मीडिया का क्षेत्र बहुत व्यापक हो गया है। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक के साथ अब सोशल मीडिया की भी बाढ़ है। लेकिन यह सब तभी तक सार्थक है, जब तक इनके सामाजिक सरोकार भी है। इसके निर्वाह के लिए भारतीय संस्कृति के प्रति आग्रह आवश्यक है। भारत में देवर्षि नारद ने ही पत्रकारिता का प्रादुर्भाव किया था। उनके चौरासी सूत्र आधुनिक पत्रकारिता के संदर्भ में भी प्रासंगिक हैं। उनकी सभी बात आज की मीडिया पर न केवल लागू होती है, बल्कि उनपर अमल से मीडिया को आदर्श रूप दिया जा सकता है। लेकिन आधुनिक वामपंथी खेमे पत्रकारों ने भारतीय संस्कृति की घोर अवहेलना की। उदारीकरण और वैश्वीकरण ने नया संकट पैदा किया है। ऐसे में राष्ट्रवादी पत्रकारिता के महत्व को बनाये रखने की चुनौती है। इसमें धीरे धीरे सफलता भी मिल रही है। देश इस समय आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। यह संयोग है कि इस दौरान राष्ट्रवादी विचार से प्रेरित अनेक संगठन व संस्थान भी अपना अमृत वर्ष मना रहे हैं। कुछ समय पहले विद्यार्थी परिषद द्वारा अपनी स्थापना के सात दशक होने पर ध्येय यात्रा पुस्तक का लोकार्पण नई दिल्ली में किया गया। राष्ट्र भाव की पत्रकारिता के अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है। भविष्य की चुनौतियों का समाना करते हुए लोगों तक गुणवत्तापूर्ण समाचार प्रेषित करना आवश्यक है।
भारतीयता को विशेष महत्व देते हुए सत्य, संवाद और सेवा को अपना ध्येय बनाना होगा।वर्तमान समय में पत्रकारिता कई चुनौतियों का समाना कर रही है। प्रिंट, विजुअल और डिजिटल मीडिया के साथ ही लोगों का दृष्टिकोण बदला है। इन चुनौतियों का सामना करते हुए हुए राष्ट्रवादी पत्रकारिता प्रगति करेगी। पत्रकारिता को धर्म मानकर काम करने वाले ही सफल होते है। राष्ट्रवादी पत्रकारों ने इसी विचार के अनुरूप कार्य किया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में आदर्श अपेक्षित हैं। उनके पालन से ही समाज व राष्ट्र का हित सुनिश्चित होता है। इन आदर्शों की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। समाचार सम्प्रेषण में स्पष्टता व गुणवत्ता रहनी चाहिए। इससे प्रामाणिकता कायम होती है। साथ ही समाज का भी कल्याण होता है। उसी के आधार पर देश का लोकतंत्र स्वस्थ बना रहेगा। देश के लोकतंत्र का स्वस्थ बने रहना समग्र विकास के लिए आवश्यक शर्त है। समाज जागरूक होकर सही दिशा में चलता है तभी लोकतंत्र सफल होता है।
इसी धारणा से कार्य करना चाहिए।आज ऐसी ही ध्येयवादी पत्रकारिता की आवश्यकता है। आज के समय में यह भूमिका और भी अधिक बड़ी हो जाती है। आने वाले समय में भारत का सटीक और सही चित्रण विश्व पटल में रखने की बड़ी भूमिका निभानी होगी। वस्तुतः भारतीय पत्रकारिता का वामपंथी विचारों ने नुकसान किया है। इसके लिए वामपंथियों ने अपना स्वरूप भी बदला है। कार्ल मार्क्स ने आर्थिक आधार समाज की व्याख्या की थी। उसने समाज को दो वर्गों में बांटा था। पहला पूंजीपति और दूसरा सर्वहारा। पूंजीपति सदैव सर्वहारा का शोषण करता है। दोनों में संघर्ष चलता रहता है। यह वामपंथियों, मार्क्सवादियों, माओवादियों, नक्सलियों का मूल चिंतन रहा है। इसमें अनेक बदलाव भी होते रहे। भारत के वामपंथियों ने मीडिया में अपना सांस्कृतिक विचार चलाया है। इसमें मार्क्स का आर्थिक चिंतन बहुत पीछे छूट गया। पूंजीपति और सर्वहारा की बात बन्द हो गई। