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क्या बांग्लादेश की अस्थिरता के पीछे एक नया देश बनाने की साजिश तो नहीं ?

Date : 14-Aug-2024
  •  क्या हैं बांग्लादेश म्यांमार और भारत की वर्तमान परिस्थिती?

क्या आपने कभी सोचा है डीप स्टेट क्या है? यूएसए कैसे दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करता है। और कैसे मणिपुर म्यांमार और बांग्लादेश के सभी घटनाएं एक दूसरे से संबंधित है। यह सभी घटनाएं एक व्यापक वैश्वीक रणनीति का हिस्सा है। भारत की भूमिका इन सब में अपने हितों की सुरक्षा को लेकर होनी चाहिए।

इन परिस्थितियों में तीन घटकों की सबसे अधिक भूमिका है जो हैं भारत, चीन और अमेरिका। चीन कभी नहीं जाएगा बांग्लादेश में इस तरह की परिस्थितियाँ बने जबकि अमेरिका और भारत के अपने-अपने सामरिक हित इन परिस्थितियों से जुड़े हुए हैं। जहां एक ओर अमेरिका भारत और चीन को नियंत्रित करने के लिए यहां पर अपना एक सैन्य अड्डा चाहता है। वहीं भारत चिकन नेक की समस्या का स्थाई समाधान और नॉर्थ ईस्ट को सुरक्षित करना चाहता है।
आरोप लग रहे हैं कि अमेरिकी सरकार ने बांग्लादेश के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप किया। यह तर्क दिया जा रहा है की अमेरिका ने लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव को बढ़ावा देने की आड़ में कई सारे प्रतिबंध लगाए कुछ लोगों का मानना है यह कार्यवाही बांग्लादेश में राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने का एक रणनीतिक हिस्सा है।बांग्लादेशी अधिकारियों ने दावा किया है कि उनके पास बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के कार्यवाहक प्रमुख और खालिदा जिया के बेटे तारिक रहमान और सऊदी अरब में आईएसआई अधिकारियों के बीच बैठकों के सबूत हैं। सब जानते हैं आईएसआई सीआईए के इशारे पर काम करता है। बांग्लादेश इंटेल रिपोर्ट ने दावा किया कि 
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भी दावा किया था की बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्सों को काटकर एक नया ईसाई देश बनाने की साजिश रची जा रही है। यूएसए उनसे एक हवाई पट्टी बनाने की मांग भी कर रहा था। अमेरिका ने बांग्लादेश नेशनल पार्टी और उसके सहयोगी जमात-ए-इस्लामी को भी समर्थन दिया था। गौरतलब है कि जमाते इस्लामी बांग्लादेश बनने के बाद से ही कई तरह की अस्थिरता की गतिविधियों में शामिल रहा है और कहीं ना कहीं पाकिस्तान का समर्थक भी है। खालिदा जिया और सेना के घटकों का भी इनको साथ है।
बांग्लादेश की सबसे बड़ी समस्या अस्थिरता और अराजकता रही है। बांग्लादेश बनने के बाद से कभी भी सरकार पूर्ण मजबूती के साथ स्थिरता से नहीं चल पाई। मुजीबुर रहमान ने भारत के सहयोग से मुक्ति वाहिनी बनाई और बांग्लादेश का गठन किया। परंतु सेना में गुटबाजी और महत्वाकांक्षाएं होना के कारण वह 3 साल बाद ही लगभग पूरे परिवार सहित सेना द्वारा मार दिए गए। मुजीबुर रहमान की दो बेटी शेख हसीना और उनकी बहन शेख रिहाना ही बचीं, जो उस समय देश से बाहर थीं। जिया उर रहमान मिलिट्री कमांडर थे जिसने शेख मुजीबुर रहमान का आजादी के संग्राममे साथ दिया। शेख मुजीब की हत्या के बाद उन्होंने देश का शासन संभाला। वह ही शेख हसीना को बांग्लादेश वापस लेकर आया और उसे राजनीति में स्थापित किया बाद में उसने अपनी पत्नी बेगम का नेताजी को भी राजनीति में उतार दिया। 1977 में राष्ट्रपति बन बैठा और चार साल बाद 1981 में उनकी भी सैन्य तख्तापलट में हत्या कर दी गई। 
