आपकी आत्मा, हृदय और कलेजा काँप उठेगा, जब एक क्रांतिकारी की मार्मिक एवं दर्दनाक कहानी पढ़ेंगे, जिन्हें आजाद भारत में न नौकरी मिली, न ईलाज!-कृपया पढ़ें और विचार व्यक्त करें! क्या ये आतंकवादी थे? न्याय करें!
ब्रिटिश पार्लियामेंट में पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिस्प्यूट बिल लाया गया। मकसद था स्वतंत्रता सेनानियों पर नकेल कसने के लिए पुलिस को ज्यादा अधिकार संपन्न करने का। दत्त और भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु इसका विरोध करना चाहते थे। दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह के साथ मिलकर सेंट्रल असेंबली में दो बम फोड़े और गिरफ्तारी दी। बटुकेश्वर ही सेंट्रल असेंबली में बम ले गए थे। यादवेंद्र संधू कहते हैं कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु पर बम फेंकने के अलावा सांडर्स की हत्या का इल्जाम भी था। इसलिए उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई। जबकि बटुकेश्वर को काला पानी की सजा हुई। उन्हें अंडमान की कुख्यात सेल्युलर जेल भेजा गया। उन्होंने कालापानी की जेल के अंदर भूख हड़ताल की।
भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त जैसी दोस्ती की मिसाल कम ही मिलती है। फांसी न होने से निराश थे दत्तभगत सिंह के साथ फांसी न होने से बटुकेश्वर दत्त निराश हुए थे। वह वतन के लिए शहीद होना चाहते थे। उन्होंने भगत सिंह तक यह बात पहुंचाई। तब भगत सिंह ने उनको पत्र लिखा कि "वे दुनिया को ये दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सह सकते हैं." भगत सिंह की मां विद्यावती का भी बटुकेश्वर पर बहुत प्रभाव था, जो भगत सिंह के जाने के बाद उन्हें बेटा मानती थीं. बटुकेश्वर लगातार उनसे मिलते रहते थे ।
लेखक - डॉ. आनंद सिंह राणा
