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31 जुलाई विशेष: भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं क्रान्तिकारी उधम सिंह

Date : 31-Jul-2024

 

उधम सिंह भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के महान सेनानी एवं क्रान्तिकारी थे I सरदार उधम सिंह का जन्म 28 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिले के सुनाम गांव में हुआ था, उनके पिता का नाम टहल सिंह और माता का नाम नारायण कौर था। उन्होंने उनका नाम शेर सिंह रखा। जन्म के दो साल बाद ही उनकी मां का निधन हो गया। कुछ साल बाद यानी 1907 में उनके पिता की भी मौत हो गई माता पिता के मृत्यु के बाद उधम और उनके भाई को अमृतसर के सेंट्रल खालसा अनाथालय में भेज दिया था अनाथालय में लोगो ने दोनों भाइयो को नया नाम दिया शेर सिंह बन गए उधम सिंह और मुखता सिंह बन गए साधू सिंह सरदार उधम सिंह ने भारतीय समाज की एकता के लिए अपना नाम बदलकर राम मोहम्मद सिंह आज़ाद रख लिया था, जो भारत के तीन प्रमुख धर्मो का प्रतीक है। साल 1917 में उधम के भाई की भी मौत हो गयी। 1918 में उधम ने मैट्रिक पास किए।साल 1919 में उन्होने अनाथालय छोड़ दिया, उधम सिंह,सहिद भगत सिंह को अपना गुरु मानते थे।

1919 जालियावाला बाग हत्याकांड

बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण देने वाले थे। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। जब नेता बाग में पड़ी रोड़ियों के ढेर पर खड़े हो कर भाषण दे रहे थे, तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं। नेताओं ने सैनिकों को देखा, तो उन्होंने वहां मौजूद लोगों से शांत बैठे रहने के लिए कहा। सैनिकों ने बाग को घेर कर बिना कोई चेतावनी दिए निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं। १० मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। जलियांवाला बाग उस समय मकानों के पीछे पड़ा एक खाली मैदान था। वहाँ तक जाने या बाहर निकलने के लिए केवल एक संकरा रास्ता था और चारों ओर मकान थे। भागने का कोई रास्ता नहीं था। कुछ लोग जान बचाने के लिए मैदान में मौजूद एकमात्र कुएं में कूद गए, पर देखते ही देखते वह कुआं भी लाशों से पट गया। ब्रिटिश राज के अभिलेख इस घटना में 200 लोगों के घायल होने और 379 लोगों के शहीद होने की बात स्वीकार करते है जिनमें से 337 पुरुष, 41 नाबालिग लड़के और एक 6-सप्ताह का बच्चा था। अनाधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 1000 से अधिक लोग मारे गए और 2000 से अधिक घायल हुए।

जब जलियांवाला बाग में यह हत्याकांड हो रहा था, उस समय उधमसिंह वहीं मौजूद थे और उन्हें भी गोली लगी थी। उन्होंने तय किया कि वह इसका बदला लेंगे।

इस घटना के बाद उधम सिंह क्रांतिकारी राजनीति में शामिल हो गए और स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से प्रभावित हुए। वर्ष 1924 में उधम सिंह भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए ग़दर पार्टी में शामिल हो गए और इसके लिए विदेशों में भारतीयों को संगठित किया। 1927में भगत सिंह से आदेश मिलने के बाद उधम सिंह 25 साथियों और गोला-बारूद लेकर भारत आए। हालाँकि, जल्द ही उन्हें 25 साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। उनकी गिरफ्तारी के समय, उनके पास से हथियार, गोला-बारूद और ग़दर पार्टी के प्रतिबंधित अख़बार "ग़दर--गंज" की प्रतियाँ ज़ब्त की गईं, जिसके कारण उन्हें पाँच साल की जेल हुई।

1931 में रिहा होने के बाद उन्होंने उधम सिंह के नाम से पासपोर्ट बनवाया और इंग्लैंड की यात्रा की। द्वितीय विश्व युद्ध से पहले के वर्षों में उन्होंने कई यूरोपीय देशों का दौरा किया। युद्ध की शुरुआत क्रांतिकारियों के लिए एक प्रवेश बिंदु बन गई, जो मानते थे कि भारत में ब्रिटिश राज को उखाड़ फेंकने का यह सही समय है।

सन् 1934 में उधम सिंह लंदन पहुँचे और वहां 9, एल्डर स्ट्रीट कमर्शियल रोड पर रहने लगे। वह 6 सालों तक लंदन में रहे और 13 मार्च 1940 में सरदार उधम सिंह को उस नरसंहार का बदला लेने का मौका मिल ही गया।

जलियांवाला बाग हत्याकांड के 21 साल बाद 13 मार्च 1940 को रायल सेंट्रल एशियन सोसायटी की लंदन के काक्सटन हाल में बैठक थी जहां माइकल 'डायर भी वक्ताओं में से एक था। उधम सिंह उस दिन समय से ही बैठक स्थल पर पहुँच गए। अपनी रिवॉल्वर उन्होंने एक मोटी किताब में छिपा ली। इसके लिए उन्होंने किताब के पृष्ठों को रिवॉल्वर के आकार में उस तरह से काट लिया था, जिससे डायर की जान लेने वाला हथियार आसानी से छिपाया जा सके।

बैठक के बाद दीवार के पीछे से मोर्चा संभालते हुए उधम सिंह ने माइकल 'डायर पर गोलियां दाग दीं। दो गोलियां माइकल 'डायर को लगीं जिससे उसकी तत्काल मौत हो गई। उधम सिंह ने वहां से भागने की कोशिश नहीं की और अपनी गिरफ्तारी दे दी

ब्रिटेन में ही उन पर मुकदमा चला और 4 जून 1940 को उधम सिंह को हत्या का दोषी ठहराया गया और 31 जुलाई 1940 को उन्हें पेंटनविले जेल में फांसी दे दी गई.


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