भारत के विकास के लिए टेक्नोलॉजी का एक बड़ा योगदान रहा है। यह दिन देश के विकास में इंजीनियर, वैज्ञानिकों की महत्वूपूर्ण भूमिका निभाए जाने और उन्हें इसका श्रेय देने के लिए खास है।
यह दिवस पहली बार 11 मई, 1999 को मनाया गया था, इसका उद्देश्य भारतीय वैज्ञानिकों, इंजीनियरों की वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियों का स्मरण करना है। इस दिन का नाम पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रखा गया था। प्रत्येक वर्ष भारतीय प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय) भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उनके योगदान के लिये व्यक्तियों को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित करके इस दिन को मनाता है।
2024 राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस की थीम
भारत में प्रतिभा और क्षमता की कोई कमी नहीं है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में काफ़ी आगे बढ़ने के बाद भी भारत दुनिया के कई देशों से पिछड़ा हुआ है और उसे अभी बहुत-से लक्ष्य तय करने होंगे। इसीलिए '11 मई' का दिन प्रौद्योगिकी के लिहाज से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इस दिन 1998 में पोखरण में न सिर्फ सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया गया, बल्कि इस दिन से शुरू हुई कड़ी 13 मई तक भारत के पांच परमाणु धमाकों में तब्दील हो चुकी थी। भारत ने न सिर्फ परमाणु विस्फोट से अपनी कुशल प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन किया, बल्कि अपने प्रौद्योगिकी कौशल के चलते किसी को कानोंकान परमाणु परीक्षण की भनक भी नहीं लगने दी। अत्याधुनिक उपग्रहों से दुनिया के कोने-कोने की जानकारी रखने वाला अमरीका भी 11 मई, 1998 को भारतीय प्रौद्योगिकी के सामने गच्चा खा गया।
प्रौद्योगिकीय क्षमता का विकाश
पूरे देश में शैक्षणिक संस्थान तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी से सम्बन्धित संस्थान इसे भारत की प्रौद्योगीकीय क्षमता के विकास को बढ़ावा देने के लिये मनाते हैं। इस दिन उत्कृष्ट उपलब्धियों के लिये वैज्ञानिकों एवं प्रौद्योगिकीविदों को पुरस्कृत भी किया जाता है। बीते कुछ दिनों में भारत ने अपनी उन्नत स्वदेशी प्रौद्योगिकी का परिचय देते हुए 'इंटर कांटीनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल' (आईसीबीएम) अग्नि-5 और देश का पहला स्वदेश निर्मित राडार इमेजिंग उपग्रह रीसैट-1 का सफल प्रक्षेपण किया। ये दोनों कामयाबी भविष्य के लिये दूरगामी सिद्ध होगीं, क्योंकि हम स्वदेशी प्रौद्योगिकी का प्रयोग करके रक्षा और अंतरिक्ष के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं और विश्व के छ: ताकतवर देशों के समूह में शामिल हो गए हैं। भविष्य में भारत उन सभी ताकतों को और भी कड़ी टक्कर देगा, जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रहे हैं, क्योंकि भारत के पास प्रतिभाओं की बहुलता है।
राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में गुरुवार को पद्म अवॉर्ड्स दिए गए। यह पद्म अवॉर्ड्स वितरण का दूसरा हिस्सा था। इस दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 2 पद्म विभूषण, 9 पद्म भूषण और 56 पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किए। इस मौके पर पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और पुरस्कार विजेताओं को परिजन भी शामिल हुए।
समारोह का सबसे भावुक और गर्व से भरा पल सोशल वर्कर डॉ. केएस राजन्ना को पद्म श्री अवॉर्ड दिए जाने का था। डॉ. राजन्ना ने पोलियो के कारण अपने हाथ-पैर गवां दिए थे। बावजूद इसके वे मैकेनिकल इंजीनियर बने। पैरालिंपिक में गोल्ड जीता, साथ ही कई दिव्यांगों को रोजगार दिया।
राजन्ना ने अवॉर्ड लेने से पहले पीएम मोदी का शुक्रिया किया। डाइस पर चढ़ने से पहले उसे प्रणाम किया और उसके बाद राष्ट्रपति से अवॉर्ड लिया।
समारोह के बाद अमित शाह ने अपने घर पर डिनर होस्ट किया। जिसमें रामचरण तेज, चिरंजीवी, वैजयंती माला समेत पद्म पुरस्कार विजेता शामिल हुए।
भारत की पहली महिला हाथी महावत हस्ती कन्या पार्वती बरुआ, तेलंगाना की मूर्तिकार वेलु आनंदचारी, त्रिपुरा की बुनकर स्मृति रेखा चकमा पद्म श्री प्रदान किया गया।
पंजाब के रंगमंच कलाकार प्राण सभरवाल भी मोदी के पास गए और उनके पैर छूने की कोशिश की।
नागालैंड के सामाजिक कार्यकर्ता सानो वामुजो और योग गुरु किरण लाभशंकर व्यास ने राष्ट्रपति से पद्म श्री लेने के पहले प्रधानमंत्री से हाथ मिलाया।
मुर्मू ने कुछ पुरस्कार देने के लिए मंच से नीचे उतरीं। इनमें सिक्किम के बांस शिल्पकार जोडेन लेप्चा भी शामिल थे। वे पारंपरिक पोशाक और रंगीन टोपी पहनकर आए थे।
क्या हैं पद्म अवॉर्ड्स, किसे मिलते हैं...
सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों में शुमार पद्म पुरस्कार तीन कैटेगरी में दिए जाते हैं- पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री। पद्म विभूषण असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए, पद्म भूषण विशिष्ट सेवा के लिए और पद्म श्री किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाता है। पद्म अवॉर्ड्स का ऐलान हर साल गणतंत्र दिवस पर होता है।
इस बार 2024 के लिए 5 लोगों को पद्म विभूषण, 17 को पद्म भूषण, 110 को पद्मश्री से सम्मानित करने का ऐलान किया गया। राष्ट्रपति ने 22 अप्रैल को तीन पद्म विभूषण, आठ पद्म भूषण और 55 पद्म श्री पुरस्कार प्रदान किए थे।
राष्ट्रपति भवन में 22 अप्रैल को पद्म अवॉर्ड की पहली किस्त दी गई। 25 जनवरी को ये सम्मान घोषित किए गए थे। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सबसे पहले पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, बिंदेश्वर पाठक और पद्मा सुब्रमण्यम को पद्म विभूषण से सम्मानित किया। बिंदेश्वर पाठक की पत्नी अमोला पाठक ने पुरस्कार ग्रहण किया। इसके बाद अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती, सिंगर उषा उथुप और सीताराम जिंदल समेत कुछ लोगों को पद्म भूषण दिया। इसके अलावा मनोहर कृष्ण डोले और रामचेत चौधरी समेत कुछ हस्तियों को पद्मश्री दिया गया।
कहानी 'बिरहोर के भाई' की, जिनके जुनून ने कुछ यूं बदल दी आदिवासियों की जिंदगी
समाज सेवा की राह पर चलना पद्मश्री जागेश्वर यादव के लिए भी आसान नहीं रहा. उनको आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. सामाज में बदलाव लाने के उनके जुनून ने उनको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.
पहाड़ों और जंगलों के बीच रहने वाले जोगेश्वर यादव को पद्मश्री से सम्मानित किया गया है. छत्तीसगढ़ के जशपुर के रहने वाले जोगेश्नर यादव एक समाज सेवक हैं, जो आदिवासियों के उत्थान के लिए लगातार काम कर रहे हैं. उनके इसी योगदान के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है. उनका नाम साल 2024 के पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित हुआ था. गुरुवार को अपने सादगी भरे अंदाज के साथ जोगेश्वर यादव जब राष्ट्रपति भवन पहुंचे तो हर कोई उनका कायल हो गया.
कौन हैं जोगेश्वर यादव ?
जोगेश्नर यादव साल 1989 से ही बिरहोर जनजाति के लिए काम कर रहे हैं. उन्होंने इसके लिए जशपुर जिले में एक आश्रम भी बनाया है. उन्होंने शिवरों के जरिए निरक्षरता को खत्म करने और स्वास्थ्य व्यवस्था को आदिवासियों तक पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत की है. उनकी कोशिशों का ही नतीजा था कि कोरोना महामारी के दौरान वैक्सीन आदिवासियों तक आसानी तक पहुंचाई जा सकी. इसके अलावा स्वास्थ्य के प्रति उनकी जागरूरता की वजह से ही इलाके में शिशु मृत्यु दर को कम करने में भी मदद मिली.
जागेश्वर यादव का जन्म जशपुर जिले के भितघरा में हुआ था. वह बचपन से ही बिरहोर आदिवासियों की दुर्दशा देखते आ रहे थे. घने जंगलों में रहने वाले बिरहोर आदिवासी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से कोसों दूर थे. जागेश्वर ने इनके जीवन को बदलने की ठान ली और इसके लिए बड़ा कदम उठाते हुए उन्होंने आदिवासियों के बीच रहना शुरू कर दिया. सबसे पहले उन्होंने इस जनजाति की उनकी भाषा और संस्कृति को सीखा, जिससे उनसे घुला-मिला जा सके. इसके बाद उन्होंने इन समुदाय में शिक्षा की अलख जगाई और बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित किया.
जागेश्वर यादव आदिवासियों के बीच 'बिरहोर के भाई' के नाम से नाम से जाने जते हैं. यह पहली बार नहीं है जब उनको किसी सम्मान से नवाजा गया है. इससे पहले साल 2015 में उनके बेहतर कार्य के लिए उन्हें शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान दिया गया था. हालांकि समाज सेवा की राह पर चलना जागेश्वर यादव के लिए भी आसान नहीं रहा. उनको आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. सामाज में बदलाव लाने के उनके जुनून ने उनको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.
कैसे आदिवासियों में जगाई शिक्षा की ललक?
जागेश्वर यादव का कहना है कि पहले बिरहोर जनजाति के लोग अन्य लोगों से मिलते-जुलते नहीं थे. वे बाहरी लोगों को देखते ही भाग जाते थे.यहां तक कि जूतों के निशान देखकर भी वे छिप जाया करते थे. ऐसे हालात में पढ़ाई के लिए स्कूल जाना तो बहुत ही दूर की बात थी. उनका कहना है कि अब समय बदल गया है. जागेश्वर यादव की कोशिशों का ही नतीजा है कि अब इस जनजाति के बच्चे भी स्कूल जाकर पढ़ाई ककर रहे हैं.
जागेश्वर यादव नाम पद्मश्री पुरस्कार के लिए चयनित होने के बाद से ही परिवार और पूरे गांव में खुशी का माहौल था. लोग लगातार घर जाकर उनको बधाई दे रहे हैं. पद्मश्री मिलने के बाद जागेश्वर यादव का परिवार और पूरे गांव समेत जिले भर में लोग गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं.
