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मैं मर नहीं रहा हूँ, बल्कि भारत में पुनर्जन्म लेने जा रहा हूँ - अमर बलिदानी राजेंद्र लाहिड़ी

Date : 30-Jun-2025

" मैं राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी-उम्र 26 वर्ष, आपको ज्ञात हो कि मुझे काकोरी यज्ञ के लिए, 2 दिन पहले ही 17 दिसंबर सन् 1927 को गोंडा जेल में फांसी दे दी गई थी,जबकि 19 दिसम्बर, सन् 1927 को महारथी रामप्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में अशफाक उल्ला खान को फैजाबाद जेल में और ठाकुर रोशन सिंह को नैनी,इलाहाबाद जेल में फांसी दी गई थी। 


मैंने स्वतंत्रता संग्राम में काकोरी यज्ञ का शुभारंभ किया, जिसे इतिहास में लूट पढ़ाया जाता है।  9 अगस्त 1925 में, मैंने 8 डाऊन सहारनपुर - लखनऊ पैसेंजर ट्रेन की चैन खींच कर उसे रोका, जिसमें अंग्रेजों द्वारा भारतीयों से धन लूट कर ले जाया जा रहा था। 

मेरे मित्रों ने उसे भारत माता की स्वतंत्रता के युद्ध को लड़ने के लिए हस्तगत लिया तो क्या ये लूट थी? मुझे दुख होता है कि हम लोग तो कहीं के नहीं रहे ! अंग्रेजों ने तो हमें लुटेरा ही कहा, परंतु पाश्चात्य इतिहासकारों के स्वरों को ही आगे बढ़ाते हुए एक दल विशेष के समर्थक परजीवी इतिहासकारों और वामपंथी इतिहासकारों ने तो हमें आतंकवादी बना दिया! न हमारा घर रहा न परिवार! जबकि हम लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। क्या अब हमारे साथ न्याय नहीं होना चाहिए??? "

 मेरा जन्म 29 जून 1901 को बंगाल के पाबना ज़िले के भड़गा नामक ग्राम में हुआ था। मेरे पिता का नाम क्षिति मोहन और माता का नाम बसंत कुमारी था। बाद के समय में हमारा परिवार 1909 ई. में बंगाल से वाराणसी चला आया था, अतः मेरी शिक्षा-दीक्षा वाराणसी से ही हुई। 

मेरे जन्म के समय पिता क्षिति मोहन लाहिड़ी व बड़े भाई बंगाल में चल रही अनुशीलन दल की गुप्त गतिविधियों में योगदान देने के आरोप में कारावास की सलाखों के पीछे कैद थे।

 काकोरी अनुष्ठान के दौरान मैं 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' में इतिहास विषय में एम. ए. प्रथम वर्ष के छात्र था। इसी समय मेरा संपर्क क्रांतिकारी शचीन्द्रनाथ सान्याल से हुआ। सान्याल बंगाल के क्रांतिकारी 'युगांतर' दल से संबद्ध थे। वहाँ एक दूसरे दल 'अनुशीलन' में वे काम करने लगे। 

मैं इस संघ की प्रांतीय समिति का सदस्य हो गया था । मेरी कार्य कुशलता को देखते हुए मुझे पंडित रामप्रसाद बिस्मिल ने "हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन" की गुप्त बैठकों में बुलाना शुरु कर दिया था और वहीं हमने काकोरी यज्ञ की संरचना तैयार की थी जिसे 9 अगस्त 1925 को निर्विघ्न रुप से पूरा किया। इसके बाद क्या हुआ मैं ऊपर बता चुका हूँ। 

 
लेखक - डॉ आनंद सिंह राणा
 

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