भारतवर्ष का सांस्कृतिक आदर्श | The Voice TV

Quote :

"मेहनत का कोई विकल्प नहीं, बस मजबूत इरादों के साथ आगे बढ़ते रहो।"

Editor's Choice

भारतवर्ष का सांस्कृतिक आदर्श

Date : 28-Jul-2024

भारतवर्ष प्राचीन काल में मानवता के आदर्श गुणौ से परिपूर्ण रहा है। आध्यात्मिक चेतना, दिव्य गुणौ पर आधारित होने के कारण यह महान आदर्श का स्रोत रहा है। अपने सांस्कृतिक आदर्श के बल पर इसने चिरकाल तक विश्वमानव के अंतस्तल में शासन किया है। इसने तलवारों की टंकारों से, युद्धोंन्माद के आतंक से अपनी विजयोपलब्धि प्राप्त नहीं की, कूटनीति द्वारा अपना विस्तार  नहीं किया है । वरन् प्रबल एवं प्रखर विचारों द्वारा इसने चक्रवर्ती का गौरव पाया एवं विश्व का हृदय जीता। समस्त संसार को शासन सूत्र संचालन का बोध कराने के कारण ही इसे चक्रवर्ती कहा गया। इसी कारण से जगतगुरु का श्रद्धास्पद  सम्मान भी मिला।

राष्ट्र के इस सांस्कृतिक आदर्श का उद्घोष युगदृष्टा स्वामी विवेकानंद की तेजस्वी वाणी द्वारा होता है- " हमारा राष्ट्रीय आदर्श लुटेरा नहीं बनाता,यह बलवानों को दुर्बलों की छाती पर मूंग दलने की शिक्षा नहीं देता और न हमें बलवान बनाकर दुर्बलों का खून चूसने की शक्ति प्रदान करता है। यह ऐसे अभियानों के लिए प्रोत्साहित नहीं करता, जिसके पैरों के नीचे धरती कांपती है और जो संसार में रक्तपात, लूटमार और इतर जातियों का सर्वनाश करने में ही अपना गौरव मानती है।"   
संसार इस राष्ट्र का अत्यंत ऋणी है। सारा संसार हमारे सहिष्णु राष्ट्र का जितना ऋणी है, उतना और किसी देश का नहीं। स्वामी जी कहते हैं- "यह भी ठीक है कि किसी अन्य राष्ट्र की गतिशील जीवन तरंगो ने भी महान शक्तिशाली सत्य के बीजों को चारों ओर बिखेरा है। परंतु यह हुआ है रणभेरी के नीर्घोष तथा रणसज्जा के सज्जित सेना-समूह की सहायता से। बिना रक्त प्रवाह में सिक्त हुए, बिना लाखों स्त्री- पुरुषों के खून की नदी में स्नान किए, कोई भी नया भाव आगे नहीं बढ़ा । प्रत्येक ओजस्वी भाव प्रचार के साथ ही अशंख लोगों का हाहाकार, अनाथो और असहायों का करुण क्रंदन और विधवाओं का अजस्र अश्रुपात होते ही देखा गया है। प्रधानत: इसी उपाय द्वारा अन्यान्य देशों ने संसार को शिक्षा दी है। परंतु इस उपाय का अवलंबन लिए बिना ही भारत देश हजारों वर्षों से शांतिपूर्वक रहा है । संसार के सभी देशों में केवल एक अपने ही चक्रवर्ती देश ने लड़ाई-झगड़ा करके किसी अन्य देश को पराजित नहीं किया है। भारत ने हृदय परिवर्तन तलवार की नोक पर नहीं वरन् प्रेम और त्याग के बल पर किया है। "
 स्वामी विवेकानंद जी कहते हैं - "कितने ही वैभवशाली देश उठे और गिरे विजय उल्लास एवं भाववेशपूर्ण प्रभुत्व का कुछ काल तक कलुषित राष्ट्रीय जीवन विताकर सागर की तरंगों की तरह उठकर फिर मिट गए । परंतु अपना राष्ट्र और उसकी राष्ट्रीयता जीवंत और जागृत है। जब कभी फारस, रोम, यूनान, अरब या इंग्लैंड वाले अपनी सेनाओ को लेकर दिग्विजय के लिए निकले और उन्होंने विभिन्न राष्ट्रों को एक सूत्र में गूथा है, तब भी अपने यहां के सांस्कृतिक आदर्श एवं दार्शनिक चिंतन नवनिर्मित भागों द्वारा संसार की जातियों की धमनियों में होकर प्रभावित होते रहे हैं। राजनीतिक श्रेष्ठता या सामरिक शक्ति प्राप्त करना किसी काल में इस राष्ट्र का जीवन उद्देश्य न कभी रहा है और न कभी रहेगा। इसका दूसरा ही जीवनोदद्देश्य रहा है। वह यह कि अपनी समग्र शक्ति को मानो किसी डायनामो में संग्रहित, संरक्षित और नियोजित किया गया हो और यह संचित शक्ति सारी पृथ्वी के जन-जीवन में जीवन जलप्लावन करती रही है।"
 
