दासत्व की सबसे अंधेरी रात देखी है भारत ने | The Voice TV

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दासत्व की सबसे अंधेरी रात देखी है भारत ने

Date : 16-Aug-2024

15 अगस्त भारत की स्वतंत्रता के उत्सव का दिन है । सैकड़ो वर्ष बाद भारतीयों ने इसी दिन स्वतंत्रता का स्वर्णिम सूर्योदय देखा था । इसदिन जितना उत्सव मनाया जाय वह कम है लेकिन उत्सव के साथ अतीत के अनूभवों से सावधानी की शपथ और भारत के स्वर्णिम भविष्य, सुरक्षा और समृद्धि का संकल्प भी आवश्यक है । अब हमारी यात्रा ऐसी होनी चाहिए कि आने वाली पीढ़ियों के सामने वैसा संकट न आये जैसा हमारे पूर्वजों ने देखा है । 

15 अगस्त संपूर्ण भारत के एकत्व का दिन है । अन्य दिनों में भले हम अपने क्षेत्र, प्रदेश, भाषा या भूषा की बातें करें, लेकिन 15 अगस्त को पूरा भारत एक रंग में होता है, भारत राष्ट्र  के एकत्व स्वरूप का रंग । यह रंग है एक स्वर में स्वतंत्रता के गान का, एक ही भाव से उत्सव और आनंद का । सबके अंदाज अलग होते हैं, पर सबके स्वर एक होते हैं। और क्यों न हों। भारत में स्वतंत्रता केलिये हर क्षेत्र में असंख्य बलिदान हुये । जितना संघर्ष हिमालय परिक्षेत्र में हुआ उतना ही सुदूर दक्षिण में महासागर के किनारे । सबका स्वर एक था "भारत दासत्व से मुक्त हो" । भारतीयों ने क्रूरता से भरा दासत्व से भरी अंधकार की महारात्रि गुजारी थी । दासत्व काल में छल, बल, क्रूरता, कुटिलता और षड्यंत्रों की कोई सीमा नहीं थी । भारत पर राज करने वाला हरेक हमलावर दमन कारी रही । अंतर इतना था कि किसी ने सीधा विध्वंस और दमन किया तो किसी ने कुटिलता का मोहक मुलम्मा चढ़ाकर । यह क्रम सैकड़ों साल चला । दुनियाँ के लगभग सभी देशों ने आक्रमण झेले हैं, विदेशी सत्ता झेली है । पर जितने आक्रमण भारत पर हुये, दमन, विध्वंस और क्रूरता का जो कुचक्र भारत में चला इसका उदाहरण संसार में नहीं मिलता । उस दमन से मुक्ति का दिवस है 15 अगस्त । इसलिये यह अनंत उत्सव का दिन है । लेकिन इसके साथ अतीत के अनुभवों से सावधान होकर भविष्य की यात्रा केलिये शपथ संकल्प लेने का दिन भी है । उन पीढ़ियों का सुख या खुशी कभी स्थाई नहीं होती जो अतीत को विस्मृत कर देते हैं। अतीत के अनुभवों से भविष्य की यात्रा निर्धारित करने वाला समाज ही अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करता है । इसलिये 15 अगस्त पर स्वतंत्रता उत्सव के साथ भविष्य की सावधानियों पर भी मंथन आवश्यक है । 
इतिहास के पन्नों में भारत पर हुये आक्रमणों की बहुत लंबी सूची है । यह क्रम लगभाग दो हजार वर्षों तक चला और देश की धरती सिकुड़ती चली गई। भारत में पहला आक्रमण 516 ईसा पूर्व  डेरियस प्रथम का हुआ था । वह कंधार के रास्ते भारत में घुसा और सिंधु क्षेत्र तक आ गया था । भारत के एक बड़े भूभाग पर उसने अधिकार भी कर लिया था । लेकिन भारतीय शासकों ने एकजुट होकर संघर्ष किया और भारत की भूमि हमलावरों से मुक्त हो गई। आक्रमणकारी भारत के रंग में ढल कर यहीं रच बस गये ।दूसरा बड़ा आक्रमण यूनान के अलेक्जेंडर का हुआ। यह आक्रमणकारी एशिया में सिकन्दर के नाम से प्रसिद्ध है । इसके बाद शकों और हूणों के आक्रमण हुये । ये सभी आक्रमणों का उद्देश्य अपने साम्राज्य विस्तार करना था । लेकिन भारत की सहिष्णुता से सभी प्रभावित हुये । साँस्कृतिक सामाजिक आदान प्रदान हुये और आक्रमणों पर विराम लगा । 