वहां के कट्टर मुस्लिम का एक धड़ा पाकिस्तान समर्थक है जो भारत विरोधी हैं। खालिदा जिया के समर्थक मानते हैं कि बांग्लादेश को पाकिस्तान के साथ ही रहना चाहिए था और भारत ने हस्तक्षेप कर उनका नुकसान किया है। वहां पर अरब देशों से पेट्रो-डॉलर फंडिंग वाले कट्टरपंथी तब्लीगियों का भी अच्छा प्रभाव बनता जा रहा है। जमात-ए-इस्लामी भी विदेशी फंडिंग पाती है साथ ही वह आईएसआई और सीआईए के संपर्क सहयोग में भी है। 
वर्तमान में केवल शेख हसीना ही भारत समर्थक और सहयोगी हैं औरअमेरिकन डीप स्टेट को नापसंद है। अब अंतरिम सरकार प्रमुख मोहम्मद यूनुस को बनाया जा रहा है जो 1984 में माइक्रोफाइनेंस स्कीम के नाम पर गरीब बांग्लादेशी नागरिकों को विदेशी पैसे बांटकर उनका दोहन किया। बांग्लादेश की गरीबी में कोई सुधार नही आया परंतु विदेशी धन के माध्यम से बांग्लादेश के लोगों और अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने का प्रयास किया जिसकी शेख हसीना प्रबल विरोधी है। इनपर टैक्स चोरी और अत्याधिक ब्याज से लोगों के दोहन के आरोप लगते रहे साथ ही यह विदेशी प्रतिनिधित्व के प्रबल समर्थक हैं।
वही म्यांमार को देखें तो उसका संघर्ष ब्रिटिश औपनिवेशिक विरासत की देन है। म्यांमार में गृह युद्ध दुनिया का सबसे लंबा चलने वाला युद्ध है, जो 1948 से चल रहा है। बर्मा के विभिन्न क्षेत्रों को स्वायत्तता या स्वतंत्रता का वादा करके अंग्रेजों ने जानकर विभिन्न गुटों में मतभेद छोड़े। इसके परिणामस्वरूप, देश के सीमांत क्षेत्रों में क्रिस्चियनिटी को बढावा देने की नीति से तनाव पैदा हुआ। म्यांमार का संघर्ष मुख्य रूप से राज्य बनाने वाले बर्मी बहुसंख्यकों को राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों के मध्य है। ये अल्पसंख्यक मुख्य रूप से सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित हैं, जबकि बर्मी देश के मध्य और दक्षिणी हिस्सों पर हैं।
कई अल्पसंख्यक समूह प्राकृतिक संसाधनों, जुए, ड्रग्स या विदेशी सहायता (खासकर मिशनरीज) के माध्यम से खुद को बनाए रखते हैं। वह अक्सर चीनी और अमेरिकन हथियारों की सहायता से संघर्ष को कम तीव्रता पर जारी रखते हैं, जिससे इसकी निरंतरता बनी रहती है। ऐसा करने के पीछे ड्रग्स और जंगल पहाडों पर मिलने वाले आर्थिक संसाधन के माध्यम से होने वाली आय भी कारण है। 
शेख हसीना जिस ईसाई-यहूदी लोगों का एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने के प्रयासों की ओर इशारा कर रही थीं, वह वहां रहने वाले ईसाई धर्म में परिवर्तित हो चुके समूहों की पुरानी मांग है। ईसाई राष्ट्र "ज़ोगाम", जिसे "ज़ालेंगम" [स्वतंत्रता की भूमि] की तर्ज पर कहा जाता है, एक प्रस्तावित कुकी राज्य है। इस अलग राष्ट्र में म्यांमार के सागाइंग डिवीजन और चिन राज्य के बड़े हिस्से, भारतीय राज्य मिज़ोरम और मणिपुर के कुकी-बसे हुए इलाके और बांग्लादेश के चटगाँव डिवीजन के बंदरबन जिले और आस-पास के इलाके शामिल करने का विचार है। अमेरिका समेत यूरोपियन समुदाय इस मांग को हवा देता रहता है और कुकी समुदाय का सहायक भी है।
यह क्षेत्र कुकी-चिन आतंकवादी समूहों के उग्रवाद से जूझ रहा है जिसमे ज़ोमी, चिन-कुकी-मिज़ो जातीय समूह शामिल है। भारत, म्यांमार और बांग्लादेश के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले एक जातीय समूह हैं। उनकी उत्पत्ति म्यांमार की चिन पहाड़ियों और भारत में मणिपुर, मिज़ोरम और नागालैंड के आस-पास के क्षेत्रों से जुड़ी हुई है। जहां वो बाहर से धीरे धीरे इन क्षेत्रों में प्रवास करके बस गए और अलग-अलग समुदायों का निर्माण किया।
