भारत के भविष्य को लेकर जिस तरह के सकारात्मक-सफल रुझान विश्व के बड़े-बड़े आर्थिक विश्लेषकों ने लगाए हैं और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की जो गति इस वक्त देश में चल रही है, उस सब को ध्वस्त करने का काम फिर एक बार विदेशी षड्यंत्र द्वारा भारत में शुरू होता दिख रहा है। अमेरिकी शोध एवं निवेश कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च का अपनी नई रिपोर्ट के माध्यम से यह दूसरा इस प्रकार का बड़ा प्रयास है। आश्चर्य होता है यह देखकर कि उसे हाथों-हाथ लेकर कांग्रेस समेत इंडी गठबंधन अपने ही देश की अर्थव्यवस्था को लेकर आम जन में अविश्वास पैदा कर रहा है, यह दृश्य अकल्पनीय है। इससे साफ है कि बढ़ते और विश्व की तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने जा रहे भारत को कमजोर करने की योजना बहुत गहरी है। ऐसे में कम से कम भारत के विपक्ष से तो यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह देश को आर्थिक मोर्चे पर कमजोर करने का काम करेगा।
बैसे तो बांग्लादेश में हिंसा के मुद्दे पर विपक्ष ने संसद में जैसा भरोसा मोदी सरकार के साथ खड़े होकर दिखाया था, वैसा ही रवैया किसी विदेशी और संदिग्ध शोध एजेंसी की रिपोर्ट पर भी दिखाना चाहिए था। हालांकि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार पर विपक्षी पार्टियां एवं उसके ज्यादातर नेता चुप हैं, जिसकी कि सर्वत्र आलोचना भी हो रही है, क्योंकि यही विपक्ष फिलीस्तीन और गाजा, हमास पर मोदी सरकार पर दबाव बना रहा था कि वह इजरायल को इनके खिलाफ कार्रवाई करने से रोके। यहां वैसा ही विश्वास आज आर्थिक मोर्चे पर राहुल गांधी समेत सभी विपक्षी नेताओं को दिखाना चाहिए था, लेकिन इसके उलट जाकर इस वक्त जो रवैया विपक्ष का दिख रहा है, उसे लेकर कहना यही होगा कि वह देश को कमजोर करने वाला ही साबित हो रहा है।
यहां विपक्ष की सोच यह है कि इससे मोदी सरकार कटघरे में खड़ी हो जाएगी, देश की जनता के सामने कमजोर नजर आएगी। हो सकता है उसका ये सोचना राजनीतिक स्तर पर उसके अपने फायदे के लिए सही कहलाए, किंतु हर बार राजनीतिक सोच सही हो, यह जरूरी नहीं है। इस नकारात्मक व्यवहार से दुनिया भर के निवेशकों में भारत के प्रति अविश्वास पैदा हो रहा है, उसका खामियाजा देश के आम जन भुगतते हैं। आखिर उसकी भरपाई कौन करेगा? आज कांग्रेस, सपा, आप समेत अन्य कई विपक्षी दल जो अर्थ के क्षेत्र में अस्थिरता की छवि भारत की बना देना चाह रहे हैं, उससे इन्हें लाभ तो क्या होगा, हां, इतना जरूर होता दिखता है कि देश में नौकरियों में कमी आ रही है। निर्यात पर इसका बुरा असर पड़ना शुरू हो गया है । कुछ दिन बाद फिर यही विपक्ष राग अलापना शुरू कर देगा कि देश में मोदी सरकार के राज में नौकरियां नहीं है। कुल मिलाकर आर्थिक मोर्चे पर भारत विपक्ष के इस आचरण से कमजोर पड़ता ही दिखा है ।
अमेरिकी शॉर्ट सेलर हिंडनबर्ग ने मार्केट रेगुलेटर सेबी की प्रमुख माधबी पुरी बुच पर अदाणी ग्रुप से मिलीभगत का आरोप लगाया है। भले ही फिर सेबी और अदाणी ग्रुप ने हिंनडबर्ग के सभी आरोपों से इनकार किया और यह सिद्ध करने के लिए कि हिंडनबर्ग ने जो बोला वह सही है, इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन इसके बाद भी झटका स्टॉक मार्केट में दिखा। अधिकतर वैश्विक बाजारों से मिले मजबूत संकेतों के बावजूद भी घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी गिरावट के साथ खुले । अदाणी ग्रुप के सभी शेयरों में बिकवाली का दो कंपनियों को छोड़कर अन्य पर भारी दबाव देखने को मिल रहा है । कंज्यूमर ड्यूरेबल्स को छोड़ निफ्टी के सभी सेक्टर्स के इंडेक्स रेड पर देखे गए और एक ही दिन में हिंडनबर्ग के झटके से अधिकतर वैश्विक बाजारों से मिले मजबूत संकेतों के बावजूद घरेलू इक्विटी बेंचमार्क इंडेक्स सेंसेक्स और निफ्टी में ओवरऑल बीएसई पर लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 2.26 लाख करोड़ रुपये घट गया। यानी निवेशकों की दौलत मार्केट खुलते ही 2.26 लाख करोड़ रुपये डूब गई थी।
