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31 जुलाई विशेष: हिंदी साहित्य जगत के अद्वितीय लेखक व उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद

Date : 31-Jul-2024

 

हिंदी साहित्य जगत के अद्वितीय लेखक उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद  थे, जिन्होंने  कुल 300 से ज़्यादा कहानियां , 3 नाटक, 15 उपन्यास, 10 अनुवाद , 7 बाल-पुस्तकें लिखीं मुंशी प्रेमचंद ने अपने साहित्य और लेखों के माध्यम से समाज और राजनीति पर गहरा प्रभाव डाला उनका जन्म 31 जुलाई 1880 को बनारस के पास लमही में हुआ था। पिता का नाम अजायब राय था और वे डाकखाने में मामूली नौकरी करते थे। उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था | उर्दू रचनओं में उन्हेंनवाब रायकहा जाता था 13 साल की उम्र से ही प्रेमचन्द ने लिखना शुरू कर दिया था शुरुआत में कुछ नाटक लिखे और बाद में उर्दू में उपन्यास लिखा। इस तरह उनका साहित्यिक सफर शुरु हुआ , इन रचनाओ के साथ- साथ उन्होंने कहानी, निबंध लिखी न्होंने प्रेमचंद आज़ादी से पहले के समय के समाज और अंग्रेज़ी शासन के बारे में लिख रहे थे। उन्होंने जनता के शोषण, दुख, दर्द और उत्पीड़न को बहुत बारीकी से महसूस किया और उसे लिखा

प्रेमचंद की पहली प्रकाशित कृति उर्दू में थी और इसका नामसोजे-वतनथा लेकिन अंग्रेज़ी हुकूमत को ये गवारा नहीं था 1910 में उनकी रचना सोजे़-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया उस समय वे नवाबराय के नाम से लिखते थे। उनकी खोज हुई और उनकी आंखों के सामने सोजे़-वतन की सभी प्रतियां जला दी गईं। कलेक्टर ने उन्हें बिना अनुमति के लिखने पर भी पाबंदी लगा दी।

उन्होंने माधुरी और मर्यादा जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया तथाहंसऔरजागरणसमाचार पत्र भी प्रकाशित किये 20वीं सदी में उर्दू में प्रकाशित होने वाली 'ज़माना' पत्रिका के संपादक और प्रेमचंद के घनिष्ठ मित्र मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद नवाबराय हमेशा के लिए प्रेमचंद हो गए और इसी नाम से लिखने लगे प्रेमचंद के पहले उपन्यास का नाम सेवासदन था। सेवासदन 1918 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास मूल रूप से बाजारे-हुस्नाम से पहले उर्दू में लिखा गया लेकिन इसका हिन्दी रूप सेवासदनपहले प्रकाशित हुआ 1921 में किसान जीवन पर उनका उपन्यास 'प्रेमाश्रम' प्रकाशित हुआ। अवध के किसान आंदोलनों के दौर में 'प्रेमाश्रम' किसानों के जीवन पर लिखा हिंदी का पहला उपन्यास है फिर 'रंगभूमि', 'कायाकल्प', 'निर्मला', 'गबन'  और'कर्मभूमि' से होता हुआ उपन्यास लिखने का उनका यह सफर 1936 में 'गोदान' तक पहुंचा

इसके अलावा सैकड़ों लेख, संपादकीय लिखे जिसकी गिनती नहीं है। हालांकि उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है। प्रेमचंद के उपन्यासों में 'गोदान' सबसे ज़्यादा मशहूर हुआ और विश्व साहित्य में भी उसका बहुत महत्वपूर्ण स्थान है प्रेमचंद ने कई कहानियो का अनुवाद भी किया हैं जैसेटोल्त्स्टॉय की कहानियाँ (1923) , गाल्स्वर्दी के तीन नाटको का अनुवाद (1924), चांदी कि डिबिया(1931) , न्याय(1931) नाम से अनुवाद किया | कफन, पूस की रात, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि तीन सौ से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनका रतननाथ के उर्दू उपन्यास फ़सान- आज़ादका हिन्दी अनुवाद आज़ाद कथा बहुत प्रसिद्ध हुआ | उन्होंने कई कहानियाँ भी लिखी जैसे राष्ट्र का सेवक , बंद दरवाजा, यह भी नशा वह भी नशान , देवी, कश्मीरी सेब आदि रचनाये की |

सवा सेर गेहूं , पूस की रात जैसी लघु कथाएँ और गोदान जैसे उपन्यास समाज में शोषणकारी स्थितियों को दर्शाते हैं | प्रेमचंद ने तीन नाटको कि रचना कि कर्बला,संग्राम, प्रेमकी वेदी (1933)अत्यंत प्रसिद्ध हुई थी | प्रेमचंद कि रचानाओ को आज भी यादकिया जाता हैं | साहित्य जगत में उनका योगदान आद्वितीय हैं |

प्रेमचंद की कई रचनाओं का उनकी मृत्यु के बाद रूसी और अंग्रेजी में अनुवाद किया |

पुरस्कार :- उन्हें कभी किसी पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया गया था लेकिन महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी की ओर से साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले साहित्यकार को प्रेमचंद पुरस्कार दिया जाता है। पुरस्कार में 25,000 रुपये नकद, स्मृति चिह्न, शॉल और श्रीफल प्रदान किए जाते हैं एवं  उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा भी एक साहित्य पुरस्कार "प्रेमचंद स्मृति पुरस्कार" नाम से प्रदान किया जाता है मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाक विभाग की ओर से 31 जुलाई, 1980 को उनकी जन्मशती के अवसर पर 30 पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया था गोरखपुर के जिस स्कूल में वे शिक्षक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है।

मृत्यु :-

प्रेमचंद को 1936 में लखनऊ में प्रगतिशील लेखक संघ के पहले अध्यक्ष के रूप में चुना गया था। कई दिनों की बीमारी के बाद और पद पर रहते हुए 8 अक्टूबर वर्ष  1936 को बनारस में उनकी मृत्यु हो गई थी।

 


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