शेख हसीना के साथ सीआईए बांग्लादेश को अमेरिकी सेना के लिए दक्षिण एशिया को नियंत्रित करने के लिए एक सैन्य हवाई पट्टी बनाने में विफल रही। इस सैन्य अड्डे और कुकी चिन के अपने समर्थकों के साथ अमेरिका बहुत आसानी से दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भारत और चीन को भी नियंत्रित कर सकता है। यही कारण रहा मणिपुर भी पिछले डेढ़ दो साल से अशांत बना हुआ है।
मुस्लिम राष्ट्र में अमूमन या तो राजशाही है या फिर सैन्य शासन है। उन सब का यह दुर्भाग्य है कि जब भी लोकतंत्र की बहाली होती है तो वहां पर अस्थिरता और अराजकता का माहौल बन जाता है। अपनी के कारण प्रवृत्ति के कारण माएस्ट्रो और वहां की जनता को बरगलाना यूरोपीय अमेरिकन देशों के लिए बहुत ही आसान हो जाता है और वह अपना हित साधने के लिए इनका इस्तेमाल करने से नहीं चूकते। पाकिस्तान तो पहले ही अमेरिका का पिछलग्गू है और इसकी आईएसआई को सीआईए का एक नौकर सरीखा समझ सकते हैं।  आईएसआई वैसे भी सीआईए के ही पैसों पर पलती है। ऊपर से पाकिस्तान अपने मरते हुए कपड़ा उद्योग को बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा करके जिंदा करने की एक कोशिश भी कर रहा है। पाकिस्तान के अपने  हित हैं और बांग्लादेशी विपक्ष के अपने हित जो एक दूसरे के हित साधकर बांग्लादेश का नुकसान करने में तुले हुए हैं। भारत में भी कुछ नेता अपने हित साधने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकते हैं और पाकिस्तान के साथ मिलकर कार्य भी कर सकते हैं, हमें ऐसे नेताओं से सावधान रहने की जरूरत है।
भारत सरकार ने मणिपुर में अवैध ड्रग्स की खेती पर लगाम लगाई और व्यापार को बंद करने के उद्देश्य से वहां फसल को आग लगा दी। इसके बाद ही वहां पर चीन और अमेरिका प्रायोजित हिंसा भड़क उठी। सेना की कार्यवाही में कोकिला उग्रवादियों की भी काफी कमर टूटी है इसलिए मणिपुर को अशांत किया गया और हमारा पूरा विपक्ष भी टूलकिट लेकर मणिपुर के पीछे कूद पड़ा। वहां पर नेहरू ने भारतीय साधुओं के प्रवेश पर रोक लगा दी थी और यूरोपीय मूल के वेरियर एल्विन को उत्तर पूर्वी मामलों पर सलाहकार नियुक्त किया था। ईसाई मिशनरी को बढ़ावा देने के लिए हिंदू साधुओं को नागालैंड और मणिपुर के हिस्सों में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। परिणाम: नेहरू के शासन में ही नागालैंड ईसाई बहुल बन गया। आज, नागालैंड में लगभग 90% ईसाई हैं। दूसरी कसर पूर्वोत्तर में इनर लाइन परमिट लगाकर उस हिस्से को भारत से लगभग अलग थलग कर दिया। 
चर्च, खासकर अमेरिका स्थित बैपटिस्ट चर्च इस “ज़ो-यूनिफिकेशन” मांग को भड़का रहा है। इन चर्च निकायों के अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) से करीबी संबंध है। मणिपुर संघर्ष भारत का आंतरिक मामला होने के बावजूद, WKZIC (World Kuki-Zo Intellectual Council) के कदम विदेशी संस्थाओं को भारत की क्षेत्रीय अखंडता पर सवाल उठाने का अवसर देते हैं।
तो ऐसे समय में भारत की क्या भूमिका होनी चाहिए। भारत की भूमिका स्वहित साधक की ही होनी चाहिए। मेरे विचार में भारत की मोदी सरकार इस बात को बहुत गहराई से समझती है और सभी आवश्यक कदम उठा रही है। आगे भी परिस्थिति के अनुसार सभी कार्य किए जाएँगे। मेघालय ने बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा पर तत्काल प्रभाव से रात्रि कर्फ्यू लगा दिया है। पीएम मोदी के आवास पर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) की बैठक हुई है। BSF ने 4,096 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा पर अपनी सभी संरचनाओं में "हाई अलर्ट" जारी किया है। शेख हसीना को नई दिल्ली में एक गुप्त और सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है।