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों की बात करना शुरू कर दिया। लेकिन वर्ग संघर्ष के चिंतन को बनाये रखा। ये कथित प्रगतिशील पत्रकार हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष की रचना करने लगे। इन्होंने यह मान लिया इनका वर्ग संघर्ष चलता रहेगा।
वामपंथी रुझान वाले यहीं तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने सवर्ण और दलित के बीच भी वर्ग को हवा देना शुरू किया। वामपंथी रूझान की पत्रकारिता ने हिंदुओं के विरोध को अपना पैशन बना लिया। वर्ग संघर्ष के सिद्धांत पर उन्होंने यह विचार फैलाया की हिन्दू शोषक और मुसलमान शोषित है। इसीलिए पश्चिम बंगाल और केरल की राजनीतिक हिंसा उन्हें दिखाई नहीं देती। किंतु कुछ लोग मजहब के आधार पर समाज विरोधी कार्य करें, यह कानून को अपने हाथ में लेने की कोशिश करें, तो इसे भगवा आतंकवाद के रूप में प्रसारित किया जाता है। स्वतंत्रता के बाद से ही वामपंथी विचारकों को लेखन के लिए प्रोत्साहित किया गया। उनके द्वारा बनाये गए पाठ्यक्रम को शिक्षा में चलाया गया। इसमें भारत के प्रति हीन भावना का विचार था। प्राचीन भारतीय विरासत को खारिज किया गया। यह पढ़ाया गया कि विदेशी शासन ने भारत को सभ्य बनाया। जबकि वह स्वयं सभ्यताओं के संघर्ष करने वाले लोग थे। भारत तो सबके कल्याण की कामना करने वाला देश रहा है।
देवर्षि नारद का तीनों लोकों में समान सहज संचार था। देवऋषि नारद अन्य ऋषियों, मुनियों से इस प्रकार से भिन्न हैं कि उनका कोई अपना आश्रम नहीं है।वे निरंतर प्रवास पर रहते हैं तथा उनके द्वारा प्रेरित हर घटना का परिणाम लोकहित से निकला।इसलिए वर्तमान संदर्भ में यदि नारदजी को आजतक के विश्व का सर्वश्रेष्ठ लोकसंचारक कहा गया।नारद द्वारा रचित चौरासी भक्ति सूत्रों का यदि सूक्ष्म अध्ययन करें तो केवल पत्रकारिता ही नहीं पूरे मीडिया के लिए शाश्वत सिद्धांतो का प्रतिपालन दृष्टिगत होता है। उनके द्वारा रचित भक्ति सूत्र अनुसार जाति,विद्या,रूप, कुल,धन,कार्य आदि के कारण भेद नहीं होना चाहिए। समाचारों का संवाहन ही नारद के जीवन का मुख्य कार्य था, इसलिए उन्हें आदि पत्रकार मानने में कोई संदेह नहीं है। आज के संदर्भ में इसे हम पत्रकारिता का उद्देश्य मान सकते हैं।
