जाति जनगणना के वितंड़ावाद और सिरफिरी बहस के बीच महात्मा गांधी का यह लेख और भी प्रासंगिक हो जाता है जो उन्होंने 'साप्ताहिक हरिजन' में लिखा था, यह लेख 'मेरे सपनों का भारत में भी संकलित है* | The Voice TV

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जाति जनगणना के वितंड़ावाद और सिरफिरी बहस के बीच महात्मा गांधी का यह लेख और भी प्रासंगिक हो जाता है जो उन्होंने 'साप्ताहिक हरिजन' में लिखा था, यह लेख 'मेरे सपनों का भारत में भी संकलित है*

Date : 06-Sep-2024

मेरे सपनों के भारत में  , वर्णाश्रम और  जातिपाँति  - मोहनदास करमचंद गांधी
 

आज तो ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्‍यों और शूद्रों के केवल नाम ही रह गए हैं। वर्ण का मैं जो अर्थ करता हूँ उसकी दृष्टि से देखें, तो वर्णों का पूरा संकर हो गया है और ऐसी हालत में मैं तो यह चाहता हूँ कि सब हिंदू अपने को स्‍वेच्‍छापूर्वक शूद्र कहने लगे। ब्राह्मण-धर्म की सच्‍चाई को उजागर करने और सच्‍चे वर्ण-धर्म को पुन: जीवित करने का यही एक रास्‍ता है।
लेकिन वर्ण को मैं अवश्‍य मानता हूँ। वर्ण की रचना पीढ़ी-दर-पीढ़ी के धंधों की बुनियादी पर हुई है। मनुष्‍य के चार धंधे सार्वत्रिक हैं विद्यादान करना, दुखी को बचाना, खेती तथा व्‍यापार और शरीर की मेहनत से सेवा। इन्‍हीं को चलाने के लिए चार वर्ण बनाए गए हैं। ये धंधे सारी मानव-जाजि के लिए समान हैं, पर हिंदू धर्म ने उन्‍हें जीवन-धर्म करार देकर उनका उपयोग समाज के संबंधों और आचार-व्‍यवहार के लिए किया है। 
गुरुत्‍वाकर्षण के कानून को हम जानें या न जानें, उसका असर तो हम सभी पर होता है। लेकिन वैज्ञानिकों ने उसके भीतर से ऐसी बातें निकाली हैं, जो दुनिया को चौंकाने वाली हैं। इसी तरह हिंदू धर्म ने वर्ण-धर्म की तलाश करके और उसका प्रयोग करके दुनिया को चौंकाया है। जब हिंदू अज्ञान के शिकार हो गए, तब वर्ण के अनुचित उपयोग के कारण अनगिनत जातियाँ बनीं और रोटी-बेटी व्‍यवहार के अनावश्‍यक और हानिकारक बंधन पैदा हो गए। 
संपूर्ण जाति-व्‍यवस्‍था को बचाना हो तो समाज में बढ़ी हुई इस हानिकारक बुराई को दूर करना ही होगा। अस्‍पृश्‍यता जाति-व्‍यवस्‍था की उपज नहीं है, बल्कि उस ऊँच-नीच-भेद की भावना का परिणाम है, जो हिंदू धर्म में घुस गई है और उसे भीतर-ही-भीतर कुतर रही है। इसलिए अस्‍पृश्‍यता के खिला। हमारा आक्रमण इस ऊँच-नीच की भावना के खिलाफ ही है। ज्‍यों ही अस्‍पृश्‍यता नष्‍ट होगी जाति-व्‍यवस्‍था स्‍वयं शुद्ध हो जाएगी; यानी मेरे सपने के अनुसार वह चार वर्णों वाली सच्‍ची वर्ण-व्‍यवस्‍था का रूप ले लेगी। 

आर्थिक दृष्टि से जातिप्रथा का किसी समय बहुत मूल्‍य था। उसके फलस्‍वरूप नई पीढ़ियों को उनके परिवारों में चले आए परंपरागत कला-कौशल की शिक्षा सहज ही मिल जाती थी और स्‍पर्धा का क्षेत्र सीमित बनता था। गरीबी और कंगाली से होने वाली तकलीफ को दूर करने का वह एक उत्‍तम इलाज थी। और पश्चिम में प्रचलित व्‍यापारियों के संघों की संस्‍था के सारे लाभ उसमें भी मिलते थे। 

(सभार मेरे सपनों का भारतः राजकमल प्रकाशन)

 


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