 समस्त मानवीय प्रगति में एवं राष्ट्रीय उत्थान में शांति प्रिय इस देश का कुछ अपना योगदान भी है। स्वामी जी इसे ज्योतिर्मय आलोक के रूप में सांस्कृतिक दान मानते हैं। उनके अनुसार -" हमारे इस देश में संस्कृति का जो स्रोत बहता है ,उसकी बाढ़ समस्त जगत को आप्लावित कर राजनीतिक उच्चाभिलाषाओं एवं नवीन सामाजिक संगठनों के प्रयासों में प्राय: समाप्तप्राय, अर्द्दमृत तथा पतनोन्मुखी पाश्चात्य और दूसरे समाजो में नव-जीवन का संचार करती रहती है । विभिन्न प्रकार के मत-मतांतर एवं सांस्कृतिक विचारों के विभिन्न स्वरों से अपने देश का गगन गूंजता रहा है।"
 
 स्वामी जी के अनुसार- " इस पृथ्वी पर क्षुद्र क्षितिज जो केवल कई एक हाथ ही विस्तृत है, हमारी दृष्टि को सीमित नहीं कर सकता। हमारा सांस्कृतिक आदर्श तो दूर तक, बहुत दूर तक फैला हुआ है। वह इंद्रियों की सीमा से भी आगे तक फैला है। वह देश और काल के भी परे हैं। वह दूर और दूर विस्तृत होता हुआ उस सीमातीत स्थिति में पहुंचता है, जहां इस भौतिक जगत का कुछ भी शेष नहीं रहता और सारा विश्व ब्रह्मांड ही आत्मा के दिगंतव्यापी महामहिम अनंत सागर की एक बूंद के समान दिखाई देता है। यह राष्ट्रीय आदर्श प्रकांड मेधा तथा बुद्धि वाले मनिषियों से उद्भभासित है, जो इस तथाकथित अनंत जगत के साम्राज्य को भी गढ़हिया मात्र समझते हैं और वे क्रमशः अनंत जगत को भी छोड़कर और दूर अति दूर चले जाते हैं। भौतिक प्रकृति को इस प्रकार अतिक्रमण करने की चेष्टा, किसी प्रकार प्रकृति से मुंह का घूंघट हटाकर एक बार उसे देश -काल से परे तत्व के दर्शन का यत्न करना ,यहां का स्वाभाविक गुण है। यही हमारा सांस्कृतिक आदर्श है।" 
 
स्वामी जी का मानना है कि - " जिस राष्ट्र का मूल मंत्र राजनीति प्रधान होता है उसका अस्तित्व संदेहास्पद होता है, परंतु यहां का प्रधान जीवन उद्देश्य सांस्कृतिक आदर्श है। केवल इसी से उन्नति,प्रगति एवं विकास की आशा की जा सकती है।  जिसका मूल मंत्र मानव हृदय में जागता है ,वही उसका आधार है ,अन्यथा इस राष्ट्र का मेरुदंड ही टूट जाएगा। जिस भित्ति  के ऊपर यह विशाल भवन खड़ा है,वही नष्ट हो जाएगा । यहां के महापुरुष अपने को प्राचीन राजाओं अथवा पुरातन दुर्ग निवासी, पथिको का सर्वस्व लूट लेने वाले डाकू, बैरर्नो के वंशधर न बताकर अरण्यवासी अर्धनग्न तपस्वियों की संतान कहने में ही अधिक गौरव समझते हैं। इस राष्ट्र में बड़े-बड़े राजा अपने को किसी प्राचीन ऋषि की संतान प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं। यही सांस्कृतिक आदर्श की आधारशिला है। "
 
