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जयंती विशेष:- भारतीय अंतरिक्ष के जनक विज्ञानी विक्रम साराभाई

Date : 12-Aug-2024

विक्रम अंबालाल साराभाई एक भारतीय भौतिक विज्ञानी और खगोलशास्त्री थे जिन्होंने अंतरिक्ष अनुसंधान की शुरुआत की और भारत में परमाणु ऊर्जा विकसित करने में मदद की। अक्सर उन्हें " भारतीय अंतरिक्ष का जनक " माना जाता है I साराभाई को 1966 में पद्म भूषण और 1972 में पद्म विभूषण (मरणोपरांत) से सम्मानित किया गया था।

डॉ. साराभाई का जन्म पश्चिमी भारत में गुजरात राज्य के अहमदाबाद शहर में 1919 को हुआ था। साराभाई परिवार एक महत्त्वपूर्ण और संपन्न जैन व्यापारी परिवार था। उनके पिता अंबालाल साराभाई एक संपन्न उद्योगपति थे तथा गुजरात में कई मिलों के स्वामी थे। विक्रम साराभाई, अंबालाल और सरला देवी के आठ बच्चों में से एक थे। अपनी इंटरमीडिएट विज्ञान की परीक्षा पास करने के बाद साराभाई ने अहमदाबाद में गुजरात कॉलेज से मेट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद वे इंग्लैंड चले गए और 'केम्ब्रिज विश्वविद्यालय' के सेंट जॉन कॉलेज में भर्ती हुए। उन्होंने केम्ब्रिज से 1940 में प्राकृतिक विज्ञान में ट्राइपॉस हासिल किया। 'द्वितीय विश्वयुद्ध' के बढ़ने के साथ साराभाई भारत लौट आये और बेंगलोर के 'भारतीय विज्ञान संस्थान' में भर्ती हुए तथा नोबेल पुरस्कार विजेता सी. वी. रामन के मार्गदर्शन में ब्रह्मांडीय किरणों में अनुसंधान शुरू किया। विश्वयुद्ध के बाद 1945 में वे केम्ब्रिज लौटे और 1947 में उन्हें उष्णकटिबंधीय अक्षांश में कॉस्मिक किरणों की खोज शीर्षक वाले अपने शोध पर पी.एच.डी की डिग्री से सम्मानित किया गया।

भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना

कैम्ब्रिज से भारत लौटने के बाद, साराभाई ने अहमदाबाद में एक शोध संस्थान स्थापित किया। 11 नवंबर, 1947 को भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की गई। 1966 से 1971 तक साराभाई ने इस संस्था की सेवा की। 1947 में, साराभाई ने अहमदाबाद टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज रिसर्च एसोसिएशन की स्थापना की और 1956 तक इसके मामलों की देखभाल की। साराभाई ने अहमदाबाद स्थित विभिन्न उद्योगपतियों के साथ मिलकर 1962 में अहमदाबाद में भारतीय प्रबंधन संस्थान की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत

1960 के दशक में भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत हुई। अमेरिकी सैटेलाइट 'सिनकॉम-3' ने संचार उपग्रहों की शक्ति का प्रदर्शन करते हुए 1964 के तोक्यो ओलंपिक का सीधा प्रसारण किया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, अमेरिका के इस कदम को देखकर साराभाई ने भारत के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों के लाभों को पहचाना। रूस द्वारा पहला कृत्रिम पृथ्वी उपग्रह स्पुतनिक 1 लॉन्च करने के बाद, साराभाई ने भारत सरकार को भारत जैसे विकासशील देश के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम के महत्व के बारे में आश्वस्त किया।

परमाणु अनुसंधान में विक्रम साराभाई की भूमिका

1966 में भाभा की मृत्यु के बाद साराभाई को भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। साराभाई ने परमाणु अनुसंधान के क्षेत्र में भाभा के काम को आगे बढ़ाया। भारत के परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना और विकास में उनका भारी योगदान रहा। साराभाई ने रक्षा उद्देश्यों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी के स्वदेशी विकास की नींव भी रखी।

इसरो की स्थापना

इसी INCOSPAR का बाद में पुनर्गठन किया गया और इसे 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान यानि इसरो नाम दिया गया. प्रयासों का ही नतीजा था कि भारत ने 15 अगस्त 1969 को इसरो की स्थापना हुई और उन्हें इसके पहले चैयरमैन के रूप में चुना गया. उनके योगदान के कारण ही उन्हें भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम का जनक या पिता कहा जाता है.

डॉ. विक्रम साराभाई द्वारा स्थापित कुछ सबसे प्रसिद्ध संस्थान हैं:

विक्रम साराभाई एक दूरदर्शी व्यक्ति थे और उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कई संस्थानों की स्थापना की, जिससे भारत को विभिन्न क्षेत्रों में लाभ हुआ। विक्रम साराभाई द्वारा स्थापित कुछ प्रसिद्ध संस्थान निम्नलिखित हैं

पुरस्कार:

शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार , 1962

पद्म भूषण,1966

पद्म विभूषण, मरणोपरांत, 1972

सम्मान:

केरल के तिरुवनंतपुरम में स्थित विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) का नाम उनके सम्मान में रखा गया है

यह ठोस और तरल रॉकेट प्रणोदकों में विशेषज्ञता वाला एक अनुसंधान संस्थान है।

1974 में, सिडनी स्थित अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने सी ऑफ सेरेनिटी में एक चंद्र क्रेटर बेसेल का नाम साराभाई क्रेटर रखने का निर्णय लिया।

विक्रम साराभाई के सम्मान में इसरो ने चंद्रयान 2 और चंद्रयान 3 के लैंडर का नाम 'विक्रम' रखा।

महान वैज्ञानिक साराभाई का निधन

विक्रम साराभाई को 30 दिसंबर, 1971 की रात मुंबई (बॉम्बे) प्रस्थान करने से पहले एमएलवी डिजाइन की समीक्षा करनी थी. तब उन्होंने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति से फोन पर बात की थी मगर बाचतीच के बीच में दिल का दौड़ा पड़ने की वजह से महज 52 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था. अहमदाबाद में उनके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया गया |


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