आदिवासी शब्द : भारत के विरुद्ध एक षड्यंत्र | The Voice TV

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आदिवासी शब्द : भारत के विरुद्ध एक षड्यंत्र

Date : 08-Aug-2024

सनातन धर्म विश्व के संपूर्ण धर्मों का मूल है और सनातन धर्म का मूल देवाधिदेव, आदि अनंत देव, महादेव हैं, जिनकी प्रसन्नता से प्रकृति का प्रारंभ होता है और जिनके क्रोधित होने पर प्रकृति में प्रलय होता है।


सनातनी संस्कृति में चाहे नगरवासियों, ग्रामवासियों हो या वनवासी सभी भगवान महादेव को पूजते मानते आ रहे हैं। वनवासी क्षेत्र के रहवासी जो प्रकृति (पेड़, पशु, नदी, सूर्य, चंद्रमा आदि) की तरह कई समानताओं के कारण सनातन धर्म का अभिन्न अंग हैं। जो प्रकृति को अपनी माँ मानते हैं उनके लिए भगवान शिव बड़ा देव या बड़े बाबा या बूढ़ादेव के रूप में पूजे जाते हैं। वही ग्रामों नगरों और महानगरों में रहने वाले रहवासी भगवान आदिदेव को शंकर ,महेश या महादेव के रूप में पूजते हैं। 

सतयुग 17,28000 वर्षों का बीत गया उसमें स्वयं "महादेव ने यतिनाथ के रुप में भील अवतार" धारण किया था। हमारा जनजाति भील समुदाय अपने आपको भगवान शिव का वंशज मानता है। इससे स्पष्ट होता है कि भारत की भूमि में जन्म लेने वाला चाहे वनवासी हो, ग्रामवासी हो या नगरवासी सब भारत के मूल निवासी ही है।
 
उसी तरह जबलपुर के गढ़ा में पचमठा मंदिर में शिव पंचायतन, तिलवारा में तिल्भंदेश्वर महादेव मंदिर,  गोपालपुर लामेटा घाट का पशुपतिनाथ मंदिर, ऐसे कितने ही शिव मंदिर है ये सभी गोंड कालीन है । जो यह प्रमाणित करते हैं कि गोंड कोई और नहीं हिंदु ही है।  

इतिहास भी ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जब- जब भारत की सीमाओं में विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किया तब तब इन वनवासी, वन प्रदेश में रहने वाले लोगों ने उनसे युद्ध किया और राजा महाराजाओं को युद्ध में सहयोग दिया। चन्द्रगुप्त को भी धनानंद से युद्ध में जीतने के लिए विंध्य प्रदेश की जनजाती समुदाय ने सहयोग दिया था।

गढ़ा साम्राज्य की सेना में के  सामान्य योद्धाओं (ब्राह्मणों, ठाकुरों, लोधियों , पटेलों ) के साथ  साथ गोंड योद्धाओं ने बड़ी संख्या में अपना योगदान दिया। इन सब के सहयोग से युद्ध लड़े भी गये और जीते भी गये। महाराणा प्रताप अकबर द्वारा भेजे गये मानसिंह और उसकी विशाल सेना से युद्ध लड़ कर अपने देश की रक्षा कर रहे थे। उस समय लड़ाकू  "पूंजा भील" ने अपनी विशाल सेना के साथ मिलकर महाराणा प्रताप को अकबर के विरूद्ध युद्ध लड़ने में सहयोग दिया। छत्रपति शिवाजी ने मुगलों के हाथों से 150 गढ़ों (किलो) को इन्हीं वनवासी मावलों के सहयोग से जीता था और अखंड हिंदवी साम्राज्य की स्थापना की थी। 
 
अपनी संस्कृति और राष्ट्र की रक्षा के लिए युद्ध चाहे मुगलों से लड़ा गया हो या अंग्रेजों से इस युद्ध में वनवासियों और नगर वासियों ने अपना विशेष योगदान दिया।

एक उदाहरण भगवान बिरसा मुंडा का अगर यहाँ प्रस्तुत नहीं किया तो बात अधूरी रहेगी। एक बार रविवार के दिन चाईबसा गाँव में जब मिशन के लोग प्रार्थना कर रहे थे तब फादर नोट्रेट ने मुंडा जाति के गाँव को मिशन के हाथों सौंपने की बात की, तब बिरसा मुंडा ने इसका विरोध किया और मात्र 14 वर्ष की आयु से मुंडा समुदाय के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।
 