यहां राजनीति सभी तरह की बौद्धिक कुटिलता सदा ही गोड समझी जाती हैं। चिर प्राचीन काल से ही हमारे यशस्वी पूर्वजों ने अपने आदर्शों के पथ को ग्रहण कर लिया और संसार की समस्त भौतिकता को चुनौती दे दी। उन्होंने बताया कि-  "हमारी समस्याओं को हल करने का रास्ता है वैराग्य, न्याय,निर्भीकता तथा प्रेम। यही तत्व अपनी संस्कृति के हृदय का मर्म स्थल है। यही अपनी संस्कृति की रीड या नीव है ,जिसके ऊपर अपना सांस्कृतिक आदर्श खड़ा है । स्वामी विवेकानंद जी का उद्घोष है कि- "संस्कृति हमारे जीवन का मुख्य केंद्र है और वही इस जीवन रूपी संगीत का प्रधान स्वर् है। यदि कोई समाज अपनी स्वाभाविक जीवन शक्ति को दूर फेंकने का प्रयास करें, तो सारी सफलताओं के बावजूद वह समाज मृत हो जाएगा। यही कारण है कि अपने देश में राजनीति, समाज नीति अथवा अन्य किसी दूसरी नीति को अपनी जीवन शक्ति का केंद्र कभी नहीं बनाया।" 
 
स्वामी जी के कथनानुसार - " जब कभी भी संसार को इसकी आवश्यकता महसूस हुई, उसी समय इस निरंतर बहने वाले आध्यात्मिक ज्ञान स्रोत ने संसार को प्लावित कर दिया है। राजनीति संबंधी विद्या का विस्तार रणभेरियों और सुसज्जित सेनाओ के बल पर किया जा सकता है। लौकिक एवं समाज संबंधी विद्या का विस्तार आग और तलवारों के बल पर हो सकता है ,परंतु आध्यात्मिक विद्या का विस्तार तो शांति द्वारा संभव है। यही एक दान है ,जो भारतीय समाज ने समस्त संसार को बारंबार दिया है। भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान की बाढ़ ने उमड़कर सारी दुनिया को हमेशा ही प्लावित किया है। 

अपने सांस्कृतिक आदर्श का दान है ,सांस्कृतिक , दार्शनिक और आध्यात्मिक ज्ञान। इसके प्रचार के लिए यह आवश्यक नहीं की सेना उसके आगे मार्ग निष्कंटक करती हुई चले । सांस्कृतिक और आध्यात्मिक तत्व को शोणित प्रवाह पर से ढोने की आवश्यकता नहीं । यह सांस्कृतिक तत्व खून से भरे जरूरी आदमियों के ऊपर से सदर्प विचरण नहीं करते। यह शांति और प्रेम के पंखों से उड़कर शांतिपूर्वक आया करते हैं और सदा हुआ भी यही। जिस प्रकार चक्षु और कर्ण गोचर न होता हुआ भी मृदु ओस बिंदु गुलाब की कलियों को विकसित कर देता है ,वैसा ही इस ज्ञान के विस्तार से होता है।"

स्वामी जी कहते हैं कि-" हमने कभी दूसरी जाति पर विजय प्राप्त नहीं की। यही हमारा महान गौरव है। अपने देश ने कभी खून की नदियां नहीं बहाई। उसने सदा आशीर्वाद और शांति के शब्द कहे, सबको उसने प्रेम और सहानुभूति की कथा सुनाई। यहां राष्ट्रीय विस्तार विचारों के बल पर हुआ है। इसका सबसे बड़ा लक्षण है उसका शांत स्वभाव और निर्वत। जो प्रभु शक्ति उसके पीछे है उसका प्रकाश बलपूर्वक जादू सा असर करता है। शांत, अज्ञेय किंतु महाशक्ति के अदम्य बल से, तभी उसने सारे जगत की दिशा राशि में क्रांति मचा दी है, एक नया ही साम्राज्य एवं युग खड़ा कर दिया है। यही राष्ट्र का सांस्कृतिक आदर्श है, जिसने इसको विश्व पर विजई एवं चक्रवर्ती बनाया और यही नवयुग का आधार भी है।" 

आज 21वीं सदी का भारत भी इस प्राचीन ऋषियों के पथ प्रदर्शित मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। इसीलिए संपूर्ण विश्व में भारत के प्रति विश्वास, श्रद्धा की वृद्धि होती दिखाई दे रही है । भारत पुन: विश्व को ध्वंस, विनाश के मार्ग से हटाकर सृजन, उज्जवल भविष्य के पथ पर अग्रसर करने हेतु मार्ग प्रशस्त कर रहा है। सारी दुनिया आज भारत की ओर आशा भरी नजरों से निहार रही है एवं भारत ने यह बीड़ा उठाया है। 21वीं सदी में भारतवर्ष पुनः विश्व का मार्गदर्शन करेगा तभी संपूर्ण विश्व में प्रेम, शांति , सौहार्द , समता, ममता का वातावरण बनेगा व मानवता का भविष्य उज्जवल होगा।



लेखक:- डॉ. नितिन सहारिया 

RELATED POST

Leave a reply
Click to reload image
Click on the image to reload
Advertisement









Advertisement