शेख हसीना का भारत आना और डोभाल जी का उनसे मिलकर भारत में शरण देना इस ओर इशारा है। शेख हसीना के बेटे ने कहा है कि अपदस्थ प्रधानमंत्री देश में चुनाव से पहले बांग्लादेश लौटना चाहते हैं। हसीना के पार्टी के लोगों की हत्या कर दी गई है और प्रदर्शनकारियों ने उनके आवास पर धावा बोल दिया है। हसीना क्यों और कैसे लौटने की योजना बना रही हैं? इसके पीछे भी भारत की रणनीति हो सकती है। अगर सीआईए अमेरिकी हितों के लिए लोकतंत्रों को बाधित करना जानता है, तो हम अपने हितों के लिए उन्हें वापस लाना जानते हैं। शायद एक या दो साल में, पूरी संभावना है कि शेख हसीना प्रधानमंत्री के रूप में वापस आ जाएँगी।
भारत के सामने जहां एक ओर मणिपुर समस्या है वहीं चिकन नैक का स्थाई समाधान भी बांग्लादेश के माध्यम से निकल सकता है। दूसरी ओर त्रिपुरा तथा बांग्लादेशी शरणार्थियों की भी समस्याएं हैं जो कि शेख हसीना और उनके नेटवर्क के माध्यम से सुलझ सकती हैं। ऐसा लगता है भारत ने शेख हसीना के बांगलादेशी नेटवर्क के साथ काम करना आरंभ भी कर दिया है जिसका परिणाम भी दिखने लगा है। यह भारत की कूटनीतिक ताकत का ही परिणाम है की एक हसीना का बेटा अब उन्हें वर्तमान प्रधानमंत्री बता रहा है। बांग्लादेश में हिंदू संगठित होकर खड़ा हुआ तो उसमें भारत भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में बहुत गहरे और ऐतिहासिक मतभेद हैं। इनको उभारकर सतह पर लाने से और बढ़ाने से भारत अपना हित सकता है यह भी एक संभावना है। 
बांग्लादेश मुख्ता भारत और व्यापार से जुड़ा हुआ है म्यांमार बॉर्डर पर उसकी कोई विशेष लाभ नहीं होता क्योंकि वहां पर जंगलों में क्रिश्चियन जनजातियों का कब्जा है जो बहुतायत में ड्रग्स और अवैध उगाही के धंधे में लिप्त हैं। बांग्लादेश का पूरा पेपर व्यापार भारत के माध्यम से ही चलता है। बांग्लादेश के 25 से 30% कपड़ा उद्योग पर भारत के व्यापारियों का कब्जा है। बांग्लादेश में फल सब्जियों से लेकर चावल प्याज लहसुन सब भारत से ही जाता है। वहां पर निर्माण के लिए प्रयुक्त होने वाला काला पत्थर झारखंड के पाखुड़, असम और गुजरात से मुख्यतः जाता है। ऐसे ही अनेक अन्य निर्माण सामग्रीयाॅ और बुनियादी सामान भारत से आता है। बांग्लादेशी बखूबी जानते हैं चीन पर भरोसा नही किया जा सकता। वहां के डेवलपमेंट के लिए भारत सरकार बहुत सा आर्थिक सहयोग भी दे रही है। भारत तिब्बत, ताइवान, बलूचिस्तान, सिंध, खैबर पख्तूनवा, पंजाब और भी बहुत सारे खेल खेल सकता है और सारे विकल्प खुले हैं। 
भारत में बहुत से लोग चाहते हैं कि बांग्लादेश का विभाजन हो जाए। भारत भी शायद ऐसा कुछ चाहेगा की कम से कम कुछ भूभाग पर भारतीय नियंत्रण हो जिस्से त्रिपुरा और चिकन नैक का स्थाई समाधान हो सके। मणिपुर समस्या पर भारत म्यांमार के साथ मिलकर काम कर ही रहा है। अमेरिका भी बांग्लादेश का विभाजन अपने तरीके से चाहता है परन्तु वह भारत के हित में नही होगा और उसे भारत कभी भी स्वीकार नहीं करेगा। यह कूटनीति और राजनीति है और राजनीति में शतरंज की चाले होती हैं जिनको बहुत सोच समझकर चला जाता है। जो लोग इसे दंगल या दौड़ समझकर रेस में नंबर वन आने के लिए लालायित हैं (जैसे सभी हिंदुओ को भारत में शरण देने वालों से विनती है कम से कम एक परिवार को वे अपने घर में शरण दे दें। साथ ही बांग्लादेश पर हमला करने के पक्षधर लोग अमेरिका-चीन पाकिस्तान की प्रतिक्रिया का भी आंकलन कर लेते) उनको यह समझना होगा कि यह क्षणिक आवेश में होने वाला कोई समाधान नही है जो कल के कल निकल जाएगा। अच्छा होगा हम अपनी राष्ट्रीय हित की शुभचिंतक सरकार के निर्णयों के साथ रहना सीख लें वह हमसे कहीं दूर की सोच और निर्णय क्षमता रखते हैं।

 


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