सोचने वाली बात है कि यदि राहुल गांधी, जोकि आज के समय में एक संवैधानिक पद पर हैं, नेता प्रतिपक्ष हैं, वे और अन्य विपक्षी नेता इतना अधिक नकारात्मक माहौल नहीं बनाते तो क्या इसका यही असर होता जो देखने को मिला? स्वभाविक है, ऐसा नहीं होता, न ही 2.26 लाख करोड़ रुपये निवेशकों के डूबे होते! अब यह अलग बात है कि 12 अगस्त की शाम होते-होते मार्केट में भारत के शेयर बाजार के प्रति भरोसा वापिस आ गया और उसने हिंडनबर्ग रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया, जिसके चलते निफ्टी-सेंसेक्स बढ़त के साथ हरे निशान में कारोबार करते दिखे। बाजार ने सेबी की सलाह मानी।
वस्तुत: भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने अपनी पहली टिप्पणी में ही साफ कर दिया था कि उसने अडाणी समूह के खिलाफ सभी आरोपों की विधिवत जांच की है। हिंडनबर्ग जिस फंड का जिक्र करते हुए माधबी पुरी बुच उनके पति धवल बुच को घेरने का प्रयास कर रहा है, उसका कोई आधार नहीं, क्योंकि उनके इस पद पर आने के बाद इस प्रकार का कुछ भी नहीं किया गया, जैसा कि हिंडनबर्ग ने दिखाया है । धवल बुच ने भी इस संबंध में अपनी ओर से सही जानकारी दी ही है। उनके कथन को लेकर सेबी का भी अधिकारिक बयान मौजूद है, जिसमें साफ बता दिया गया है कि उनकी चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच ने समय-समय पर संबंधित जानकारी सेबी को दी और संभावित हितों के टकराव से जुड़े मामलों से खुद को अलग रखा है।
अब ऐसे में यहां यह देखकर आश्चर्य जरूर होता है कि जो हिंडनबर्ग रिसर्च, पूंजी बाजार नियामक सेबी को बदनाम करना चाहता है, इसके बहाने वह भारत की अर्थव्यवस्था पर हमला कर रहा है, वह कभी गौतम अडानी को घेरता है तो कभी सेबी को, लेकिन जब पूंजी बाजार नियामक (सेबी) उसे इस तरह से झूठ फैलाने पर कारण बताओ नोटिस जारी करती है तो यही हिंडनबर्ग रिसर्च, जो अपने आप को एक बहुत बड़ा आर्थिक विश्लेषक और शोध संस्थान मानता है, वह उसका जवाब तक नहीं देता। यानी कि आरोप लगाओ और भाग जाओ!
सच कहा जाए तो राहुल गांधी समेत जो भी इस हिंडनबर्ग रिपोर्ट को अपने राजनीतिक फायदे के लिए उसे भुनाने का अवसर मान रहे हैं वह देश को ही कमजोर करने का काम कर रहे हैं। वस्तुत: आज यह सभी को समझना होगा कि अमेरिकी शोध एवं निवेश कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च खुद शेयर मार्केट में अपने फायदे के लिए काम करने वाली एक संस्था है। भारत के शेयर बाजार को धराशाही कर वह उसमें अपना बड़ा फायदा देखती है। पहले भी उसने ऐसा कर अपने लिए आर्थिक सफलता हासिल की थी जिसमें कि भारत को कई हजार करोड़ का नुकसान हुआ था और वर्तमान में भी वह उसी राह पर चल रही है। उसका कुल उद्देश्य हर हाल में अपना लाभ कमाना है। हकीकत इस हिंडनबर्ग रिपोर्ट की यही है कि वह पहले की तरह ही इस बार भी पूरी तरह से झूठी है। अच्छा हो, भारत का विपक्ष इस बात को समझे और उसी अनुरूप आचरण करे। यही देशहित में है।
लेखक:- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
