीय समाज जीवन, हिन्दी साहित्य, और हिंदी भाषा विषमता से गुजर रही थी । 1857 की क्रान्ति की असफलता के बाद समाज का मनोबल टूटा हुआ था । विदेशी लेखक ही नहीं अनेक भारतीय मनीषी भी अंग्रेजी में साहित्य रचना करने लगे थे। ऐसे वातावरण में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी ने होश संभाला। और स्वभाषा में रचना करने का अभियान चलाया । उन्होंने स्वयं भी अवधी, ब्रज भाषा और हिन्दी विशेषकर खड़ी बोली में साहित्य रचना आरंभ की अपितु अन्य लेखकों को भी प्रोत्साहित किया । साहित्य जगत के गरिमामय जिस स्थान पर आज हिन्दी खड़ी बोली प्रतिष्ठित है । इसमें भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी महत्वपूर्ण योगदान है । घर में साहित्य का वातावरण था इसका प्रभाव उनके आँख खोलते ही पड़ा। वे बचपन से तुकबंदी करके कविता करने लगे और आसपास घटी घटनाओं की कहानी बनाकर सुनाने लगे थे । सात वर्ष की आयु तक उनकी रचनाएँ परिष्कृत होने लगीं थीं । ये रचनाएँ उपलब्ध भी हैं। उन्होंने गद्य, पद्य, कहानी और व्यंग ही नहीं, नाटक भी लिखे । उन्हें आधुनिक नाट्य रचना का पितामह कहा जाता है। उनकी रचनाओं में तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति में समाज जीवन के वातावरण दासत्व एवं गरीबी का दर्द, शोषण की असहनीयता और पिछड़ेपन पर समाज का ध्यानाकर्षण है । उन्हें नव जागरण का कल्पनाकार भी माना जाता है । उनकी जीवन यात्रा कुल पैंतीस वर्ष की रही । अपनी इस अल्पजीवन यात्रा में भारतेन्दु जी ने संसार के सामने लगभग सभी साहित्य विधाओं पर इतनी रचनाएँ की, इससे लगता है वे प्रकृति से अतिरिक्त प्रज्ञा लेकर संसार में आये थे ।
ऐसे विलक्षण और दूरदर्शी साहित्य विधा के पुरोधा पुरुष भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का जन्म 9 सितंबर 1850 को उत्तर प्रदेश के बनारस नगर में हुआ था । घर में बालक ने जन्म लिया तो परिवार ने नाम हरिश्चन्द्र रखा । आर्थिक रूप से उनके परिवार की पृष्ठभूमि बहुत समृद्ध थी । बनारस के प्रमुख धनी परिवारों में गणना होती थी। पिता गोपाल चन्द्र भी अपने समय के प्रसिद्ध कवि थे । घर में हिन्दी और साहित्य दोनों का वातावरण था । बालक हरिश्चन्द्र बचपन से ही बहुत कुशाग्र बुद्धि और कल्पनाशील थे । उनकी स्मरण शक्ति भी अद्भुत थी । जब पांच वर्ष के हुये तो माता का निधन हो गया । इनकी देखभाल दादी ने की । और जब दस वर्ष के हुये तो पिता का भी निधन हो गया । वे बालवय से ही कविता लेखन करने लगे थे । यह उनकी विलक्षण प्रतिभा ही थी कि वे किशोर वय में ही 'बाल विबोधिनी' पत्रिका, 'हरिश्चंद्र पत्रिका' और 'कविवचन सुधा' पत्रिकाओं के संपादन से जुड़ गये थे । उन्होंने केवल अठारह वर्ष की आयु में "कवि वचन सुधा"' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर दिया था । उस समय के भारत के ऐसे कोई प्रतिष्ठित विद्वान और साहित्यकार नहीं जिनकी रचनाएँ इस पत्रिका में प्रकाशित न हुई हों। भारतेन्दु जी को भारत की विविध भाषाओं का ज्ञान था । इनमें अवधि, ब्रजभाषा, बंगला, मराठी, गुजराती, उर्दु और संस्कृत भाषा भी थी । उनका साहित्य लेखन लगभग सभी भाषाओं में हुआ । लेकिन हिन्दी खड़ी बोली और ब्रजभाषा में अधिक। उन्होंने केवल सत्रह वर्ष की आयु में बंगला भाषा के लोकप्रिय नाटक "विद्या सुन्दर" का खड़ी बोली में अनुवाद किया था । इसका भी मंचन हुआ था । फिर खड़ी बोली में स्वयं अपनी नाट्य रचनाएँ भी आरंभ की । उनके नाटकों की कथावस्तु और पात्रों का चयन उनका अपना अनुभव होता था । वे बहुत संवेदनशील स्वभाव के थे । जो वो देखते थे वह घटनाक्रम उनके मष्तिष्क में स्थाई स्वरूप ले लेता था और वही नाटकों में रूपांतरित हो जाता था । इन नाटकों का भी मंचन हुआ । इसीलिए उन्हें हिन्दी थियेटर का पितामह कहा जाता है । उनकी साहित्य विधा से प्रभावित काशी के विद्वानों ने उन्हें 'भारतेंदु` की उपाधि से विभूषित किया । तब उनकी आयु मात्र तीस वर्ष की थी । साहित्य में उनके अद्भुत योगदान और उनसे प्रेरित तत्कालीन साहित्यकारों द्वारा रचित रचनाओं के कारण ही उनके जीवनकाल को "भारतेन्दु युग" के रूप से जाना जाता है। होश संभालते ही अपने जीवन के प्रत्येक क्षण हिन्दी साहित्य को समर्पित करने वाले भारतेंदु जी ने 6 जनवरी 1885 को अपने जीवन की अंतिम सांस ली।
उनकी रचनाओं में विविधता थी । इसमें भक्ति, श्रृंगार और निर्वेग की रचनाएँ भी हैं। इनमें दोहा, चौपाई और छंद भी हैं। उनकी भाषा परिष्कृत और शुद्ध है । भारतेन्दु जी को स्वभाषा, अपनी परंपरा, विरासत और भारत राष्ट्र के प्रति गहरी निष्ठा थी । जिसकी झलक उनकी साहित्य रचनाओं में है । लेकिन वे सुधारवादी थे, उनकी रचनाओं में सामाजिक समस्याओं और कुरीतियों के उन्मूलन का स्पष्ट संदेश होता है । उन्होने अपने केवल पैंतीस वर्ष के जीवन काल में कुल 72 ग्रंथों की रचना की । उनकी प्रत्येक रचना कालजयी है । आज भी हिन्दी साहित्य रचना में उनका योगदान प्रेरणादायी है । यद्यपि भारतेन्दु जी का रचना संसार लगभग सभी भाषाओं में है फिर भी ब्रजभाषा में उनकी रचनाएँ असाधारण हैं। इन रचनाओं में अदभुत श्रृंगार है। इनका साहित्य प्रेममय था, इनमें "सप्त संग्रह" और "प्रेम माधुरी" प्रमुख रचना है।
लेखक - रमेश शर्मा