31 जुलाई विशेष: महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी | The Voice TV

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31 जुलाई विशेष: महान पार्श्व गायक मोहम्मद रफ़ी

Date : 31-Jul-2024

 

 मोहम्मद रफ़ी एक महान पार्श्व गायक थे, जिन्होंने लगभग 40 वर्षों के करियर में 25,000 से अधिक गाने रिकॉर्ड कियेI मुहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को अमृतसर ज़िला, पंजाब में हुआ था। रफ़ी ने कम उम्र से ही संगीत में रुचि दिखानी शुरू कर दी थी। बचपन में ही उनका परिवार ग्राम से लाहौर गया था। रफ़ी के बड़े भाई उनके लिए प्रेरणा के प्रमुख स्रोत थे। रफ़ी के बड़े भाई की अमृतसर में नाई की दुकान थी और रफ़ी बचपन में इसी दुकान पर आकर बैठते थे। उनकी दुकान पर एक फ़कीर रोज आकर सूफ़ी गाने सुनाता था। सात साल के रफ़ी साहब को उस फ़कीर की आवाज़ इतनी भाने लगी कि वे दिन भर उस फ़कीर का पीछा कर उसके गाए गीत सुना करते थे। जब फ़कीर अपना गाना बंद कर खाना खाने या आराम करने चला जाता तो रफ़ी उसकी नकल कर गाने की कोशिश किया करते थे। वे उस फ़कीर के गाए गीत उसी की आवाज़ में गाने में इतने मशगूल हो जाते थे कि उनको पता ही नहीं चलता था कि उनके आसपास लोगों की भीड़ खड़ी हो गई है। कोई जब उनकी दुकान में बाल कटाने आता तो सात साल के मुहम्मद रफ़ी से एक गाने की फरमाईश जरुर करता।

एक बार संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पर पहुंचे. जब उन्होंने गुनगुनाते हुए रफी को बाल काटते हुए सुना तो बेहद खुश हुए. रफी को रेडियो चैनल के ऑडीशन में बुलाया गया, जिसे उन्होंने आसानी से पार कर लिया. जीवनलाल ने ही रफी को गायिकी की ट्रेनिंग दी और वो रेडियो में गानों को आवाज देने लगे. 1937 की बात है जब स्टेज में बिजली ना होने पर पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने स्टेज पर गाने से इनकार कर दिया.आयोजकों ने यहां 13 साल के रफी को मौका दिया. दर्शकों के बैठे केएल सहगल ने हुनर भांपते हुए कहा कि देखना ये लड़का एक दिन बड़ा सिंगर बनेगा. के एल सहगल की बात सालों बाद सच साबित हुई.

मोहम्मद रफ़ी का पहला गाना :  उनका पहला गाना 1944 एक पंजाबी फिल्म "गुलबालोच" की थी उस गाने के बोल थे - "सोणी हीरीए तेरी याद ने बहुत सताया" ज़ीनत बेगम के साथ संगीतकार श्याम सुंदर के संगीत निर्देशन में यह उनका पहला गाना था। उसके बाद श्याम सुंदर बंबई में थे और उन्होंने रफी ​​को जीएम दुर्रानी के साथ एक युगल गीत गाने का मौका दिया , "अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी...," गांव की गोरी के लिए 1945, जो रफी का हिंदी फिल्म में पहला रिकॉर्ड किया गया गीत बन गया। इसके बाद अन्य गाने भी आए उन्होंने आसामी, कोकणी, पंजाबी, उड़िया, मराठी, बंगाली के साथ साथ स्पेनिश और अंग्रेजी में भी गाने गाए थे

अपने शुरुआती करियर में रफ़ी कई समकालीन संगीत निर्देशकों के साथ जुड़े, जिनमें सबसे उल्लेखनीय नौशाद अली थे 1950 और 1960 के दशक के अंत में, उन्होंने ओपी नैयर , शंकर जयकिशन , एसडी बर्मन और रोशन जैसे उस दौर के अन्य संगीतकारों के साथ काम किया 

नौशाद साहब के संगीत निर्देशन में मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गाना अली सरदार जाफरी द्वारा लिखित फिल्म "हब्बा खातून" के लिए था। गाने के बोल थे -'जिस रात के ख्वाब आए वह रात आई'

 

पुरुस्कार एवं सम्मान : मोहम्मद रफ़ी जी को एक राष्ट्रिय और 6 फिल्मफेयर पुरुस्कार मिला I

राष्ट्रीय फिल्म  पुरुस्कार : क्या हुआ तेरा वादा ( हम किसी से कम नही )1977

फिल्मफेयर पुरुस्कार :  "चौदहवीं का चाँद हो" (चौदहवीं का चाँद) 1960, "तेरी प्यारी प्यारी सूरत को"(ससुराल)1961, चाहूंगा मैं तुझे” (दोस्ती)1964, "बहारो फूल बरसाओ"(सूरज)1966, "दिल के झरोके में"(ब्रम्हचारी)1968, "क्या हुआ तेरा वादा"( हम किसी से कम नही)1977

वर्ष 1948 में भारतीय स्वतंत्रता दिवस की पहली वर्षगांठ पर मोहम्मद रफी को भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा एक रजत पदक मिला था।

वर्ष 1967 में मोहम्मद रफी को भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

4 साल तक लता के साथ नहीं किया काम :- लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी ने साथ में सैकड़ो गाने गए थे, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया था जब उन्होंने रफ़ी साहब के से बातचीत बंद कर दी थी. दरअसल लता गानों पर रॉयल्टी चाहती थी , जबकि  मोहम्मद रफ़ी ने कभी भी रॉयल्टी की मांग नहीं की . दोनों का विवाद इतना  बढ़ा की मोहम्मद रफ़ी और लता के बीच बातचीत बंद हो गयी थी . इस कारण दोनों ने एक साथ गाना गाने से भी इंकार कर दिया था. कहा जाता है की लता ने इंडस्ट्री में सभी सिंगर्स की आवाज़ उठाते हुए उनके लिए रॉयल्टी की मांग की थी. सभी गायकों ने मीटिंग रखी, लेकिन रफ़ी साहब , लता और रॉयल्टी मांग रहे सभी सिंगर्स की सोच के खिलाफ थे. हालाँकि, चार साल बाद मशहूर एक्ट्रेस नरगिस की कोशिश से दोनों ने एक साथ एक कार्यक्रम मेंदिल पुकारेगाना गया था.

31 जुलाई 1980 को रात करीब 1025 बजे मोहम्मद रफी ने हार्ट अटैक से दम तोड़ दिया। अगली सुबह इन्हें जुहू के कब्रिस्तान में दफनाया गया। उनके अंतिम दर्शन में करीब 10 हजार लोग शामिल हुए थे। भारत सरकार ने रफी के निधन पर दो दिनों का सार्वजनिक शोक अनाउंस किया था।

 


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