भारत विभाजन : रास्‍वसंघ और वो दिल्ली पर पाकिस्तानी कब्जे की योजना... | The Voice TV

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भारत विभाजन : रास्‍वसंघ और वो दिल्ली पर पाकिस्तानी कब्जे की योजना...

Date : 14-Aug-2024

वक्‍त गुजरते देर नहीं लगती, अब देखते ही देखते 78 वर्ष बीत गए, वो रात विभाजन की थी। जब एक अखण्‍ड देश दो भागों में बंट गया। जो कल तक हमारे थे वे पराए हो गए थे।  इस्‍लाम की आंधी ने मानवता की सारी सीमाएं तोड़ दी थी, गैर मुसलमान निशाने पर था, उससे पाकिस्‍तान छोड़कर जाने के लिए कहा जा रहा था। लाशों के ढेर लग गए थे। आंकड़ों में यह बात कई अध्‍ययनों में सामने आ चुकी है, डेढ़ करोड़ लोगों का विस्थापन और 12लाख से 15 लाख लोगों की हत्या इस भारत विभाजन में कर दी गई थी। लोग लुटे-पिटे शेष खण्‍ड‍ित भारत में आ रहे थे, क्‍योंकि यही उनके लिए हिन्‍दुओं का देश था। वहीं, कुछ ऐसे भी हिन्‍दू थे जो हर हाल में अपनी जमीन नहीं छोड़ना चाहते थे, उनका कहना था यहीं जन्‍म लिया है तो मरेंगे भी यही और इस प्रकार के कई लोग कष्‍ट में रहे लेकिन पाकिस्‍तान में ही रहे। उस वक्‍त बहुत कुछ था जो हमारा था, वह प्राचीन विरासत, वर्षों वर्ष का अध्‍ययन, ज्ञान परंपरा अब भारत की नहीं रही थी। पवित्र हिंगलाज देवी का मंदिर, ढाकेश्वरी मां भगवती का मंदिर,  गुरु नानक देव  का जन्मस्थान ननकाना साहिब समेत बहुत कुछ भारत से छिन चुका था। लेकिन इतना सब होने के बाद भी मुसलमान मानने को तैयार नहीं थे। अक्‍सर यह आरोप लगाया जाता है कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने भारत विभाजन के समय क्‍या किया?  

