भारत के पूर्वोत्तर में होने वाली रेल दुर्घटनाओं में अचानक वृद्धि देखी गई। पिछले तीन माह में छै बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुई और दो होते होते बचीं । इन दुर्घटनाओं ने यह प्रश्न भी खड़ा किया कि दुर्घटनाओं की यह वृद्धि केवल मेन्टेनेन्स का अभाव है या कोई आतंकवादी षड्यंत्र ।
भुवनेश्वर में स्थित पवित्र मुक्तेश्वर मंदिर 10वीं शताब्दी में बने अपने भव्य वास्तुकला, उत्कृष्ट मूर्तिकला और जटिल नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है और इसे 'ओडिशा का रत्न' माना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर कलिंग स्थापत्य शैली का एक अद्वितीय उदाहरण है।
मुक्तेश्वर मंदिर, भुवनेश्वर के परशुरामेश्वर मंदिर के पास स्थित है, जो उस काल की एक और विलक्षण कृति है। इसके अतिरिक्त, यह शहर के प्रसिद्ध लिंगराज मंदिर के भी करीब है, जो एक अन्य महत्वपूर्ण पूजा स्थल है।
इस मंदिर का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है , यह 35 फीट ऊंचा मंदिर खासतौर पर अपने विस्तृत और सजाए गए मेहराब के आकार के प्रवेश द्वार (जिसे स्थानीय भाषा में तोरण कहा जाता है) के लिए प्रसिद्ध है। मेहराब पर की गई जटिल और उत्कृष्ट नक्काशी मंत्रमुग्ध कर देती है और उस समय की कुशल शिल्पकला को दर्शाती है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण सोमवंशी राजवंश के राजा ययाति प्रथम द्वारा किया गया था - एक ऐसा राजवंश जिसे भुवनेश्वर में विभिन्न भव्य मंदिरों का निर्माण करने का श्रेय दिया जाता है, जिसे भारत का मंदिर शहर कहा जाता है।
मंदिर का एक और मुख्य आकर्षण जो बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करता है, वह है मुक्तेश्वर नृत्य महोत्सव, जो हर साल जनवरी के महीने में ओडिशा पर्यटन द्वारा आयोजित किया जाता है। यह महोत्सव पहली बार 1984 में आयोजित किया गया था। यह भारत के सबसे पुराने रूपों में से एक ओडिसी नृत्य शैली का उत्सव और प्रदर्शन कार्यक्रम है।
पोला छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि किसानों का सबसे प्रसिद्ध और पारंपरिक त्योहार है। छत्तीसगढ़ का पारंपरिक और प्रसिद्ध त्यौहार पोला न केवल इस राज्य में, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है | यह पर्व विशेष रूप से किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए समर्पित है | भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को पोला का पर्व मनाया जाता है. ऐसा माना गया है की बैल भगवान का स्वरूप है और इस वजह से इसकी पूजा की जाती है |
यद्यपि आधुनिक समय में मशीनों का प्रयोग की अधिकता पर भी यह परंपरा आज भी जीवित है बैलों के बिना खेती अधूरी है इस साल बैल पोला का त्यौहार 2 सितंबर को भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाएगा | शक्ति पुत्र पंडित कामता तिवारी जी के अनुसार, इस त्योहार में बैलों की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। जिनके पास बैल नहीं होते, वे मिट्टी के बैल बनाकर उनकी पूजा करते हैं. जिनके घर में बैल होते हैं, वे उन्हें अर्ध जल अर्पित करते हैं, माथे पर चंदन का टीका लगाते हैं, और उन्हें माला पहनाई जाती है.इसके साथ ही बैलों को विशेष रूप से तैयार भोजन दिया जाता है और धूप-अगरबत्ती के साथ उनकी पूजा की जाती है |
क्यों पड़ा त्यौहार का नाम पोला ?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान् विष्णु ने कृष्ण अवतार लेकर जन्माष्टमी के दिन जन्म लिया था | जब इसके बारे में कंस को पता चला, तो उसने कान्हा को मारने के लिए अनेकों असुर भेजे थे | इन्हीं असुरों में से एक था पोलासुर | कान्हा जब छोटे थे और वासुदेव- यशोदा के यहां रहते थे, तब कंस ने कई बार असुरों को उन्हें मारने भेजा था | इसे भी कृष्ण ने अपनी लीला के चलते मार दिया था, और सबको अचंभित कर दिया था | वह दिन भादों माह की अमावस्या का दिन था, इस दिन से इसे पोला कहा जाने लगा |
पोला त्यौहार का महत्व
भारत, जहां कृषि आय का मुख्य स्रोत है और ज्यादातर किसानों की खेती के लिए बैलों का प्रयोग किया जाता है। इसलिए किसान पशुओं की पूजा आराधना एवं उनको धन्यवाद देने के लिए इस त्योहार को मनाते है। पोला दो तरह से मनाया जाता है, बड़ा पोला एवं छोटा पोला। बड़ा पोला में बैल को सजाकर उसकी पूजा की जाती है, जबकि छोटा पोला में बच्चे खिलौने के बैल या घोड़े को मोहल्ले पड़ोस में घर-घर ले जाते है और फिर कुछ पैसे या गिफ्ट उन्हें दिए जाते है। पोला पर्व में छत्तीसगढ़ी पकवान ठेठरी, खुरमी जैसे पारंपरिक पकवान भी बनाए जाते हैं।
रहीम ने यह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया | और शाम का भोजन तय हो गया |
“राजा के यहां भोजन करने जा रहा हूँ |”
“पर मैं तो वचन दे चूका हूँ कि भोजन करूंगा |”
अमी पियावत मानबिनु, कह रहीम न सुहाय |
प्रेम सहित मरिवौ भलौ, जो विष देय बुलाया ||
राजा ने पृथ्वी पर सिर रखकर कहा- “मुझे प्राणों की भीख न देकर, केवल उसी बात को बता देने की भीख दें |”
रहीम बोले- “अच्छी बात है, लीजिये सुन लीजिए | मेरे और आपके प्रभु श्रीकृष्ण ने मुझे यह बात बताई थी |”
