नाथ संप्रदाय में अंतिम संस्कार पर डॉ. मोहन के कथन की गहराइयों को समझें, ये विवाद का विषय नहीं
Date : 04-Sep-2024
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा नाथ संप्रदाय में अंतिम संस्कार विधि को लेकर जो कहा गया, ‘‘वर्तमान समय में दफनाने की परंपरा बदली जाना चाहिए। पुरखे हमारे हैं और समाधि पर चादर चढ़ाकर फायदा कोई और लोग लेते हैं। इस बात को ध्यान में रखते हुए बदलाव के कदम उठाने जाना चाहिए।’’ वस्तुत: मुख्यमंत्री मोहन यादव यहां कुछ भी गलत नहीं कह रहे, अब कौन चादर चढ़ाकर फायदा उठा रहे हैं, यह सभी को समझ आ रहा है । वैसे भी सनातन परंपरा को जो स्वीकारते हैं, वे यह तो मानेंगे ही कि मनुष्य देह के अनेक विसर्जनों में दाह संस्कार ही सबसे श्रेष्ठ है। स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में अग्नि के महत्व पर बहुत गहरी बात कही है।
अर्थात् देह-जीवन को बनानेवाले कर्मक्षेत्र के पाँच महाभूतों - अहंकार, बुद्धि, अप्रकट मूलतत्व, ग्यारह इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन) तथा पाँच इन्द्रियों के विषयों से निर्मित है। यानी कि कार्य क्षेत्र को बनाने वाले चौबीस तत्व हैं: पंचमहाभूत (पांच स्थूल तत्व - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), पंचतन्मात्राएँ (पाँच इन्द्रिय विषय - स्वाद, स्पर्श, गंध, दृष्टि और ध्वनि), पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हाथ, पैर, जननांग और गुदा), पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (कान, आँख, जीभ, त्वचा और नाक), मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति (भौतिक ऊर्जा का मूल रूप)। श्रीकृष्ण ग्यारह इन्द्रियों को इंगित करने के लिए दशैकम् (दस और एक) शब्द का प्रयोग करते हैं। इनमें वे मन के साथ-साथ पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ भी सम्मिलित करते हैं। इससे पहले, श्लोक 10.22 में उन्होंने उल्लेख किया था कि इन्द्रियों में वे मन हैं।
इस प्रकार वे व्यापक रूप से पंचमहाभूत, पंचतन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति को व्याख्यायित करते हैं। कुल मिलाकर पांच स्थूल तत्व - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का जो तत्व हमारे शरीर में व्याप्त है, अग्नि संस्कार करने से वे सभी अपने-अपने मूल में समाहित हो जाते हैं। यह संदेश भारतीय ज्ञान परंपरा में कई आद्य ग्रंथों का है। अब यह अलग बात है कि समयकालीन परिस्थितियों में वे कुछ कारण अवश्य रहे होंगे जिसके चलते नाथ संप्रदाय मृत्यु पर गाड़ देने या दफन करने का अंतिम संस्कार व्यवहार करने लगा होगा । नाथ संप्रदाय के लोग खुद को अग्नि और योग से पवित्र बनाते हैं, इस कारण हो सकता है कि अग्नि में समाहित नहीं होने का उनकी ये परंपरा श्रद्धा के वशीभूत अग्नि को सम्मान देने के लिए हो! किंतु यह भी सच है कि देश-काल-परिस्थिति के अनुसार परंपराएं बदलती रही हैं, वे कभी अनन्त काल तक के लिए स्थायी नहीं रहीं। इसलिए हमेशा से भारतीय दर्शन कहता रहा है कि परंपरा में आधुनिकता समाहित है।