अंग्रेजों के अत्याचारों के बाद भी मुंडा जनजाति ने बिरसा मुंडा का साथ नहीं छोड़ा। हर कदम पर, विपरीत परिस्थितियों में उन्होंने अपने सेनानायक, अपने भगवान, अपने आदर्श, बिरसा मुंडा का साथ दिया और भारत राष्ट्र की स्वतंत्रता में अपना अनमोल योगदान दिया।

"आदिवासी" शब्द अंग्रेजों के द्वारा प्रदान किया गया शब्द है। जिन जनजाति समाज में ईश्वर के रूप में महादेव माता-पार्वती इत्यादि देवी देवताओं का पूजन किया जाता रहा है , जो भारत की मूल जातियों में से एक है ये अपने आदि देवताओं को छोड़कर अन्य धर्मों में कैसे परिवर्तित हो गयें? जिनके पूर्वजों ने सदैव अपने धर्म की, अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए अपने प्राण आहुत कर दिए। आज उनका विदेशी धर्मों के प्रति समर्पण देश की एकता को खंडित करने का षड़यंत्र लगता है। आदि काल से ही हमारे वेद, उपनिषदों में इसके प्रमाण मिलते हैं कि ये जनजाति समाज, सनातन , धर्म को मानने वाले लोगों का समाज रही है। भील भक्त शबरी, भक्त निषाद राज,केवट आदि ने भगवान श्रीराम को भी धर्म की स्थापना के लिए सहयोग दिया था।  
 
छत्तीसगढ़ और झारखंड की 32 आदिवासी जातियों में कई ऐसी भी हैं जो राम पंथी संप्रदाय के रूप में जाने जाती हैं। रामनामी संप्रदाय  के लोगों का कहना है कि वे प्रभु राम से अपने को इस तरह से जोड़े हुए हैं कि कोई उनसे अलग नहीं कर सकता। कहा जाता है कि जब मुगलों ने उन्हें राम से अलग करने का प्रयास किया तो सभी ने अपने पूरे शरीर पर राम के नाम का गोदना गुदवा लिया। इनकी राम भक्ति का कोई जोड़ नहीं है। श्रीराम से इन जनजातियों का अटूट समर्पण हैं, इन्हें गोदना गुदवाते समय कोई पीड़ा नहीं होती।

 
ऐसे अनगिनत प्रमाणों के होते हुए आज वनवासी , जनजाति समाज का सनातन धर्म से पृथक होना हमारे देश की सुरक्षा और एकता को किसी घोर संकट में डालने जैसा है।

 
भारत विरोधी विचारधारा के लोगों ने एक ओर भारतीय वनवासी समुदाय को आदिवासी शब्द प्रदान कर आर्य और अनार्य संस्कृति में विभाजन किया वहीं शेष हिन्दू समाज के पंथ को धार्मिक जामा पहनाकर सनातनी संस्कृति से पृथक किया। इसके पीछे का मूल भाव जो है वो यही है कि भारत जैसे विशाल राष्ट्र को यदि तोड़ना है तो हिंदुओं की एकता को सबसे पहला तोड़ना होगा जिसके माध्यम से भारत जैसे विशाल राष्ट्र में वे अपने धर्म का, अपनी विचारधारा का प्रचार कर सकें। जिस तरह वनवासी समुदाय प्रकृति की पूजा करते हैं उसी तरह देश के अन्य सनातनी समुदायों द्वारा प्रकृति की पूजा हजारों वर्षों पूर्व उनके पूर्वजों द्वारा की जाने वाली परंपरा का आधार है।

 
अखंड भारत की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए आज समय की माँग है कि नगर ग्राम और वन में रहने वाले प्रत्येक भारतीय को अपनी प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का अनुकरण करते हुए राष्ट्र और सनातन धर्म का विरोध करने वाली विचारधाराओं के विरोध में संगठित होकर कार्य करना होगा।

 लेखक - डॉ नुपूर निखिल देशकर

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