अखंड भारत स्मृति दिवस (विभाजन विभीषिका ) दिवस हमे स्मरण दिलाता है, मातृभूमि के उस स्वरूप की जिसका उल्लेख यथाविष्णु पुराण में एक श्लोक में तो ‘भारत एवं भारती’ के रूप में मिलता है
“उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रैश्चैव दक्षिणम, वर्षंतद् भारतंनाम, भारती यत्र संतति।“
अर्थात समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में जो विशाल क्षेत्र स्थित है, उसका नाम भारत है और उसकी संतान को भारती कहते हैं। महाकवि कालिदास ने भी देवतात्मा हिमालय का वर्णन किया है।देशः प्रथवी तस्यांहिमवंस समुद्रन्तर मुदीचीनं
योजन सहस्त्र परिमाणं तिंचक चक्रवर्ती क्षेत्रम।
अर्थात हिमालय से लेकर दक्षिण समुद्र पर्यंत, पूर्व से पश्चिम दिशा में एक हजार योजन तक फैला हुआ भू-भाग चक्रवर्ती क्षेत्र है। यह श्लोक उत्तर एवं दक्षिण की सीमाओं के साथ-साथ भारत के पूर्व-पश्चिम को भी स्पष्ट करता है। अपने प्राचीन साहित्य से यह भी स्पष्ट होता है कि भारत एक देश भी है और एक राष्ट्र भी है बौद्धकाल में हमारी मात्रभूमि भारतवर्ष की वंदना इस प्रकार की गई है।
’पृथिव्यै, समुद्रप्रर्यान्ताय एक राष्ट्र’
पूर्णरूप ध्यान में रख कर ही अपने देश भारतवर्ष का चिंतन करना चाहिए।