दूसरा उदाहरण रात्रि में हिन्दुओं के विवाह के रूप में भी देखा जा सकता है। श्रीराम-जानकी जी का विवाह वैदिक रीति के अनुसार दिन में हुआ था। श्री कृष्ण-रुकमणी का विवाह हो या अन्य प्रमुख विवाह संस्कार ये सभी दिन में सूर्य को साक्षी मानकर क्योंकि वह ऊर्जा और उत्साह के प्रतीक हैं सम्पन्न हुए थे। वस्तुत: यह हमारी प्रथा रही है कि हम अपने पुत्र-पुत्री का विवाह दिन में ही करें।लेकिन कालान्तर में जब हिन्दू समाज पर विधर्मियों का आतंक हुआ, तुर्क, हब्शी, मुगल आक्रांताओं समेत अरबिया इस्लामिक आक्रान्ताओं द्वारा हिन्दू बेटियों का मान, शील, चरित्र, जेवर, धन लुटने लगा और हिन्दू समाज अपने आप को कमजोर पाने लगा, तब भारत में दो धाराओं का प्रचलन देखने को मिला, एक – देश भर में भक्ति आन्दोलन खड़ा हुआ और दो- हिन्दू आचार्य इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि गांव, देहात हर जगह हिन्दू परिवार जिसके यहां विवाह होना है, उसे सुरक्षा उपलब्ध कराना संभव नहीं, इसलिए आगे से विवाह रात्रिकाल में होंगे। जहां अनुकूलता रहे, वहीं सिर्फ विवाह संस्कार दिन में किए जाएं।
सिकन्दर लोदी ने उलेमा द्वारा निर्णय दिये जाने पर एक बोधन नायक ब्राह्मण को इस्लाम धर्म स्वीकार न करने पर जिन्दा जलवा दिया ।"(तबकाते अकबरी, निजामुद्दीन अहमद, पृ. 322-23), इसी तरह के उसके अन्य कई हिन्दू अत्याचार हैं, जिनसे इतिहास भरा पड़ा है। फिरोज तुगलक ने जाजनगर के राजा सिखार के पुत्र को पकड़कर मुसलमान बनाया व उसका नाम शक्रखान रखा। इस प्रकार के अनेक उदाहरण इतिहास में भरे पड़े हैं, जिसमें कि हिन्दू जनता एवं राजा के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संकट तलवार और भयंकर क्रूरता के सामने खड़ा हुआ था। दुखद यह है कि जिस धर्मनिरपेक्ष(पंथनिरपेक्ष) देश भारत को आज हम देख रहे हैं, वहां भी योजनाबद्ध, संगठित तरीके से हिन्दुओं पर निशाना साधा जा रहा है। कन्वर्जन, लवजिहाद, लैण्ड जिहाद, हिंसा के अनेकों उदाहरण आज भरे पड़े हैं ।
वैसे भी भारतीय संदर्भ में ही नहीं दुनिया की तमाम संस्कृतियों और सभ्यताओं में समय के अनुसार परंपराएं बदलती रही हैं और अपने समय में ये सदैव वर्तमान रहती आई हैं, जो परंपराएं अपने वर्तमान काल से मेल नहीं खातीं वह या तो नष्ट हो जाती हैं या फिर वे परंपराएं विवाद का एक बड़ा कारण बनती हैं । वास्तव में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने विमर्श के लिए एक बड़ा विषय दिया है। अब नाथ संप्रदाय के जो विद्वान हैं, इस नजरिए से भी एक बार विचार अवश्य करेंगे, यह विश्वास है । अतः आज जो बात कही जा रही है उसको ध्यान में रखकर इस पर विचार सभी को करना चाहिए । अब समझदारी इसी में है कि समय के साथ हम अपनी परंपराओं की व्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने के लिए आवश्यक सुधार करें, उसमें परिवर्तन करें और सही वैज्ञानिकता और वर्तमान समय के अनुकूल जो है उसके अनुसार अपना आचरण करें । वस्तुत: ध्यान रहे, यह विचार केवल नाथ संप्रदाय के लिए नहीं हैं, बल्कि सभी हिन्दू जन के मत, पंथों के लिए है, इनमें आज जहां भी लगता है सुधार आवश्यक है, वहां हमें वर्तमान काल के अनुरूप सुधार करना ही चाहिए। यही है परंपराओं में आधुनिकता का होना, जिसे आज मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आगे बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे हैं।