समाचारों के संवाहक के रूप में नारद की सर्वाधिक विशेषता है उनका समाज हितकारी होना। पत्रकारिता का धर्म समाज हित है। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर देवर्षि नारद का चित्र एवं उनके भक्ति सूत्र उकेरे गए हैं। विश्वविद्यालय के द्वार पर प्रदर्शित नारद भक्ति सूत्र बहुत महत्वपूर्ण हैं। दरअसल, उन सूत्रों में पत्रकारिता के आधारभूत सिद्धांत शामिल हैं। ये सूत्र पत्रकारिता के विद्यार्थियों को दिशा देने वाले हैं। पहले सूत्र में लिखा है-'तल्लक्षणानि वच्यन्ते नानामतभेदात।' अर्थात् मतों में विभिन्नता एवं अनेकता है। 'विचारों में विभिन्नता और उनका सम्मान' यह पत्रकारिता का मूल सिद्धांत है। इसी तरह दूसरा है- 'तद्विहीनं जाराणामिव।' अर्थात् वास्तविकता (पूर्ण सत्य) की अनुपस्थिति घातक है। अकसर हम देखते हैं कि पत्रकार जल्दबाजी में आधी-अधूरी जानकारी पर समाचार बना देते हैं। उसके कितने घातक परिणाम आते हैं, सबको कल्पना है। इसलिए यह सूत्र सिखाता है कि समाचार में सत्य की अनुपस्थिति नहीं होनी चाहिए। पूर्ण जानकारी प्राप्त करके ही समाचार प्रकाशन करना चाहिए। इसी प्रकार वह कहते हैं कि दु:संग: सर्वथैव त्याज्य: अर्थात् जो अनुचित हैं उसका प्रतिपालन या प्रचार-प्रसार नहीं करना चाहिए। देवर्षि नारद का उद्देश्य लोक कल्याण ही रहा।
लेखक:- डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
खेल एक लोकप्रिय, बहुसांस्कृतिक उत्सव है जिसे दुनिया भर में बहुत से लोग अनुभव करते हैं। नए संदर्भों में देखा जाए तो यह खेल फ्रांस के लिए एक नए रोमांच का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्योंकि फ्रांस ओलंपिक और पैरालंपिक खेल के आयोजन के लिए तैयार है। फ्रांस के नागरिकों के नजरिए से देखें तो वह कह रहे हैं कि दुनिया के सबसे बड़े आयोजन की मेजबानी से हमारा देश बदल जाएगा और यह बदलाव फ्रांस के अच्छे भविष्य के लिए अपरिहार्य है। पेरिस 2024 से हम चाहते हैं कि ‘खेल मूल्य’ लोगों के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनें और यह साबित करें कि हम स्थिरता हासिल करने के साथ-साथ उत्कृष्टता भी हासिल कर सकते हैं।
निश्चित ही पेरिस 2024 को लेकर न सिर्फ फ्रांस वासियों को उत्साहित देखा जा रहा है बल्कि पूरे यूरोप में खुशी का माहौल है। यहां जिस तरह की अभी तक तैयारियां की गई हैं, उस हिसाब से कहें तो यह ओलंपिक अब तक का सबसे बड़ा आयोजन होगा। ओलंपिक खेल 26 जुलाई से 11 अगस्त 2024 तक होंगे, किंतु इतनी बड़ी जिम्मेदारी के साथ वर्तमान में फ्रांस के सामने जो संकट खड़ा है, वह है आतंकी गतिविधियों से निपटने का। क्योंकि संपूर्ण यूरोप में फ्रांस आज इस्लामिक कट्टरवाद से बेहद त्रस्त है। ऐसे में फ्रांस की सरकार को अपने उन मित्रों का साथ चाहिए जो खेल के इस महाकुंभ में उसकी मदद कर पाएं। इसलिए फ्रांस ने आतंक से निपटने के लिए भारत को याद किया है।
विश्व जानता है कि भारत ने आतंकवाद का सामना बड़े स्तर पर किया है और इससे निपटने के लिए सुरक्षा में विशेषज्ञता हासिल कर ली है। अब फ्रांस चाहता है कि आतंकवाद से लड़ने की भारत की विशेष रणनीति ‘‘पेरिस ओलंपिक 2024’’ की सुरक्षा के लिए काम आए। वस्तुत: फ्रांस ने जिस मानव धर्म, समानता और बन्धुत्व के भाव से अपने यहां शरणार्थियों को शरण दी, आज यही शरणार्थी फ्रांस में मजहब (इस्लाम) के नाम पर अपनी मनमानी करने पर उतारु दिखाई देते हैं। बाहर से आए मुस्लिम, स्थानीय मुस्लिमों के साथ मिलकर सामुदायिक भावना गढ़ रहे हैं।
