भारतीय राजनीति के क्षितिज पर सन् 1951में भारतीय जनसंघ के रूप में एक नये राजनीतिक दल का उदय हुआ जिसके संस्थापक महान देशभक्त डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे । प्रतिकूल राजनीतिक परिस्थितियों में जन्मी उस नवोदित पार्टी की शैशवावस्था से ही उसके लिए अपना खून पसीना एक कर उसे एक विशाल वट वृक्ष के रूप में विकसित करने का सुनहरा स्वप्न जिन देशभक्त युवा नेताओं ने संजोया उनमें एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। विलक्षण प्रतिभाशाली, कुशाग्र बुद्धि,गहन अध्येता ,कुशल संगठक और सदैव सादा जीवन उच्च विचार की राह पर चलने वाले पंडित दयाल उपाध्याय उस समय भी कोई नया चेहरा नहीं थे। पिछले एक दशक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित स्वयं सेवक के रूप में पंडित उपाध्याय की अद्भुत संगठन क्षमता और विशिष्ट चिंतन उनकी पहचान बन चुके थे ।भारतीय जनसंघ के महासचिव और राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पार्टी के आर्थिक और राजनीतिक चिंतन को नयी दिशा प्रदान की। तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य में अपनी अलग पहचान बनाने के लिए संघर्षरत एक नयी पार्टी के महासचिव पद और अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालना कोई आसान काम नहीं था परन्तु संकल्प शक्ति के धनी दीनदयाल उपाध्याय पार्टी में अपने अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की सुदृढ़ नींव तैयार करने के लिए तन-मन धन से जुटे रहे । उसका ही परिणाम था कि भारतीय जनसंघ की शैशवास्था में ही उसके लिए 'होनहार बिरवान के होत चीकने पात' कहावत प्रयुक्त होने लगी थी।दीनदयाल उपाध्याय के विशिष्ट राजनीतिक, आर्थिक और दार्शनिक चिंतन ने उन्हें जल्द ही भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक देदीप्यमान नक्षत्र के रूप में स्थापित कर दिया । भारतीय जनसंघ की स्थापना के बाद पंडित दीनदयाल उपाध्याय मात्र डेढ़ दशक ही जिए परंतु उनका वह सुनहरा स्वप्न आज साकार हो चुका है । कालांतर में भारतीय जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी का रूप ले लिया और आज वह विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का कीर्तिमान स्थापित कर चुकी है। भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के कर्मठ व्यक्तित्व और गहन चिंतन से प्रभावित होकर कहा था कि अगर भारत के पास दो दीनदयाल होते तो इस देश का राजनीतिक परिदृश्य ही अलग होता। पूर्व प्रधानमंत्री स्व पंडित अटल बिहारी वाजपेयी की दृष्टि में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ज्ञान का सूर्य थे।
एक राष्ट्र एक चुनाव भारत में प्रस्तावित चुनावी सुधार है जो देश में सभी चुनावों को एक साथ कराने की वकालत करता है, चाहे वह संसदीय, राज्य विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव हों, हर पाँच साल में एक बार एक साथ कराए जाने चाहिए। इस अवधारणा का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना, चुनाव से संबंधित खर्चों को कम करना, बार-बार होने वाले चुनावों से होने वाले व्यवधान को कम करना और अभियान से हटकर नीति कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करके शासन को बेहतर बनाना है। समर्थकों का तर्क है कि इससे मतदाताओं की भागीदारी भी बढ़ेगी और चुनावों का निरंतर चक्र समाप्त होगा। हालाँकि, कार्यान्वयन के लिए व्यापक संवैधानिक संशोधनों और राजनीतिक दलों और हितधारकों के बीच आम सहमति की आवश्यकता होती है।
एक राष्ट्र एक चुनाव के पीछे का विचार भारत में लोकसभा (संसद का निचला सदन) और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ समयबद्ध करना है। फिलहाल, भारत में हर पाँच साल में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए चुनाव होते हैं। सरकार पर लागत का बोझ बढ़ाने के लिए, कुछ राज्य अपनी राज्य विधानसभाओं के लिए अलग-अलग चुनाव भी कराते हैं। एक राष्ट्र एक चुनाव की अवधारणा के तहत सभी चुनाव एक साथ आयोजित करके, चुनावों की संख्या और उनके साथ होने वाले खर्चों को कम करके चुनावी प्रक्रिया को सरल बनाने की उम्मीद है। इस समन्वय के कारण मतदाता एक साथ कई चुनावों में भाग ले सकते हैं, जिससे चुनावी प्रक्रिया सुव्यवस्थित होगी और संभवतः मतदान में वृद्धि होगी। प्रशासन को चुनाव समय-सारिणी में सामंजस्य स्थापित करके शासन की प्रभावशीलता में सुधार करने की उम्मीद है।
