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संविधान ने भी छह मौलिक अधिकार के साथ ग्यारह कर्तव्य किये हैं सुनिश्चित

Date : 08-Aug-2024

हमारा देश हमेशा से कर्तव्य प्रधान रहा है। भारत भूमि में किसी बच्चे के जन्म लेते उसके साथ कई कर्तव्य भी जन्म लेते हैं, उन कर्तव्यों को निभाते हुए वह उत्कृष्ट लालन पालन, प्रेम, सुख, सम्पत्ति, मान-सम्मान का अधिकारी स्वतः ही बन जाता है। भारत में पहले कभी अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी। आज भी हम अपने परिवारों में दायित्व को महत्व देते हैं। ये भी सच है कि जन्म के साथ ही मनुष्य को कई अधिकार भी मिलते हैं, लेकिन अधिकार अकेला नहीं आता, वह साथ में कर्तव्य भी लाता है। उदाहरण के लिए आप अपने दादा-परदादा के नाम के अधिकारी बनते हो, लेकिन उस नाम को और प्रकाशित करना, आपका कर्त्तव्य बन जाता है। आप अपने माता-पिता के द्वारा प्राप्त प्रेम, लालन-पालन, संपत्ति के अधिकारी बनते हो तो आपका कर्त्तव्य होता कि उनकी आज्ञा मानना, उनकी सेवा करना, उनकी संपत्ति को बढ़ाना। ठीक इसी प्रकार आप अपने कुल, राज्य, देश से कई अधिकार प्राप्त करते हो, तो आपका कर्तव्य होता है कुल की मर्यादा की रक्षा करना। अपने राज्य की कानून व्यवस्था का पालन करना और न्याय व्यवस्था पर विश्वास बनाये रखना। अपने देश की एकता, अखण्डता, सम्प्रभुता और सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना।