हमले और हिंसक घटनाओं की संख्या बढ़ने के बाद फ्रांस की सरकार चेती है, लेकिन उसके लिए कुछ भी करना आसान नहीं है। फ्रांस में पेरिस के आसपास के शहरों, ल्योंस और टूलूज जैसे अन्य बड़े शहरों में दंगे हुए। 2014 के बाद बढ़े हमलों के कारण आपरेशन सेंटिनेल, आपरेशन विजिलेंट गार्डियन और ब्रसेल्स लाकडाउन चलाए गए, फिर भी फ्रांस में इस्लामिक अतिवादियों का आतंक कम नहीं हुआ है। आए दिन वहां किसी को चाकू मारा जा रहा है तो किसी पर गोली बरसाई जा रही हैं। फ्रांस की मूल महिलाएं लगातार यौन हिंसा की शिकार बनाई जा रही हैं।
अभी पिछले साल ही फ्रांस में अल्जीरियाई मूल के 17 वर्षीय किशोर नाहेल एम की पेरिस के पास पुलिस के हाथों मौत के बाद पूरा देश जल उठा था। कई शहरों में गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा हो गए। कई दिनों तक चला ये हिंसक प्रदर्शन फ्रांस से होते हुए संपूर्ण यूरोप तक फैल गया था, जिसके परिणामस्वरूप कई और देशों में इस्लामिक आतंकवाद देखने को मिला। दंगाइयों ने फ्रांस के पेरिस, मार्सिले और ल्योन सहित अन्य शहरों में जमकर उत्पात मचाया। लूटपाट के अनेक वीडियो सामने आए।
इस बीच, एक मौलवी शेख अबू तकी अल-दीन अलदारी का वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें वह कह रहा था, ‘‘जिहाद के जरिए फ्रांस एक इस्लामिक देश बन जाएगा और पूरी दुनिया इस्लामी शासन के अधीन होगी। फ्रांसीसियो! इस्लाम में कन्वर्ट हो जाओ, नहीं तो जजिया का भुगतान करने के लिए मजबूर किए जाओगे।’’ मेमरी टीवी द्वारा अनुवादित वीडियो में कहा गया है, ‘‘2050 में फ्रांस में मुसलमानों की संख्या फ्रांसीसियों से अधिक हो जाएगी लेकिन हम फ्रांस को इस्लामिक देश बनाने के लिए इन आंकड़ों पर भरोसा नहीं कर रहे हैं। हम जिस पर भरोसा कर रहे हैं, वह यह है कि मुसलमानों के पास एक ऐसा देश होना चाहिए, जो अल्लाह की खातिर जिहाद के माध्यम से इस्लाम को अपना मार्गदर्शन, अपना प्रकाश, अपना संदेश और अपनी दया (पश्चिम के) लोगों तक पहुंचाए।’’
किशोर की हत्या पर पांच दिनों की हिंसा में ही 935 इमारतें क्षतिग्रस्त हुई, 5,354 वाहन जलाए गए, आगजनी की 6,880 घटनाएं हुईं। 41 पुलिस थानों पर हमला किया गया, 79 पुलिसकर्मी घायल हुए। वस्तुत: फ्रांस में मुस्लिम प्रवासियों की लगातार आमद देखी गई है, जो अब लगभग 60 लाख है और कुल फ्रांसीसी आबादी का लगभग 8-9 प्रतिशत है। अनेक अनुमानों से पता चलता है कि फ़्रांस की मुस्लिम आबादी में वार्षिक 17 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है।
इस देश में इस्लामिक आतंक किस तरह से हावी है, वह इससे भी पता चलता है कि पेरिस के करीब रामबौलेट में हमलावर ने पुलिस थाने में घुसकर एक महिला पुलिस अधिकारी स्टेफनी की गर्दन पर धारदार हथियार से वार किए, जिससे मौके पर ही उसकी मौत हो गई। इस दौरान हमलावर अल्ला-हो-अकबर का नारा लगा रहा था। यहां हुए पेरिस हमले में 130 लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। फ्रांस के नाइस शहर में ट्रक से 86 लोगों को मार दिया गया।
