भारतीय सिनेमा और समाज | The Voice TV

Quote :

"मेहनत का कोई विकल्प नहीं, बस मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ते रहो।"

Editor's Choice

भारतीय सिनेमा और समाज

Date : 14-Aug-2024

भारतीय सिनेमा से सामान्य जनजीवन के मन मस्तिष्क का गहरा संबंध रहा। दादा साहेब फाल्के ने जब भारत में  सन् १९१३ में चलचित्र का प्रारंभ किया तब उन्होंने एक धर्म परायण सामाजिकता से परिपूर्ण समाज की कल्पना करते हुए चलचित्रों का निर्माण किया और इसी श्रृंखला में उन्होंने सबसे पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र  बनाई। 

उस समय जब फिल्म निर्माण भारत में प्रारंभ हो रहा था, तब फिल्म निर्माता के मस्तिष्क में समाज निर्माण से राष्ट्र निर्माण की परिकल्पना थी। निश्चित ही सिनेमा संसार ने भारतीय जनमानुष को बहुत अंदर तक प्रभावित किया था । तभी तो भगवान की फिल्में आने के बाद दो-दो वर्षों तक वह थिएटर से उतरती नहीं थी और दर्शक महीनों सिनेमा हॉल में जाकर उन फिल्मों को  देखते थे फिर भी उनका  मन नहीं भरता था। चित्रपट की पटकथा , उसका संगीत उनके वस्त्रों का संयोजन, संवाद,नृत्य प्रस्तुति सभी इतना आकर्षक और प्रभावी रहता था कि उसकी छाप मन में  महीनों तक बनी रहती थी। कुछ दर्शकों की इतनी दीवानगी थी कि वह अपने पसंदीदा कलाकार की फिल्म को पहले दिन पहले शो में जाकर देखते थे और शाम तक वैसे ही वस्त्र को तैयार कर पहन कर फिर शाम का शो देखने जाते थे।  उनके कपड़े हफ्तों बदले नहीं जाते।
जब तक भारतीय सिनेमा में विशुद्ध रूप से स्वस्थ मनोरंजन के भाव को ध्यान में रखकर चलचित्रों का निर्माण किया गया तब तक फिल्में धार्मिक और सामाजिक हुआ करती थी। किंतु भारत की संस्कृति पर आक्रमण करने वाले लोगों ने जब यह देखा कि संपूर्ण भारतीय समाज भारतीय चलचित्र से किस तरह बंधा हुआ है उन्होंने इस क्षेत्र में भी अपनी घुसपैठ प्रारंभ कर दी। धीरे-धीरे पटकथा ,संवाद, गीत संगीत , वस्त्र आदि के माध्यम से उन्होंने हिंदू जनमानस को  अपने ही धर्म, संस्कार, संस्कृति, त्यौहार आदि पर होने वाले छोटे-छोटे नकारात्मक परिवर्तनों को सहजता से स्वीकार करा दिया । जब हम  आगे आकर पीछे मुड़ते है तो हम पाते हैं कि हमने बहुत कुछ खो दिया।
जब तक हम हमारे वर्तमान समाज को सिनेमा की कुरीतियों से बाहर निकाल पाते तब तक दूरदर्शन के स्थान पर निजी चैनलों के माध्यम से जो धारावाहिक हमारे घर-घर परोसे गये  उसने हमारी पारिवारिक परंपरा, रीति रिवाज, संवाद, अस्मिता सबका तना-बना ही तोड़ कर रख दिया। आज इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव हमारी बेटियों पर ,हमारे समाज की मातृशक्तियों पर है। जो अश्लीलता इन धारावाहिकों के माध्यम से हमारे समाज में परोसी गई उसका प्रभाव आज हमें मुख्य मार्ग पर बहुत ही सहजता से देखने को मिलता है। हमारे परिवार की महिलाएँ जिनके लिए कभी परिवार,उसके रीति-रिवाज, संस्कृति त्यौहार प्रमुख थे, आज उनके लिए यह सब गौण हो गया है।