भारत पर आक्रमणों का दूसरा दौर ईस्वी सन् 712 से आरंभ हुआ । मोहम्मद बिन कासिम की अगुवाई में यह आक्रमण सिंध पर हुआ । इसका उद्देश्य लूट विध्वंस था । वह अकूत संपत्ति लूटकर  और भारतीय स्त्री बच्चों को पकड़कर लौट गया था । लूट विध्वंस और भारतीय स्त्री बच्चों को पकड़कर गुलामों के बाजार में बेचने का यह सिलसिला लगभग तीन सौ वर्ष चला । मेहमूद गजनवी के आक्रमण और लूट का उद्देश्य भी यही रहा । आक्रमण का तीसरा क्रम मोहम्मद गौरी के आक्रमण के साथ आरंभ हुआ । जिसमें लूट और विध्वंस के साथ अपनी सत्ता स्थापित करना भी था । गौरी ने अपने एक गुलाम कुतुबुद्दीन को प्रतिनिधि बनाकर दिल्ली बिठाया । इसी कुतुबुद्दीन से भारत में गुलाम वंश की नींव रखी और भारत में विदेशी सत्ता आरंभ हुई । आक्रमणों का चौथा दौर यूरोपियन्स से चला । पुर्तगीज, डच, फ्रांसीसी और अंग्रेज व्यापारी बनकर भारत आये और भारत में सत्ताधीश बनकर बैठ गये । अंतिम विदेशी सत्ता अंग्रेजों की रही । उन्होंने मुगल सल्तनत से व्यापार की अनुमति ली और 1613 में पहली व्यापारिक चौकी गुजरात के सूरत में स्थापित की । इसके बाद अपनी योजनानुसार व्यापारिक चौकियों के माध्यम से भारत के अधिकांश हिस्सों में नेटवर्क खड़ा कर लिया । सुरक्षा के लिये सैनिक तैनात करना आरंभ किये । पहले उनके सैनिक और तकनीक स्थानीय शासकों को सहायता करने लगी । धीरे धीरे अंग्रेजों ने सत्ताओं में हस्तक्षेप करना आरंभ किया । 1757 में प्लासी युद्ध के बाद अंग्रेज खुलकर खेलने लगे । अंग्रेजों ने धीरे धीरे दायरा बढ़ाया और पूरे भारत पर अधिकार कर लिया । अंग्रेजों के दौर में पुराने विदेशी शासकों की भाँति भारतीय जनों का दमन, शोषण और संपत्ति हरण तो यथावत रहा । इसके साथ उन्होंने भारत को भारत में समाप्त करने केलिये सांस्कृतिक, मानसिक और बौद्धिक परिवर्तन का अभियान भी चलाया ।
भारत में दमन और दासत्व का अंधकार जितना सघन था संघर्ष भी उतना ही प्रबल हुआ । संघर्ष सशस्त्र और सामूहिक भी हुआ और व्यक्तिगत भी । स्वतंत्रता केलिये अंग्रेजों से हुये संघर्ष की यह विशेषता थी कि जितना संघर्ष रियासतों या उनकी सेना ने किया इससे अधिक जन सामान्य ने संघर्ष किया । जन सामान्य के संघर्ष में तीन प्रकार की झलक मिलती है । एक संगठित सशस्त्र संघर्ष, क्राँतिकारी संघर्ष और फिर अहिसंक आँदोलन । भारत का शोषण और दमन करने केलिये अंग्रेजों ने एक विशेष कूटनीति अपनाई थी। उन्होंने पहले अपनी "बाँटों और राज्य करो" नीति के अंतर्गत स्थानीय शासकों में अविश्वास, ईष्र्या या प्रतिस्पर्धा पैदाकर उन्हें अलग अलग किया । फिर जमींदारों और साहूकारों का नेटवर्क बनाया । अंग्रेज इनके माध्यम से शोषण और दमन करते थे । यही उनकी सत्ता संचालन क नीति थी । इसीलिए आरंभिक वनवासी संघर्ष में जमींदारों और साहूकारों के विरुद्ध संघर्ष की झलक दिखाई देती है । लेकिन भारतीय समाज को अंग्रेजों की यह कूटनीति समझ आई और वे सीधे अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष केलिये एक जुट हुये । इसी एकजुटता का स्वरूप थी 1857 की सशस्त्र क्रांति। जिसमें राजा भी थे और सैनिक भी, राजरानियाँ भी थीं और नगर बधुयें भी । वनवासी भी थे और नगर वासी भी । इस संघर्ष में भारतीय समाज जन की अद्भुत एकजुटता थी । लेकिन कुछ स्थानीय कारणों से संघर्ष सफल न हो सका । इस सशस्त्र क्रांति से पहले भी नगरीय और रियासत क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर जन संघर्ष आरंभ हो गये थे । इनकी शुरुआत 1766 से देखने को मिलती है । इनमें बंगाल, बिहार और ओड़िशा और झारखण्ड क्षेत्र में क्राँतिकारी जगन्नाथ सिंह, सुबल सिंह और श्याम गुंजम के नेतृत्व में हुआ संघर्ष, 1771 में चुआड़ विद्रोह, इसी वर्ष क्राँतिकारी बिष्णु मानकी के नेतृत्व में सशस्त्र संघर्ष, बंगाल के निकट रंगपुर में 1782 को संघर्ष आरंभ हुआ जो लगभग एक वर्ष चला । 