गोसंवर्धन और आत्म निर्भरता | The Voice TV

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गोसंवर्धन और आत्म निर्भरता

Date : 27-Aug-2024

 श्रीकृष्ण जन्माष्टमी -2 

आलेख के प्रथम भाग में हमने भगवान श्रीकृष्ण के जीवनवृत से विषमता के साथ बालपन से  व्यक्तित्व निर्माण, सतत संघर्ष, परिवार संरक्षण, कुटुम्ब समन्वय, पर्यावरण संरक्षण समझा । अब आलेख के द्वितीय भाग में गोसंवर्धन, आत्म निर्भरता, सामाजिक समरसता, मित्रता का आदर्श और ज्ञान विज्ञान पक्ष 

भारत की अर्थ व्यवस्था का आधार कृषि और कुटीर उद्योग रहे हैं। इन दोनों कार्यों में गाय की भूमिका महत्वपूर्ण रही है । गाय के बछड़े जहाँ कृषि की जुताई  बोआई में महत्वपूर्ण रहे वहीं ढुलाई का माध्यम भी वही । जबकि गाय के मख्खन और घी नगर में लाकर बेचने के प्रसंग भी कृष्ण काल में मिलते हैं। गाय से दूध मख्खन घी के अतिरिक्त गोमूत्र से औषधियों का वर्णन भी मिलता है । इसलिये भारतीय समाज की आत्म निर्भरता और आरोग्य में गाय को महत्वपूर्ण माना गया है । कृष्णजी का पूरा जीवन गोसंवर्धन के लिये समर्पित रहा । वे स्वयं बालवय से गोपालन करते थे । उन्होने पूरे क्षेत्र में गोपालन का अभियान चलाया । पढ़ने के लिये उज्जैन आये तो यहाँ भी गोसेवा निरंतर रही । द्वारिका में उनकी विशाल गोशाला थी । जिनके चिन्ह भेंटद्वारिका में सुरक्षित हैं। इसी विशेषता से उनका एक नाम "गोपाल" हुआ ।
सामाजिक समरसता और मित्रता का निर्वाह करने में भगवान श्रीकृष्ण जी आदर्श माना जाता है । सामाजिक समरसता का उदाहरण उनकी गोवर्धन पर्वत पूजन में मिलता है । उन्होने प्रत्येक घर से खाद्यान्न सामग्री मंगवाई और मिलकर भोजन तैयार हुआ । यहीं से "छप्पन भोग" परंपरा आरंभ हुई । बिना किसी भेदभाव के प्रत्येक घर से भोजन आना चाहिए। दूसरा बचपन में उनकी टोली में गोकुल के प्रत्येक घर के बालक थे । कोई  छोटा, बड़ा, धनी, निर्धन, का कोई भेद नहीं था । उनकी टोली में विकलांग बालक भी सम्मानित थे और सबका ध्यान कन्हैया जी रखते थे । सामाजिक समरसता का स्वरूप शिक्षा के दौरान उज्जैन में और द्वारिका में भी रहा । गुरु सांदीपनि आश्रम में उनकी प्रसिद्ध मित्रता किसी राजकुमार से नहीं अपितु एक निर्धन सुदामा से हुई । समय आने पर उन्होने अपने इस मित्र को संपन्न बनाया ।  
भगवान श्रीकृष्ण के बचपन में साहस, बल और विलक्षण बुद्धि का परिचय मिलता है । उसी प्रकार उनके जीवन के विभिन्न प्रसंगों ज्ञान विज्ञान के अध्येता का अद्भुत स्वरूप उभरता है । मथुरा में सत्य और सनातन आधारित राज्य की स्थापना करके पढ़ने केलिये सांदीपनि गुरु आश्रम उज्जैन आये । वे केवल 64 दिनों में चारों वेद 18 पुराण  108 उपनिषद, 64 कलाओं और सोलह विद्याओं में निष्णात हो गये थे । यहीं उन्हें नारायण के छठे अवतार भगवान परशुराम जी ने गीता का ज्ञान दिया और सुदर्शन चक्र भेंट किया । इसी के साथ उनका योगेश्वर, कर्मेश्वर, ज्ञानेश्वर और परमेश्वर का स्वरूप उदित हुआ । जिसकी झलक पहले कौरवों की सभा में फिर महाभारत युद्ध के बीच मिलती है । कौरवों की सभा में उनके विश्वरूप का वर्णन महाभारत के उद्योग पर्व में और युद्धकाल में विराट स्वरूप का वर्णन श्रीमद्भगवत गीता के ग्यारहवें अध्याय "विराट योग" में है । स्वरूप के अतिरिक्त द्रोपदी से संवाद में जीवन की व्यावहारिकता, युधिष्ठिर से संवाद में राजनीति और राष्ट्रनीति के साथ अर्जुन से संवाद में सांख्य, भक्ति, कर्म के साथ सूक्ष्म जगत से स्थूल जगत तक का जो वर्णन किया वह अपने आप में अद्भुत है । लगता है वेद, पुराण और उपनिषद का सारांश है । श्रीमद्भगवतगीता में उनका उवाच। सृष्टि निर्माण से लेकर जीवन का विकास, अंतरिक्ष विज्ञान, भौतिक विज्ञान और वनस्पति विज्ञान सबका निष्कर्ष भगवान श्रीकृष्ण के गीता के संदेश में है । श्रीमद्भगवतगीता पर पूरे विश्व में सर्वाधिक अनुसंधान हुये । कुछ विश्वविद्यालयों में तो व्यक्तित्व विकास के सूत्र के रूप पढ़ाई जाती है ।

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