अभिव्यक्ति की आजादी के तहत कक्षा में पैगंबर मुहम्मद का कार्टून दिखाने पर पेरिस में इतिहास के शिक्षक सैमुअल पैटी का सिर अब्दुल्लाह एंजोरोव ने काट दिया। पैगंबर मोहम्मद का कार्टून छापने पर शार्ली एब्दो के पेरिस कार्यालयों पर हुए हमलों में 17 लोग मारे गए। एक दूसरी घटना में पत्रिका के मुख्यालय के बाहर दो लोगों को चाकू मार दिया गया। एक आतंकी ने पेरिस के चैंप्स-एलिसीज पर एक पुलिस अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी। पेरिस के ओर्ली हवाईअड्डे पर सैनिकों पर हमला किया गया, फिर अल्लाह के नाम कुर्बान होने की बात कही गई। दक्षिणी फ्रांस के तालोसे शहर में अल-कायदा के आतंकी ने तीन यहूदी बच्चों, एक रबाई और तीन पैराट्रूपर्स की हत्या कर दी। इस प्रकार की अनेक आतंकी घटनाएं फ्रांस में कभी भी होती हुई दिखती हैं।
फिलहाल, फ्रांस सरकार अपने स्तर पर इस्लामिक आतंकवाद को रोकने के लिए जो कर सकती है, वह कर रही है, लेकिन फिर भी यह डर तो बना ही रहता है, कहीं से कोई अप्रत्याशित सूचना न आ जाए। अब जब ओलंपिक पेरिस में हो रहा है तब फ्रांस सरकार की जिम्मेदारी दुनिया के सभी देशों के प्रति अत्यधिक बढ़ गई है, इसलिए आज उसे अपने मित्र भारत की याद आई है।
यह अच्छा ही है कि भारत ने भी मित्र धर्म निभाने के लिए हर संभव मदद करने का फ्रांस को भरोसा दिया है। भारत, आतंकवाद रोधी और आंतरिक सुरक्षा विशेषज्ञों का एक बड़ा दल फ्रांस भेज रहा है, जोकि पेरिस ओलंपिक के दौरान हर चुनौती से निपटने में सक्षम है। ऐसे में यही कहना होगा कि भारत द्वारा फ्रांस को दिया जा रहा यह सुरक्षा सहयोग दोनों देशों के बीच मजबूत संबंधों के साथ आतंकवाद और अन्य सुरक्षा चुनौतियों का मुकाबला करने की प्रतिबद्धता दुनिया के सामने दर्शा रहा है।
लेखक - डॉ. मयंक चतुर्वेदी
प्रतिवर्ष वैशाख मास की पूर्णिमा को 'बुद्ध पूर्णिमा' के रूप में मनाया जाता है। बुद्ध पूर्णिमा इस वर्ष 23 मई को है। माना जाता है कि 563 ई.पू. वैशाख पूर्णिमा के ही दिन लुम्बनी वन में शाल के दो वृक्षों के बीच गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, जिन्होंने वैशाख पूर्णिमा को ही बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व प्राप्त किया था। यही कारण है कि बौद्ध धर्म में बुद्ध पूर्णिमा को सबसे पवित्र दिन माना गया है। गौतम बुद्ध का वास्तविक नाम सिद्धार्थ गौतम था। गौतम उनका गोत्र था किन्तु कालांतर में वह सिद्धार्थ गौतम, महात्मा बुद्ध, भगवान बुद्ध, गौतम बुद्ध, तथागत आदि विभिन्न नामों से जाने गए। बचपन से ही राजकुमार सिद्धार्थ घंटों एकांत में बैठकर ध्यान किया करते थे लेकिन फिर भी उन्होंने पुत्र जन्म तक सांसारिक सुखों का उपभोग किया परन्तु धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक सुखों से उचाट होता गया।