1798 में झारखण्ड के विष्णु मानकी ने क्रांति का शंखनाद किया । 1798 से 1799 तक भूमिज विद्रोह, 1800 में पलामू संघर्ष, और तमाड़ क्षेत्र में मुण्डा संघर्ष हुआ । 1807 के दौरान दुखन मानकी के नेतृत्व में, और 1819-20 में बुंडू और कोंटा के नेतृत्व में। हो विद्रोह तब हुआ जब हो समुदाय पहली बार 1820 से 1821 तक पश्चिमी सिंहभूम क्षेत्र में सशस्त्र संघर्ष  हुआ । क्राँतिकारी गंगा नारायण सिंह के नेतृत्व में इतिहास प्रसिद्ध बंगाल का भूमिज विद्रोह हुआ । झारखण्ड और बिहार में कोल, भूमिज, मुण्डा और उराँव वनवासी समाज का संघर्ष लंबे समय तक चला ।
इसके अतिरिक्त 1872 का कूका संघर्ष संघर्ष, क्राँतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के के नेतृत्व में चला मुक्ति संघर्ष, 1897 के आसपास चाफेकर बंधुओं का बलिदान, 1905 का बंग-भंग आंदोलन, इन्हीं दिनों यूरोप, अमेरिका, कनाडा सहित विभिन्न देशों में भारतीय क्रांतिकारियों के मुक्ति संग्राम, गदर पार्टी, हिंदुस्तान प्रजातंत्र  संघ जैसी संस्थाओं की स्थापना आदि ऐसे कार्य थे जिससे अंग्रेजों को भारत में शासन चलाना कठिन हो गया था ।
स्वतंत्रता प्राप्ति केलिये अहिसंक आँदोलन की शुरुआत 1905 से हुई । तब अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक आधार पर बंगाल के विभाजन का निर्णय लिया था । इस के विरुद्ध जन सामान्य ने आवाज उठाई । किसी के हाथ में कोई अस्त्र शस्त्र नहीं था । प्रभातफेरी और सरकार का ध्यानाकर्षण करने केलिये जन सामान्य सड़कों पर आया। यह भारत की सामाजिक जाग्रति के कारण संभव हुआ था । सामाजिक जागरण की नींव 1890 के आसपास पड़ गई थी । तब आर्यसमाज ने पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान आदि क्षेत्रों में स्वत्व जागरण अभियान छेड़ा था, बंगाल में बंकिमचंद्र चटोपाध्याय का वंदेमातरम गीत जन सामान्य की जुबान पर चढ़ रहा था और महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक ने सामूहिक गणेश पूजन आरंभ की थी । इससे जन चेतना जागृत हुई और 1905 में आरंभ हुये इस अहिंसक आँदोलन में इस जन जागरण का प्रभाव दिखा । इस आँदोलन को गति मिली गाँधी जी के दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के बाद । उनके आने के बाद संघर्ष की दिशा अहिसंक आँदोलन के रूप में बलवती होती गई। यद्यपि क्राँतिकारी आँदोलन भी सक्रिय रहा लेकिन समय के साथ क्राँतिकारी आँदोलन में गति कमजोर पड़ी और अहिसंक आँदोलन तेज हुआ । इसके अंतर्गत देशभर में प्रभातफेरी निकलने लगीं, खादी और चरखा अभियान चले । इस धारा में पहला बड़ा आँदोलन 1921 से असहयोग आँदोलन, फिर नमक सत्याग्रह और अंत में 1942 का "अंग्रेजों भारत छोड़ो आँदोलन बहुत प्रभावशाली रहे । इन आदोलनों केलिये गाँधी जी का आव्हान अहिसंक था फिर भी लगभग सभी आदोलनों में गोलीकांड हुये और आँदोलन कारी बलिदान हुये । 1942 के आँदोलन में तो सौ से अधिक स्थानों पर गोलियाँ चलीं और लोग बलिदान हुये । इस आँदोलन की विशेषता यह थी कि देशभर में गाँधी जी सहित सभी काँग्रेस नेता बंदी बना लिये गये थे । फिर भी आँदोलन न रुका । यह आँदोलन जन सामान्य का आँदोलन बन गया था ।
