भारतेंदु हरिश्चंद्र | The Voice TV

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भारतेंदु हरिश्चंद्र

Date : 09-Sep-2024

 भारतेंदु हरिश्चंद्र  हिन्ही में आधुनिकता के सर्वप्रथम रचनाकार थे | इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह  काहा जाता है भारतेंदु हरिशचंद्र जी को अक्सर हिंदी साहित्य और रंगमंच का जनक माना जाता है |उनको हिंदी साहित्य का पहला मौलिक नाटय चिन्तक भी माना जाता है | वह हिंदी गद्य के  महान लेखक थे | भारतेंदु हरिश्चंद्र जी को शोषणकारी प्रकृति को दर्शाने वाले लेखन के लिए उन्हें युग चारण के रूप में सम्मानित किया गया है | भारतेंदु जी ने ऐसे विषय चुने जो लोगो के पीड़ा को दर्शाते थे | उनसे के नाटक धार्मिक और भावुकता प्रधान थे | भारतेंदु हरिशचंद्र जी इसके जगह पैराणिक, एतिहासिक ,राजनितिक और सामाजिक नाटक लिखे | हिंदी गद्य में भारतेंदु जी का विशेष योगदान है | इन्ही के कारण उन्हें हिंदी जनक काहा जाता है| इनका मूल नाम हरिशचंद्र है भारतेंदु नाम इनके कार्य की उपाधि है |

जन्म 9 सितम्‍बर, 1850 

भारतेंदु हरिशचंद्र का जन्म 09 सितम्बर 1850 को काशी एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था | इनके पिता श्री गोपालचन्द्र जी जो प्रतिभाशाली कवि थे साथ में हिंदी-उर्दू व संस्कृत भाषा के  प्रकाण्ड विद्वान थे | जिससे यह ज्ञात होता है की भार्तेंदुद हरिशचंद्र जी को साहित्यिक वातावरण विरासत में मिला था |

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के माता – पिता की मृत्यु जब वह अल्प आयु में थे तभी हो गयी थी | जब वे 5 वर्ष के थे तब उनकी माता का दिहांत हो गया और उनके पिता जी श्री गोपाल चन्द्र का दिहांत जब वह 10 वर्ष के थे तब हो गयी | तथा इन्ही कारणों से भारतेंदु हरिशचंद्र जी को कई प्रकार के संघर्षो का सामना करना पड़ा |

शैक्षणिक योग्यता

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की शिक्षा की शुरुआत बनारस के ‘किंग्स कॉलेज’ से हुई माता-पिता के निधन अथवा व्यक्तिगत कारणों से उनकी शिक्षा पूरी नही हो पायी उसके पश्चात उन्होंने स्वाध्याय अध्यन करना शुरू कर दिया और उन्होंने संस्कृत पंजाबी बंगाली मराठी गुजरती उर्दू आदि भाषा का उन्हें ज्ञान था | लेकिन उन्होंने विशेष रूप में हिंदी साहित्य को मान्यता प्रदान करायी| उन्होंने बहुत से कविताये, रचनाये,नाटक बनाये है

जिस समय भारतेंदु जी का अभिर्भाव हुआ उस समय भारत गुलामी की ज़ंजीरो में जकड़ा हुआ था | अंग्रेजी शासन में भारत में शासन तंत्र के संबंधित कार्य अंग्रेजी में ही होते थे | अंग्रेजी शासन  में भारत वासीयों का  विदेशी सभ्यता के प्रति आकर्षण बढ़ता जा राहा था|

जिससे हमारी हिंदी मातृभाषा की ओर आकर्षण कम होते जा रहा था|

अंग्रेजी निति से हमारी साहित्य पर बुरा असर पड़ राहा था |हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ हो राहा था | ऐसे वातावरण में जब भारतेंदु हरिश्चंद्र अवतारित हुए तो उन्होंने सर्वप्रथम समाज और देश की दशा पर विचार किया और फिर अपनी लेखन माध्यम से अंग्रेजी हुकूमत को हटाया फिर हिंदी साहित्य को मान्यता प्रदान की |

भारतेन्दु जी विविध भाषाओं में रचनायें करते थे, किन्तु ब्रजभाषा पर इनका असाधारण अधिकार था। इस भाषा में इन्होंने अदभुत परिचय दिया है।

भारतेंदु जी का साहित्य प्रेममय था क्योकि प्रेम को लेकर ही अपना उन्होंने अपना सप्त संग्रह प्रकाशित किया |

प्रेम माधुरी इनकी सर्वोत्कृष्ट रचना थी –

मारग प्रेम को समुझै 'हरिश्चन्द्र' यथारथ होत यथा है |
लाभ कछु न पुकारन में बदनाम ही होन की सारी कथा है।
जानत ही जिय मेरौ भली विधि और उपाइ सबै बिरथा है।
बावरे हैं ब्रज के सिगरे मोंहि नाहक पूछत कौन बिथा है।

भारतेन्दु जी अत्यन्त कम अवस्था से ही रचनाएँ करने लगे थे। इन्होंने नाटक के क्षेत्र में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान किया है। इनके प्रमुख नाटक

काव्यकृतियां

भक्तसर्वस्व

प्रेममालिका

कार्तिक स्नान

वैशाख महात्म्य

प्रेम सरोवर आदि |

मौलिक नाटक

श्री चंद्रावली

विषस्य विषमौषधम्

अंधेर नगरी 

नीलदेवी

सती प्रताप

निबंध संग्रह

काशी

कश्मीर कुसुम

संगीत सार 

वैष्णवता और भारतवर्ष

नाटकों का इतिहास

कहानी

अद्भुत अपूर्व स्वप्न

यात्रा वृत्तान्त

सरयूपार की यात्रा

लखनऊ

आत्मकथा

एक कहानी- कुछ आपबीती, कुछ जगबीती

उपन्यास

पूर्णप्रकाश

चन्द्रप्रभा

आधुनिक हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु जी का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। वे बहूमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध आदि सभी क्षेत्रों में उनकी देन अपूर्व है। वे हिंदी में नव जागरण का संदेश लेकर अवतरित हुए।आधुनिक हिंदी के वे जन्मदाता माने जाते हैं। हिंदी के नाटकों का सूत्रपात भी उन्हीं के द्वारा हुआ।

मृत्यु 6 जनवरी, 1885

1885 में 34 वर्ष की आयु में उनकी असामयिक मृत्यु के बावजूद, उनके प्रयासों का फल आगामी दशकों में आधुनिक हिंदी के उद्भव और प्रचार में मिला।

वे अपने प्रयासों के फलदायी परिणाम देखने के लिए जीवित नहीं रहे | उनकी मृत्यु के कुछ दशकों के भीतर ही आधुनिक हिंदी के साथ-साथ इसके प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न मंचों का उदय हो चुका था।

उन्होंने कहा, "अपनी भाषा की उन्नति ही सभी उन्नति का मूल है।"


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