वर्तमान परिदृश्य में लोग अपने अधिकारों को लेकर ज्यादा मुखर हो रहे हैं। यह अच्छी बात है पर अपने कर्तव्यों को भुला देना भी ठीक नहीं है। आज की पीढ़ी अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए सड़क पर उतर आती है। कुछ तो हिंसक धरना-प्रदर्शन करने लगते हैं। संविधान का नाम लेकर शोर मचाया जाता है। संविधान की दुहाई देकर अपने अधिकार मांगने वाले नागरिको को देखकर लगता है कि देश का संविधान भी अपनी जरूरतों के हिसाब से पढ़ा जा रहा है। निजी स्वार्थों से घिरे लोग देश को नुकसान पहुंचाने में भी पीछे नहीं हट रहे हैं। मुठ्ठीभर लोग भीड़तंत्र का हिस्सा बनकर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने में जरा भी नहीं संकोच कर रहे हैं। जिस देश में कर्तव्य सर्वोपरि रहे, वहां केवल अधिकारों की गूंज सुनाई देती है। ऐसा क्यों हो रहा है, इसे समझने के लिए हमें इतिहास में झांकना होगा।
पिछले एक हज़ार वर्षों में भारत पर इतने आक्रमण हुए कि उनसे संघर्ष करते हुए हमारी शक्ति, हमारी ऊर्जा उसमें लग गयी। अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई में समाज में मानव मूल्यों में कई दोष आ गए। यूनानी, शक, हूण, कुषाण, मंगोल, अरब, फ्रेंच, डच, ब्रिटिश, पुर्तगाली, न जाने कितने आक्रांता आये। हमने निरन्तर गौरवपूर्ण संघर्ष किया। लेकिन समाज जात-पात में बिखर गया। जातियां बनी, उन जातियों में भी कई उप जातियां बन गयी। हम इतने सूक्ष्म बन्धनों में बंधते चले गए कि हमारे लिए जात-पात देश-समाज से ऊपर हो गयी। हम देश के प्रति कर्तव्य भूलने लगे। ये बाहरी विचारों का प्रभाव है, जो भारतीय मूल्यों का हास् कर रहा है।
अब आवश्यक हो गया है कि हमें अपनी पीढ़ी को भारतीय बनाम पाश्चात्य विचारों के अंतर को समझाना होगा। पश्चिमी विचार केवल अधिकारों की बात करने वाला विचार है, जबकि भारतीयता की सुंदरता ही 'परहित' में समाई हुई है। हम अधिकारों की नहीं कर्तव्यों की बात करने के पैरोकार हैं। हमें जन्मते ही परोपकार सिखाया जाता है। हमें हमारे पूर्वजों से 'परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई'  या 'देश हमें देता है सबकुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें', जैसी शिक्षाएं मिली हैं। हमें हमारे कर्तव्य धर्म के रूप में सिखाये गए। पुत्र का धर्म क्या होता है, पिता का धर्म क्या होता है, राजा अर्थात शासक का क्या धर्म है, प्रजा अर्थात नागरिकों का क्या धर्म है, इसकी व्याख्या हम सब जानते हैं। इसपर विस्तार से चर्चा करने की जरूरत नहीं है।
ऐसा भी नहीं है कि भारत मे सभी अपने दायित्वों से मुंह मोड़ चुके हैं। कुछ नागरिक तो अपने फर्ज़ को निभाने में मिसाल बनकर भी उभरते रहते हैं। लेकिन जो अपनी संस्कृति को विस्मृत कर चुके हैं और जो दावा करते हैं कि उन्हें संविधान की बात ही समझ में आती है, तो वे संविधान को ही ध्यान से पढ़ ले। संविधान की प्रस्तावना में राष्ट्रीय एकात्मकता का सूत्र दिया गया है। हम सब एक सूत्र में पिरोए हुए हैं, वह सूत्र है कि हम सब भारत माता के पुत्र हैं। संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ मौलिक कर्त्तव्यों का भी पाठ पढ़ाता है, थोड़ा उसका भी अनुसरण करना सीखें। उन्हें किंचित भी यह नहीं पता कि संविधान में प्रदत्त अधिकार को केवल छह ही हैं, लेकिन कर्तव्य ग्यारह बताए गए हैं।
संविधान द्वारा मूल रूप से सात मूल अधिकार प्रदान किए गए थे। जिनमें समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म, संस्कृति एवं शिक्षा की स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार शामिल था। हालांकि, संपत्ति के अधिकार को 1978 में 44वें संशोधन द्वारा संविधान के तृतीय भाग से हटा दिया गया था।
वहीं देश के संविधान में दस मौलिक कर्तव्यों में 2002 में 86वें संशोधन में एक और कर्तव्य जोड़ा गया। अतः संविधान हमें कुल 11 मौलिक कर्तव्य बताता है। जिसमें प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक को यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य सौंपा गया कि उनके छः से चौदह वर्ष तक के बच्चे को शिक्षा का अवसर मिले। नागरिक संविधान सहित भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें।  राष्ट्र की विरासत को संजोएं। इसकी मिश्रित संस्कृति का संरक्षण करें तथा इसकी सुरक्षा में सहायता दें। वे सभी भारतीयों को सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने, पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, वैज्ञानिक सोच का विकास करने, हिंसा को त्यागने और जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करें। 
ऐसे में एक प्रश्न तो उन नागरिकों से जरूर पूछा जाना चाहिए कि क्या वे अपने अधिकारों की चाह में सरकारी भवनों, अस्पतालों को नुकसान पहुंचाने, रेल या बसों को आग में झोंक देने या किसी भी सार्वजनिक स्थल पर तोड़फोड़ करने से पहले अपने संवैधानिक कर्तव्यों के पालन के बारे में एक बार भी सोचते हैं? क्या समाज, सरकार या देश को बार-बार अपने अधिकार याद दिलाने वाले स्वयं अपने दायित्व निभाते हैं? हिंसक प्रदर्शन कर निर्दोष जनता को नुकसान पहुंचाने वाले क्या किसी लाभ के अधिकारी माने जाने चाहिए? 
अब समाज और परिवार को ये तय करना होगा कि नागरिकों को उनके दायित्वों का बोध कराया जाए। ये सरकारों का काम नहीं, बल्कि समाज की जिम्मेदारी है। हमें सुनिश्चित करना होगा कि परिवार ऐसी इकाई बने, जहां हम जिम्मेदार नागरिक उत्पन्न करें। समाज की व्यवस्था ऐसी हो कि किसी भी परिस्थिति में कोई भी नागरिक अपने कर्तव्यों को न भूले। समाज के बड़े-बूढ़े अपने लोगों का प्रबोधन करें, उन्हें राज्य और देश की प्रगति का हिस्सेदार बनाएं। हर व्यक्ति भी अपने उत्कृष्ट आचरण से श्रेष्ठ नागरिक बनकर दिखाए। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति, परिवार, देश, समाज के प्रति अपने दायित्व बोध को तीव्र करें और भारत के सुंदर व उन्नत भविष्य में सहभागी बने।

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