पोला छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि किसानों का सबसे प्रसिद्ध और पारंपरिक त्योहार है। छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और प्रसिद्ध त्यौहार पोला न केवल इस राज्य में, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है | यह पर्व विशेष रूप से किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए समर्पित है | भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को पोला का पर्व मनाया जाता है. ऐसा माना गया है की बैल भगवान का स्वरूप है और इस वजह से इसकी पूजा की जाती है |
यद्यपि आधुनिक समय में मशीनों का प्रयोग की अधिकता पर भी यह परंपरा आज भी जीवित है बैलों के बिना खेती अधूरी है इस साल बैल पोला का त्यौहार 2 सितंबर को भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाएगा | शक्ति पुत्र पंडित कामता तिवारी जी के अनुसार, इस त्योहार में बैलों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। जिनके पास बैल नहीं होते, वे मिट्टी के बैल बनाकर उनकी पूजा करते हैं. जिनके घर में बैल होते हैं, वे उन्हें अर्ध जल अर्पित करते हैं, माथे पर चंदन का टीका लगाते हैं, और उन्हें माला पहनाई जाती है.इसके साथ ही बैलों को विशेष रूप से तैयार भोजन दिया जाता है और धूप-अगरबत्ती के साथ उनकी पूजा की जाती है |
क्यों पड़ा त्यौहार का नाम पोला ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान् विष्णु ने कृष्ण अवतार लेकर जन्माष्टमी के दिन जन्म लिया था | जब इसके बारे में कंस को पता चला, तो उसने कान्हा को मारने के लिए अनेकों असुर भेजे थे | इन्हीं असुरों में से एक था पोलासुर | कान्हा जब छोटे थे और वासुदेव- यशोदा के यहां रहते थे, तब कंस ने कई बार असुरों को उन्हें मारने भेजा था | इसे भी कृष्ण ने अपनी लीला के चलते मार दिया था, और सबको अचंभित कर दिया था | वह दिन भादों माह की अमावस्या का दिन था, इस दिन से इसे पोला कहा जाने लगा |
पोला त्यौहार का महत्व
भारत, जहां कृषि आय का मुख्य स्रोत है और ज्यादातर किसानों की खेती के लिए बैलों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए किसान पशुओं की पूजा आराधना एवं उनको धन्यवाद देने के लिए इस त्योहार को मनाते है। पोला दो तरह से मनाया जाता है, बड़ा पोला एवं छोटा पोला। बड़ा पोला में बैल को सजाकर उसकी पूजा की जाती है, जबकि छोटा पोला में बच्चे खिलौने के बैल या घोड़े को मोहल्ले पड़ोस में घर-घर ले जाते है और फिर कुछ पैसे या गिफ्ट उन्हें दिए जाते है। पोला पर्व में छत्तीसगढ़ी पकवान ठेठरी, खुरमी जैसे पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं।