15 अगस्त का दिन भारत की स्वतंत्रता केलिये हर्ष उल्लास और आनंदोत्सव का दिन तो है । और साथ भविष्य के भारत निर्माण के संकल्प का भी दिन है । अतीत में ज्ञान और धन संपन्नता के शिखर पर रहा है । इसीलिए पूरे संसार ने "विश्व गुरु" और "सोने की चिड़िया" कहकर पुकारा था । अब भारत और भारतीयों के पास  अपने पुराने सम्मान को प्राप्त करने का अवसर है । भारत के पास संसार में सर्वाधिक युवा शक्ति है । युवाओं में प्रतिभा है । भारतीय युवाओं की प्रतिभा और मेधा की झलक आज दुनियाँ का प्रत्येक देश देख रहा है । इन युवाओं की शक्ति से भारत ने अपनी विकास गति तेज की है । यह तेजी केवल विश्व की पाँचवी शक्ति बनने में ही नहीं अपितु अंतरिक्ष विज्ञान, प्रतिरक्षा तकनीकि और औषधि निर्माण में भी उत्कृष्टता की ओर बढ़ रहा है । अंतरराष्ट्रीय समस्याओं के निधान में भी अब भारत की राय महत्वपूर्ण है । यह विकास गति 2047 तक विश्व शक्ति बनने का सुखद संकेत कर रही है ।
यदि हमें 2047 तक विकसित राष्ट्र के स्थान पर पहुँचना है, तो "श्रेष्ठ भारत"  मंत्र को जीवन में डालकर आगे बढ़ना होगा । इसके लिये भारत के प्रत्येक नागरिक के जीवन में दोनों प्रकार के संकल्प आवश्यक हैं। एक निजी जीवन जीने का संकल्प और दूसरा सार्वजनिक जीवन का संकल्प । व्यक्तिगत जीवन में सत्य स्वत्व का जागरण सभी भारतीय नागरिकों को आत्म अनुशासित होकर स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को प्राथमिकता देनी होगी । दूसरा अपने नागरिक कर्तव्यों का पालन आदर्श व्यवहार तीसरा पर्यावरण का संरक्षण ताकि वातावरण शुद्ध रहे और आरोग्य की स्थिति सशक्त हो । चौथी  सामाजिक समरसता । परस्पर कोई भेदभाव न हो  और अपने परिवार एवं  कुटुम्ब का सशक्ति करण । इन पाँच सूत्रों के पालन का संकल्प व्यक्तिगत जीवन में हो और सार्वजनिक जीवन में शुचिता और आदर्श कार्यशैली की हो । हम जो कार्य कर रहे हैं। वह किसी कार्यालय में काम करने का हो, सड़क पर चलने का हो अथवा या किसी कारखाने में कोई वस्तु उत्पादन का कार्य हो इन सबमें ईमानदारी और गुणवत्ता होनी चाहिए। हमारा यह बाह्य व्यवहार भारत के सम्मान को बढ़ाने वाला होगा । इस दिशा में वर्तमान प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की वे दोनों मंत्र "लोकल फार वोकल" और "जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट।" पर अमल करना होगा ।  यदि हमारे विचार, हमारी भाव भाषा, हमारा आचरण, हमारे कर्म कर्त्तव्य श्रेष्ठ होंगे हमारा उत्पादन और सेवाएं होंगी तो भारत को सर्वश्रेष्ठ स्थान पर पहुँचने से कोई रोक नहीं पायेगा ।
आने वाला समय चुनौतियों से भरा होगा । भारत की सीमा से जुड़े देशों में जो सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हो रहे हैं इनसे कुछ नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है । प्रगति की दिशा में भारत आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। उसकी यह प्रगति यात्रा में अवरोध उत्पन्न करने के षड्यंत्र भी हो सकते हैं। इसे समझना कोई मुश्किल नहीं है । भारत के आंतरिक जीवन में तनाव उत्पन्न करने के षड्यंत्र पहले भी हुये हैं और अभी भी हो रहे हैं।
 यदि भारत प्रगति कर रहा है, 2047 में विश्व शक्ति के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है तो विश्व की विघ्नसंतोषी शक्तियाँ इसमें अवरोध करने के षड्यंत्र करेगीं इसके निशान भविष्य की दीवार पर उभरने भी लगे हैं। इसलिये प्रत्येक भारतवासी को अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है । इसके लिये स्वाधीनता दिवस के उत्सव के साथ सावधानी और भविष्य के लक्ष्य को पूरा करने का संकल्प भी साथ लेना होगा ।

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