वास्‍तव में यहां सभी को समझना होगा कि 1947 का विभाजन, सीधे-सीधे मत, पंथ और मजहब के आधार पर था। तत्‍कालीन समय में डॉ. भीमराव आम्‍बेडकर इस बात पर जोर दे रहे थे कि भविष्‍य के भारत में साम्‍प्रदायिकता के स्‍तर पर शांति बनाए रखना है तो सभी मुसलमानों को पाकिस्तान भेज दिया जाए। उस वक्‍त इसी आधार पर नए बने पाकिस्‍तान ने अपने हिस्‍से में वह कई जगह भी ले ली थीं, जहां बहुसंख्‍यक हिन्‍दू था, फिर उसमें लाहौर भी था और अन्‍य स्‍थान भी। पर कांग्रेस के बड़े नेताओं जवाहरलाल नेहरु और मिस्‍टर गांधी के सामने  डॉ. आम्‍बेडकर की एक न चली। सरदार वल्‍लभ भाई पटेल चाहकर भी आम्‍बेडकर का साथ नहीं दे पाए, जो बड़ा काम जनसंख्या की अदला-बदली का होना था भारत-पाकिस्‍तान दोनों देशों के बीच वह नहीं हुआ  । उधर, पाकिस्‍तान में इस्‍लामवादी हर हाल में अधिक से अधिक हिन्‍दुओं को भारत में भेज देना चाहते थे, सो वह अपनी योजना में सफल रहे। वहीं, भारत ने अपनी जनसंख्‍या भी खोई और भूमि भी। 
संयोग द‍ेखिए; जिस इस्‍लाम‍िक कट्टरता के आधार पर पाकिस्तान और बाद में टूट कर बांग्लादेश बना दोनों ही पूरी तरह से मुस्लिम राष्ट्र बन गए किंतु भारत पंथ निरपेक्ष राष्‍ट्र बन गया। वह बहुसंख्‍यक हिन्‍दू होने के बाद भी एक हिन्‍दू राष्‍ट्र नहीं है। विभाजन तो देश का जब हुआ, तब हुआ लेकिन इस्‍लामिक कट्टरवादी अब भी शेष भारत को तोड़ने में लगे हैं । उसे गजबा-ए-हिन्‍द बना देना चाहते हैं। जिसमें कि एक चुनौती के रूप में हर साल देश की सुरक्षा एजेंसियां कई चौकानेवाले खुलासे करती हैं। कभी 2025, कभी 2027, कभी 2050 और कभी 2055 तक भारत को इस्‍लामिक राज्‍य बना देने के स्‍वप्‍न देखे जा रहे हैं । चुनौती शेष भारत के सामने आज भी अपार हैं। अपने को बनाए रखने की और अपने को बचाए रखने की । स्‍वाधीन भारत के सामने भी एक चुनौती अचानक से 1947 में अगस्‍त बीतने के साथ ही सामने आई थी। लाल किले पर पाकिस्‍तानी झंडा फहराने की, किंतु राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ ने इसे नाकामयाब कर दिया था। 
''6 व 7 सितम्बर 1947 की मध्यरात्रि को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वारा सरदार पटेल को सूचना दी गई कि 10 सितम्बर को संसद भवन उड़ा कर व सभी मन्त्रियों की हत्या करके लाल किले पर पाकिस्तानी झण्डा फहरा देने की दिल्ली के मुसलमानों की योजना है। सूचना क्योंकि संघ की ओर से थी, इसलिये अविश्वास का प्रश्न नहीं था। पटेल तुरन्त हरकत में आए और सेनापति आकिन लेक को बुला कर सैनिक स्थिति के बारे में पूछा। उस समय दिल्ली में बहुत ही कम सैनिक थे। आकिन लेक ने कहा कि आस-पास के क्षेत्रों में तैनात सैनिक टुकड़ियों को दिल्ली बुलाना भी खतरे से खाली नहीं है। कुल मिलाकर आकिन लेक का तात्पर्य यह था कि इतनी जल्दी कुछ भी नहीं किया जा सकता, इसके लिये समय चाहिए। यह सारी वार्ता वाइसराय माउण्टबैटन के सामने ही हो रही थी। लेकिन पटेल तो पटेल ही थे। उन्होंने आकिन लेक को कहा- "विभिन्न छावनियों को सन्देश भेजो, उनके पास जितनी जितनी भी टुकड़ियाँ फालतू हो सकती हैं, उन्हें तुरन्त दिल्ली भेजें।" आखिर ऐसा ही किया गया। उसी दिन शाम से टुकड़ियाँ आनी शुरु हो गईं। अगले दिन तक पर्याप्त टुकड़ियाँ दिल्ली पहुँच चुकी थीं।'' (संदर्भ-विभाजनकालीन भारत के साक्षी, कृष्‍णानंद सागर, पृ.92) 
