बुराई पर अच्छाई की जीत को समर्पित दीपावली त्यौहार का हमारे हिन्दू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व है । यह त्यौहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष को भगवान कृष्ण को समर्पित गोवर्धन पूजा का त्यौहार बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है इस दिन गौ माता और उन्ही के साथ भगवान श्री कृष्ण की भी पूजा का विधान है । मान्यता है कि इस दिन गोवर्धन पर्वत, भगवान कृष्ण और उसने प्रिय गायों की, सच्चे मन से पूजा करने पर भगवान कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है और समस्त दुःखों से मुक्ति मिलती है|
शुभ मुहुर्त 2023
इस वर्ष गोवर्धन पूजा 14 नवंबर को है। 13 नवंबर को प्रतिपदा तिथि 02:56 से शुरू होकर 14 नवम्बर को 02:40 तक यह तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए महिलाओं को इसी मुहूर्त में अपनी पूजा संपन्न करना आवश्यक है।
पूजा की सम्पूर्ण विधि
इस दिन प्रात: काल उठकर तेल को अच्छे से मलकर नहाने की काफी पुरानी प्रथा चली आ रही है। इसके पश्चात पूजा सामग्री को तैयार करके पूजा स्थान पर चले जाए और वहाँ आराम से सर्वप्रथम अपने कुल देवी- देवताओं का ध्यान कीजिए। उसके बाद पूर्ण श्रध्दा से गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाए। शास्त्रों में बताया गया है कि इसकी आकृति लेटे हुए पुरुष के समान होनी चाहिए। इसके बाद बनाई हुई आकृति को फूल, पत्तियों और टहनी तथा गाय की आकृतियों से सुसज्जित करें |
गोवर्धन की आकृति को बनाकर उसके बिलकुल बीच में भगवान श्री कृष्ण को रखा जाता है और इसके बीच में एक गड्ढा बनाएं फिर उसके अंदर दूध, दही, और गंगाजल के साथ शहद भी अर्पित करें और पूर्ण भाव से पूजा- अर्चना करें । इसके बाद प्रसाद को लोगों में वितरित करें | इसी के साथ ही गायों को भी सजाने की भी लोकप्रिय विधि है। श्रृंगार श्रृंगार के पश्चात उसके सिंघो पर घी लगाकर उसे गुड़ खिलाएं और आशीर्वाद प्राप्त करें|
पूजा को अच्छे प्रकार पूर्ण करने के बाद गोवर्धन पर्वत का सात बार परिक्रमा करने की विशेष मान्यता है। एक व्यक्ति अपने हाथ में जल का लोटा और दूसरा व्यक्ति अपने हाथ में जौ लेकर चलता है। जल वाला व्यक्ति आगे आगे जल गिराता जाता है और दूसरा व्यक्ति जौ गिराता (बोता हुआ) परिक्रमा करता है। यह मनुष्य के जीवन से सभी दुःख और पीड़ा को सम्पूर्ण तरीके से ख़त्म कर देतें हैं और मनुष्य जीवन में सुख व समृद्धि का प्रसार होता है।
गोवर्धन पूजा की कथा
दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। लोग इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं। गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है। एक कथा के अनुसार जब भगवान श्री कृष्ण जी की आज्ञा से ब्रजवासियों से इन्द्र के बजाए गोवर्धन की पूजा करने को कहा तो इन्द्र ने अहंकारवश इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा प्रारम्भ कर दी। भगवान श्री कृष्ण जी ने ब्रजवासियों को वर्षा से बचाने के लिए 7 दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठाकर रखा और गौ-गोपिकाएं उसकी छाया में सुखपूर्वक रहें।
अपने इस कृत्य से इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और गोविन्द से कहाँ कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा। आप दयालु हैं और कृपालु भी,इसलिए मेरी भूल क्षमा करें। इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया। सातवें दिन भगवान ने गोवर्धन को नीचे रखा और हर वर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव अन्नकूट के नाम से मनाया जाने लगा।