सिद्धार्थ मन की शांति पाने के उद्देश्य से एक दिन भ्रमण के लिए अपने सारथी छेदक को साथ लेकर रथ में सवार हो महल से निकल पड़े। रास्ते में उनका मनुष्य के दुःख की चार घटनाओं से साक्षात्कार हुआ। जब उन्होंने दुःख के इन कारणों को जाना तो मोहमाया और ममता का परित्याग कर पूर्ण संन्यासी बन गए। सबसे पहले उन्होंने मार्ग में एक रोगी व्यक्ति को देखा और सारथी से पूछा, ''यह प्राणी कौन है और इसकी यह कैसी दशा है?'' सारथी ने बताया, ''यह भी एक मनुष्य है और इस समय यह बीमार है। इस दुनिया में हर व्यक्ति को अपने जीवन में कभी न कभी रोगी होकर दुःखों का सामना करना ही पड़ता है।''
आगे बढ़ने पर सिद्धार्थ ने मार्ग से गुजरते एक वृद्ध, निर्बल व कृशकाय व्यक्ति और उसके बाद एक मृत व्यक्ति की अर्थी ले जाते विलाप करते लोगों को देखा तो हर बार सारथी से उसके बारे में पूछा। सारथी ने एक-एक कर उन्हें मनुष्य की इन चारों अवस्थाओं के बारे में बताया कि हर व्यक्ति को कभी न कभी बीमार होकर कष्ट झेलने पड़ते हैं। बुढ़ापे में काफी दुःख झेलने पड़ते हैं, उस अवस्था में मनुष्य दुर्बल व कृशकाय होकर चलने-फिरने में भी कठिनाई महसूस करने लगता है और आखिर में उसकी मृत्यु हो जाती है।
सिद्धार्थ यह रहस्य जानकर बहुत दुःखी हुए। आगे उन्हें एक साधु नजर आया, जो बिल्कुल शांतचित्त था। साधु को देख सिद्धार्थ के मन को अपार शांति मिली और उन्होंने विचार किया कि साधु जीवन से ही मानव जीवन के इन दुखों से मुक्ति संभव है। बस फिर क्या था, देखते ही देखते सिद्धार्थ सांसारिक मोहमाया के जाल से बाहर निकलकर पूर्ण वैरागी बन गए और एक दिन रात्रि के समय पत्नी यशोधरा तथा पुत्र राहुल को गहरी नींद में सोता छोड़ उन्होंने घर-परिवार और राजसी सुखों का परित्याग कर दिया तथा सत्य एवं ज्ञान की खोज में एक-स्थान से दूसरे स्थान पर भटकते रहे। उन्होंने छह वर्षों तक जंगलों में कठिन तप किया और सूखकर कांटा हो गए किन्तु ज्ञान की प्राप्ति न हो सकी। उसके बाद उन्होंने शारीरिक स्वास्थ्य व मानसिक शक्ति प्राप्त की और बोध गया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर गहन चिंतन में लीन हो गए तथा मन में दृढ़ निश्चय कर लिया कि इस बार ज्ञान प्राप्त किए बिना वे यहां से नहीं उठेंगे।
सात सप्ताह के गहन चिंतन-मनन के बाद वैशाख मास की पूर्णिमा को 528 ई.पू. सूर्योदय से कुछ पहले उनकी बोधदृष्टि जागृत हो गई और उन्हें पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हो गई। उनके चारों ओर एक अलौकिक आभा मंडल दिखाई देने लगा। उनके पांच शिष्यों ने जब यह अनुपम दृश्य देखा तो उन्होंने ही राजकुमार सिद्धार्थ को पहली बार 'तथागत' कहकर संबोधित किया। तथागत यानी सत्य के ज्ञान की पूर्ण प्राप्ति करने वाला। पीपल के जिस वृक्ष के नीचे बैठकर सिद्धार्थ ने बुद्धत्व प्राप्त किया, वह वृक्ष 'बोधिवृक्ष' कहलाया और वह स्थान, जहां उन्होंने यह ज्ञान प्राप्त किया, बोध गया के नाम से विख्यात हुआ तथा बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद ही सिद्धार्थ को 'महात्मा बुद्ध' कहा गया। महात्मा बुद्ध मन की साधना को ही सबसे बड़ी साधना मानते थे। अपने 80 वर्षीय जीवनकाल के अंतिम 45 वर्षों में उन्होंने दुनियाभर में घूम-घूमकर बौद्ध धर्म का प्रचार किया और लोगों को उपदेश दिए।