इसके बाद सैनिक कार्रवाई आरम्भ हुई। दिल्ली के जिन-जिन स्थानों के बारे में संघ ने सूचना दी थी, उन सभी स्थानों पर एक साथ छापे मारे गए। सभी जगह से बड़ी मात्रा में शस्त्रास्त्र बरामद हुए। पहाड़गंज की मस्जिद, सब्जी मण्डी मस्जिद तथा मेहरौली की मस्जिद से सबसे अधिक शस्त्र मिले। अनेक स्थानों पर मुसलमानों ने स्टेन गनों तथा ब्रेन गनों से मुकाबला किया, लेकिन सेना के सामने उनकी एक न चली। 
तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के अनुसार- "मुसलमानों ने हथियार एकत्र कर लिए थे। उनके घरों की तलाशी लेने पर बम, आग्नेयास्त्र और गोला-बारूद के भण्डार मिले थे। स्टेनगन, ब्रेनगन, मोर्टार और वायर लैस ट्रांसमीटर बड़ी मात्रा में मिले। इनको गुप्तरूप से बनाने वाले कारखाने भी पकड़े गए। अनेक स्थानों पर घमासान लड़ाई हुई, जिसमें इन हथियारों का खुल कर प्रयोग हुआ। पुलिस में मुसलमानों की भरमार थी। इस कारण दंगे को दबाने में सरकार को काफी कठिनाई का सामना करना पड़ा। इन पुलिस वालों में से अनेक तो अपनी वर्दी व हथियार लेकर ही फरार हो गए और विद्रोहियों से मिल गए। शेष जो बचे थे, उनकी निष्ठा भी संदिग्ध थी। सरकार को अन्य प्रान्तों से पुलिस व सेना बुलानी पड़ी।" (कृपलानी, गान्धी, पृष्ठ 262-63)
दिल्ली पर कब्जा करने की योजना बनाने वाले कौन थे ये लोग? ये कोई सामान्य व्यक्ति नहीं थे। इनमें बड़े-बड़े मुसलमान सरकारी अधिकारी थे, जिन पर भारत सरकार को बड़ा विश्वास था। इनमें उस समय के दिल्ली के बड़े पुलिस अधिकारी तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी थे, जोकि मुसलमान थे। एक-एक पहलू को अच्छी तरह सोच-विचार करके लिख लिया गया था और वे लिखित कागज-पत्र विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी की ही कोठी में एक तिजौरी में सुरक्षित रख लिए गए थे। उन दिनों मुसलमान बन कर मुस्लिम अधिकारियों की गुप्तचरी करने वाले संघ के स्वयंसेवकों को इसकी जानकारी मिल गई और उन्होंने संघ अधिकारियों को सूचित किया। संघ अधिकारियों ने योजना के कागजात प्राप्त करने का दायित्व एक खोसला नाम के स्वयंसेवक को सौंपा।
खोसला ने उपयुक्त स्वयंसेवकों की एक टोली तैयार की और सभी मुसलमानी वेश में रात को विश्वविद्यालय के उस अधिकारी की कोठी पर पहुँच गए। मुस्लिम नेशनल गार्ड के कार्यकर्ता वहाँ पहरा दे रहे थे। खोसला ने उन्हें 'वालेकुम अस्सलाम' किया और कहा- "हम अलीगढ़ से आए हैं। अब यहाँ पहरा देने की हमारी ड्यूटी लगी है। आप लोग जाकर सो जाओ।" वे लोग चले गए। खोसला के लोग कोठी से उस तिजौरी को ही निकाल कर ट्रक पर रख कर ले गए। उसमें से वे कागज निकाल कर देखे गए तो सब सन्न रह गए। 
''नई दिल्ली में आजकल जो संसद सदस्यों की कोठियाँ हैं, इन्हीं में से ही किसी कोठी में रात को कुछ स्वयंसेवक सरकारी अधिकारियों की बैठक बुलाई गई और दिल्ली पर कब्जे की उन कागजों में अभिलेखित योजना पर मन्थन किया गया। इसी मन्थन में से यह बात सामने आई कि यह योजना इतने बड़े और व्यापक स्तर की है कि हम संघ के स्तर पर उसको विफल नहीं कर सकते। इसे सेना ही विफल कर सकती है। अतः इसकी सूचना हमें सरदार पटेल को देनी चाहिए। फलतः उस बैठक से ही दो-तीन कार्यकर्ता रात्रि को एक बजे के लगभग सीधे सरदार पटेल की कोठी पर पहुँचे तथा उन्हें जगा कर यह सारी जानकारी दी। पटेल बोले- "अगर यह सच न हुआ तो?" कार्यकर्ताओं ने उत्तर दिया - "आप हमें यहीं बिठा लीजिए तथा अपने गुप्तचर विभाग से जाँच करा लीजिए। अगर यह सच साबित न हुआ तो हमें जेल में डाल दीजिए।" इसके बाद सरदार हरकत में आए।''(विभाजनकालीन भारत के साक्षी, कृष्‍णानंद सागर, पृ.94) 
 
 

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