पौराणिक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की मदद से नरकासुर का वध किया था | और 16 हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बंधन से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था | इसे छोटी दिवाली के रूप में भी मनाया जाता है |
प्राचीन समय में रंतिदेव नामक एक पुण्यात्मा और धर्मात्मा राजा रहते थे , वह बहुत दयावान और दानी थे | उन्होंने अनजाने में भी कभी कोई पाप नहीं किये लेकिन मृत्यु का समय आया तो उनके पास यमदूत आये | तब राजा को पता चला की उनको मोक्ष नहीं अपितु नरक में मिल रहा है | तब राजा ने कहा मैंने तो अनजाने में भी कभी पाप नहीं किये फिर मुझे क्यों नरक में ले जाया जा रहा है |राजा ने यमदूतों से इसका कारण पूछा तब उन्होंने कहा कि एक बार तुम्हारे द्वार पर एक भूखा ब्राम्हण आया था और कुछ न मिलने पर वह वापस लौट गया | उसी कारण आपको नरक लोक ले जाया जा रहा है |
तब राजा ने अपने द्वारा अनजाने में हुई गलती का पश्चाताप करने के लिए यमराज से हाथ जोड़कर कुछ समय देने को कहा ताकि वह अपने भूल को सुधार सके | यमराज ने उनके अच्छे कर्मो के कारण उनको वह मौका दिया| तब राजा ने अपने गुरु को सारी बाते बताई और उसका निवारण का उपाय पूछा तब उनके गुरु ने उनको सलाह दिया कि ब्राम्हणों को भोजन करवाओ और उनसे क्षमा मांगो | राजा ने गुरु के कहे अनुसार ब्राम्हणों को भोजन करवाया और उनसे क्षमा मांगी जिससे सभी ब्राम्हण प्रसन्न हो कर उनको मोक्ष का आशर्वाद प्रदान करते है | वह दिन कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चौदस का था , इस लिए इसे नरक निवारक चतुर्दशी कहा जाता है |
पूजा विधि
शाम के समय भगवान कृष्ण कि पूजा करें और घर के मुख्य द्वार पर तेल का दीपक जलाएं | यमराज के नाम से भी एक दीपक जलाएं | पूरे विधि द्वारा पूजा करने पर अकाल मृत्यु का डर दूर होता है |
