शिक्षाप्रद कहानिया - मर्यादा की रक्षा | The Voice TV

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शिक्षाप्रद कहानिया - मर्यादा की रक्षा

Date : 10-Nov-2023

 

श्रीमंत पेशवा बाजीराव छत्रपति शाहू जी महाराज के दाहिने हाथ माने जाते थे |

उनकी कामना थी कि कृष्णा नदी के तट से सिधु प्रदेश तक छत्रपति शिवजी की अक्षयकीर्ति का प्रतीक भगवा ध्वज फहरे | उधर महाराज जयसिंग दिवतीय की हार्दिक इच्छा थी कि तत्कालीन मुगल सम्राट मोहम्मद शाह और पेशवा में परस्पर संधि हो जाए |

मोहम्मद शाह के आदेश से जयसिंग ने पेशवा को दिल्ली आने का निमंत्रण  दिया | छत्रपति शाहू की आज्ञा से अपार सेना के साथ पेशवा ने दिल्ली के लिए प्रस्थान किया | दिल्ली पहुचने से पहले उन्होने उदयपुर की सीमा में प्रवेश किया | पर ध्यान देने की बात यह है  कि  पेशवा के साथ कुछ ही सैनिक थे ,शेष सैनिको को उन्होने बाहर ही बाहर दिल्ली जाने का आदेश दिया | उन्होने सेना के साथ मेवाड़ की पवित्र की धरती पर चरण रखा उचित नही समझा |

महारणा जगतसिंग ने उनका धूमधाम से स्वागत किया | चम्पा बाग में उनके ठहरने की व्यवस्था की गयी और दूसरे दिन उनके सम्मान में उत्सव का आयोजन किया |

महाराणा ने  पेशवा का आलिंगन कर स्वागत किया और कहा –‘’ आओ मित्रा ! ‘’

बाजीराव गभीर थे ,राणा आगे बढ़ते – बढ़ते  सिंहासन तक पहुँच गये | किन्तु बाजीराव के पैर ठिठक गये , आगे बढ़ने में विवशता थी | पेशवा के दिल्ली

स्थित प्रतिनिधि महादेव भट्ट और जयसिंग के दीवार मलजी भी संयोग से आ गये थे | पेशवा राणा की राजसभा का दृश्य देखकर आश्चर्य करने लगे | तभी महाराणा ने फिर कहा –‘’ आओ वीर !’’ उन्होने एक पंकित में दो स्वर्णसिंहासन सजाए थे |

‘’ मित्र ! इस सिंहासन पर बैठने वाला मेवाड़ाधिपति अपने समक्ष आसन प्रदान कर आपका अभिनदन करता हैं | जगत सिंह ने हाथ बढ़ाया |

‘’ महारणा ! यह बापा रावल का सिंहासन , इस सिंहासन में महारानी पद्मिनी की आन , महारणा सांगा की वीरता ,पन्नाधाय का निस्वार्थ बलिदान और राजरानी मीरा की भक्ति अंकित है | इस सिंहासन पर विराजमान होकर महाराज प्रताप ने स्वदेश , स्वराज्य और स्वधर्म का मंत्रानुष्ठान किया , घास की रोटी खाकर इसकी प्रदीप्ति अक्षुन्ण रखी | इस सिंहासन पर महाराणा रणसिंह और संग्राम सिंह का ऐश्वर्य सन्निहितहै | महाराणा मै इस सिंहासन के समक्ष आसन पर किस प्रकार बैठ सकता हूँ ? यह छ्त्रपति शिवाजी के पूर्वजो का सिंहासन है | मैंने सिसोदिया वंश का नमक खाया हैं | मेरे पूर्वजो ने सतारा और सिहगढ़ मे इस सिंहासन का जयगान गाया है | मैं मर्यादा भंग नहीं कर सकता |’’

पेशवा सिहसन से नीचे बैठ गये |

‘’ मेवाड़ केसरी की जय हो | तुम्हारा यश और कीर्ति युगों- युगों तक अमर रहे वीरवार!’’ बाजीराव एनई आशीर्वाद व आशीष देतेहुए उच्चारण किया |


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