आज से लगभग 5 वर्षों पहले तक भारतीय सिनेमा के श्रेष्ठ कलाकार अमिताभ बच्चन के परिवार को भारतीय समाज में एक आदर्श परिवार के रूप में देखा जाता था और लोग उनके परिवार का उदाहरण देकर वैवाहिक जीवन में अपने कार्य के साथ-साथ परिवार को साथ रखकर चलने की सीख देते थे, किंतु विगत कुछ वर्षों से उस परिवार के प्रत्येक सदस्यों के द्वारा जिस तरीके के उदाहरण समाज में प्रस्तुत किए जा रहे हैं निश्चित ही इसके पीछे भी किसी नए षड्यंत्र का प्रपंच दिखाई दे रहा है। 
भारी संसद में जया बच्चन के द्वारा श्रीमती जया अमिताभ बच्चन बोलने पर विरोध प्रकट करना और केवल  "जया बच्चन"  इस संबोधन से उन्हें संबोधित करने की बात कहना एक विषय,  उनके बहू बेटे अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय के वैवाहिक जीवन जो अभी तक बहुत सहज और संतुलित रूप से चल रहा था विगत कुछ वर्षों से बार-बार समाचार पत्रों में ,मीडिया में ,ई-समाचारों में उनके बीच विवाह विच्छेद के समाचार यह कहीं न कहीं हमारी हिंदू समाज की परिवार व्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। एक और संदेश इसी परिवार से मीडिया के लगभग सभी माध्यमों से प्रचलित है वह यह कि ,जया बच्चन अपनी नातिन नव्या नवेली को राय दें रही है कि यदि आप लिविंग में रहने के बाद विवाह के पूर्व बच्चे को जन्म देती है तो इससे उन्हें (जया को) इससे कोई ऐतराज नहीं है।
आज से पहले जो फिल्में बनाई जाती थी उसके आपत्तिजनक संवादों , गीतों आदि पर सेंसर बोर्ड की कैंची चलती थी किंतु आज सेंसर बोर्ड की नाक के नीचे हिंदू समाज की भावनाओं पर आघात करते हुए ऐसे कितने ही चलचित्र , धारावाहिक सहजता से बनकर समाज में पारोसे जा रहे हैं सेंसर बोर्ड को इसकी कोई परवाह ही नहीं है । वह अपने दायित्वों को अपने उद्देश्यों को भुला बैठा है।
पहले ऐसा कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है किंतु आज ऐसा प्रतीत होता है कि समाज चलचित्र  का दर्पण है - जैसा चल चित्रों के माध्यम से परोसा जा रहा है  समाज भी वैसे ही निर्मित हो रहा है। अब कहानी इससे कहीं और आगे की हो गई है अब परिस्थितियों इससे भी अधिक गंभीर  हो चुकी है अब हमारे अबोध बच्चों के हाथ में मोबाइल जैसे शास्त्रों के माध्यम से ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जो मनोरंजन की सामग्रियां परोसी जा रही है वह भारतीय संस्कृति के विरुद्ध भीषण षड्यंत्र का प्रमाण है।
लव जिहाद जैसे बिंदुओं पर भी सिनेमा संसार के माध्यम से भारतीय समाज में एक नई वैचारिक क्रांति का प्रचार प्रसार किया जा रहा है। आज जो आदर्श सिने परिवार तेजी से षड्यंत्रपूर्वक  आदर्श परिवार की परिभाषा के दायरे से बाहर निकल चुके हैं , उतनी तेजी से हम हमारे समाज को हमारे परिवारों को,हमारी संस्कृति को इनके दुष्प्रभावों से मुक्त नहीं कर सकते। इस गंभीर षड्यंत्र को समझने और समझाने की आवश्यकता है।
 

RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement