श्रीकृष्ण जन्माष्टमी -2
आलेख के प्रथम भाग में हमने भगवान श्रीकृष्ण के जीवनवृत से विषमता के साथ बालपन से व्यक्तित्व निर्माण, सतत संघर्ष, परिवार संरक्षण, कुटुम्ब समन्वय, पर्यावरण संरक्षण समझा । अब आलेख के द्वितीय भाग में गोसंवर्धन, आत्म निर्भरता, सामाजिक समरसता, मित्रता का आदर्श और ज्ञान विज्ञान पक्ष
भगवान श्रीकृष्ण के बचपन में साहस, बल और विलक्षण बुद्धि का परिचय मिलता है । उसी प्रकार उनके जीवन के विभिन्न प्रसंगों ज्ञान विज्ञान के अध्येता का अद्भुत स्वरूप उभरता है । मथुरा में सत्य और सनातन आधारित राज्य की स्थापना करके पढ़ने केलिये सांदीपनि गुरु आश्रम उज्जैन आये । वे केवल 64 दिनों में चारों वेद 18 पुराण 108 उपनिषद, 64 कलाओं और सोलह विद्याओं में निष्णात हो गये थे । यहीं उन्हें नारायण के छठे अवतार भगवान परशुराम जी ने गीता का ज्ञान दिया और सुदर्शन चक्र भेंट किया । इसी के साथ उनका योगेश्वर, कर्मेश्वर, ज्ञानेश्वर और परमेश्वर का स्वरूप उदित हुआ । जिसकी झलक पहले कौरवों की सभा में फिर महाभारत युद्ध के बीच मिलती है । कौरवों की सभा में उनके विश्वरूप का वर्णन महाभारत के उद्योग पर्व में और युद्धकाल में विराट स्वरूप का वर्णन श्रीमद्भगवत गीता के ग्यारहवें अध्याय "विराट योग" में है । स्वरूप के अतिरिक्त द्रोपदी से संवाद में जीवन की व्यावहारिकता, युधिष्ठिर से संवाद में राजनीति और राष्ट्रनीति के साथ अर्जुन से संवाद में सांख्य, भक्ति, कर्म के साथ सूक्ष्म जगत से स्थूल जगत तक का जो वर्णन किया वह अपने आप में अद्भुत है । लगता है वेद, पुराण और उपनिषद का सारांश है । श्रीमद्भगवतगीता में उनका उवाच। सृष्टि निर्माण से लेकर जीवन का विकास, अंतरिक्ष विज्ञान, भौतिक विज्ञान और वनस्पति विज्ञान सबका निष्कर्ष भगवान श्रीकृष्ण के गीता के संदेश में है । श्रीमद्भगवतगीता पर पूरे विश्व में सर्वाधिक अनुसंधान हुये । कुछ विश्वविद्यालयों में तो व्यक्तित्व विकास के सूत्र के रूप पढ़ाई जाती है ।