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'कौओं' के बगैर श्राद्ध पक्ष की परंपरा अधूरी

Date : 26-Sep-2024

श्राद्ध पक्ष चल रहे हैं। इन दिनों गुजरे लोगों को याद करना और उनका मनपसंद भोजन बनाकर परोसने की परंपरा निभाई जाती है। मान्यताओं के मुताबिक स्वर्गीय तक यह भोजन कौओं द्वारा पहुंचाया जाता है। श्राद्ध में कौए परलोकी लोगों के वाहक बनते हैं। पर, कौए इन्हीं दिनों में दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ते। श्राद्ध का भोजन लेकर लोग उनके आगमन का लंबा इंतजार करते रहते हैं लेकिन वो नहीं आते। हों तो ही आए न? हैं ही नहीं। जबकि श्राद्ध में भोजन उन्हीं को ध्यान में रख कर तैयार किया जाता है। जाहिर है जब कौए ही नहीं होंगे, तो श्राद्ध की मान्यताएं भला कैसी पूरी होगी? हमेशा से होता आया है कि श्राद्ध में पितरों का भोजन जब तक कौए न खाएं श्राद्ध की मान्यताएं पूरी नहीं होती। कौए आएंगे, खाना चुगेंगे और पितरों तक पहुंचाएंगे, लेकिन कौवे नहीं आते? ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी कहीं-कहीं दिख जाते हैं लेकिन शहरों से कौवे पूरी तरह गायब हो चुके हैं।


प्राचीन परंपराओं के अनुसार श्राद्धों से कौवों का सीधा संबंध है। श्राद्धों में जो व्यंजन बनते हैं उन्हें पितरों तक कौए ही पहुंचाते हैं। श्राद्ध में लोग अपने गुजरे पितरों को भोजन कराने के लिए घरों की छतों, खेतों, चौक-चौहराहों पर रखते हैं और कौओं के आने का इंतजार करते हैं। श्राद्ध का खाना कौआ खा ले, तो समझा जाता है कि श्राद्ध की आस्था पूरी हुई। कौओं की संख्या लगातार कम होने से उनकी जगह गली-मोहल्ले के आवारा कुत्ते श्राद्ध के भोजन पर झपट्टा मारते देखे जाते हैं। कौए नहीं आते तो लोग मजबूरन इन्हीं को कौवों का प्रतिरूप मान कर मन को समझा लेते हैं। क्योंकि इसके सिवा दूसरा कोई विकल्प भी नहीं।


दूषित पर्यावरण के चलते विलुप्त होती प्रजातियों में कौए भी शामिल हैं। एक वक्त था, जब घरों के आंगन और मुंडेरों पर कौओं की बहुतायत होती थी। उनकी आवाज सुनने को मिलती थीं। दरअसल, कौए हमेशा से अन्य पक्षियों के मुकाबले तुच्छ माने गए हैं। कौए का शरीर औषधि के तौर पर भी प्रयुक्त किया गया है। कौए छोटे-छोटे जीव एवं अनेक प्रकार की गंदगी खाकर भी अपना पेट भर लेते हैं। श्राद्ध पक्ष में इस दुर्लभ पक्षी की भक्ति और विनम्रता से यथाशक्ति भोजन कराने की बात विष्णु पुराण में कही गई है। तभी कौओं को पितरों का प्रतीक मानकर श्राद्ध पक्ष के सभी दिनों में उन्हें भोजन करवाया जाता है। श्राद्धों में कौओं को खाना और पीपल को पानी पिलाकर पितरों को तृप्त किया जाता है।

कौओं के संबंध में एक और दिलचस्त बात प्रचलित है। किसी के आगमन की सूचना भी इनकी चहलकदमी से जोड़ी जाती रही है। एक वक्त वह भी था जब परिवार की महिलाएं शगुन मान कर कौवा को मामा कह कर घर में बुलाया करती थी, तो कभी उसकी बदलती हुई दिशा में कांव-कांव करने को अपशकुन मानते हुए उड़ जा कहके बला टालतीं थीं। इसके अलावा घर की बहुएं कौए के जरिये अपने मायके से किसी के आने का संदेश पाती थीं। कौओं की तरह अब कई और बेजुबान पक्षियों की आबादी घट गई है। इसके पीछे मानवीय हिमाकत प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार है। पक्षियों के रहने और खाने की सभी जगहें नष्ट कर दिए गए हैं। पेड़ों पर भी इनका निवास होता था, वह भी लगातार काटे जा रहे हैं।


कौए को पर्यावरण रक्षक भी बताया गया है। पहले देखने में आता था कि सार्वजनिक स्थानों पर मरे जानवरों को गिद्ध और कौए खा जाते थे, लेकिन अब उनके न होने से मृत जानवरों के शरीर सड़ते रहते हैं। दुर्गंध दूर-दूर तक फैली रहती है, जिससे लोग संक्रमित भी हो जाते हैं। गंदगी को समेटने में गिद्ध, चील और कौओं का बड़ा योगदान होता था। कौए सिर्फ श्राद्धों में नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के संतुलन में भी महत्वपूर्ण किरदार निभाते हैं। तब भी कौवों के बचाने में कोई कदम नहीं उठाए गए। कौए अब कितने बचे और कितने गायब हो गए, इसका सटीक आंकड़ा और कारण उपलब्ध नहीं है। पर्यावरणविद् के अलावा देश के अनगिनत पशु-पक्षी प्रेमी सालों से चिंता जता रहे हैं कि कौआ, चील, गिद्ध, गौरैया, सारस के अलावा तमाम दुर्लभ किस्म के भारतीय पक्षी विलुप्त हो रहे हैं। लेकिन कोई भी इस ओर ध्यान नहीं देता। उसी का नतीजा है कि श्राद्वों में कौओं का इंतजार करना पड़ता है।

समय ज्यादा दूर नहीं, जब श्राद्ध तो दूर सामान्य दिनों में भी कई पक्षी दिखना बंद हो जाएंगे। आधुनिक सुख-सुविधाओं ने इंसानी जीवन को अपाहिज बना दिया है। प्रकृति से छेड़छाड़ और धरती के अत्यधिक दोहन ने बेजुबान जीवों का जीवन तबाह कर दिया। कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के संरक्षक वैज्ञानिक केनेथ रोजेनबर्ग के मुताबिक मोबाइलों टावरों से निकलने वाले रेडिएशन ने पक्षियों को खत्म करने में बड़ी भूमिका निभाई है। विशेषकर कौए, तोते, गिद्ध, गोरैया जैसे पक्षी। समूची दुनिया में पक्षियों की आबादी लगभग एक तिहाई खत्म हो चुकी है। यूं ही रहा तो ये धरती कभी पक्षी विहीन हो जाएंगी।

लेखक:- डॉ. रमेश ठाकुर


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