भारत में एक राष्ट्र एक चुनाव के क्रियान्वयन के कई संभावित लाभ हैं, विभिन्न स्तरों पर चुनावों को एक साथ कराने से चुनाव संबंधी व्यय में उल्लेखनीय कमी आएगी, जिसमें सुरक्षा, रसद और प्रचार की लागत शामिल है। बार-बार चुनाव होने से अक्सर शासन में व्यवधान पैदा होता है क्योंकि नीति कार्यान्वयन के बजाय चुनाव प्रचार पर ध्यान केंद्रित हो जाता है। एक राष्ट्र एक चुनाव से शासन को स्थिर करने की लंबी अवधि मिलेगी, जिससे निर्वाचित प्रतिनिधि नीतियों को लागू करने पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे। बार-बार चुनाव होने से कभी-कभी मतदाता थक जाते हैं और मतदान में कमी आती है। एक साथ चुनाव होने से मतदाताओं को हर पाँच साल में केवल एक बार ही वोट डालना होगा, जिससे संभावित रूप से मतदाताओं की भागीदारी बढ़ेगी और वे अधिक सूचित निर्णय ले सकेंगे।
एक साथ चुनाव होने से नीति निरंतरता सुनिश्चित होगी क्योंकि एक ही सरकार एक निश्चित अवधि के लिए सभी स्तरों पर सत्ता में रहेगी। इससे दीर्घकालिक योजना और सुसंगत नीति कार्यान्वयन में सुविधा होगी। अलग-अलग समय पर कई चुनाव कराने से प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव पड़ता है। एक राष्ट्र एक चुनाव से चुनाव आयोगों पर बोझ कम होगा। समन्वित चुनावों से संभावित रूप से अधिक राजनीतिक स्थिरता आ सकती है, क्योंकि इससे बार-बार होने वाले मध्यावधि चुनावों, गठबंधन सरकारों और इससे जुड़ी अस्थिरता की संभावना कम हो जाएगी।
भारत में एक राष्ट्र एक चुनाव के क्रियान्वयन में कई संभावित कमियाँ हैं। एक राष्ट्र एक चुनाव भारत में विभिन्न राज्यों की अद्वितीय राजनीतिक गतिशीलता और क्षेत्रीय हितों को कमजोर कर सकता है, क्योंकि यह एक समान चुनाव चक्र को बढ़ावा देता है। यह अलग-अलग राज्यों के विविध मुद्दों और आकांक्षाओं को नजरअंदाज कर सकता है, जिससे उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं की उपेक्षा हो सकती है। समकालिक चुनावों के साथ, एक जोखिम है कि राष्ट्रीय मुद्दे स्थानीय चिंताओं पर हावी हो जाएँगे। स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर पर्याप्त ध्यान और चर्चा नहीं हो सकती है, क्योंकि राजनेता राष्ट्रीय स्तर के प्रचार और एजेंडे पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
भारत का संघीय ढांचा राज्यों को अपनी सरकारें और नीतियाँ रखने की अनुमति देता है। एक राष्ट्र एक चुनाव शक्ति और निर्णय लेने को केंद्रीकृत करके इस संघीय ढांचे को कमजोर कर सकता है, जिससे राज्यों की स्वायत्तता और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने की उनकी क्षमता कम हो सकती है। बार-बार चुनाव होने से मतदाता थक सकते हैं, जहाँ नागरिक असंबद्ध हो जाते हैं और चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने में कम रुचि रखते हैं। एक साथ चुनाव कराने के लिए प्रचार उद्देश्यों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होती है। सीमित फंडिंग वाले छोटे दल या उम्मीदवार बड़े पैमाने पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए संघर्ष कर सकते हैं, जिससे संभावित रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलन पैदा हो सकता है और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आवाज़ों की विविधता सीमित हो सकती है।
भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएँ, प्राथमिकताएँ और नीतिगत प्राथमिकताएँ हो सकती हैं। एक राष्ट्र एक चुनाव नीति निरंतरता को बाधित कर सकता है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर की सरकारों में बदलाव से राज्य स्तर के शासन में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं, जो संभावित रूप से दीर्घकालिक योजना और विकास को प्रभावित कर सकते हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में समकालिक चुनावों को लागू करना महत्वपूर्ण तार्किक चुनौतियाँ पेश करता है। पर्याप्त सुरक्षा, कुशल प्रशासन और कई हितधारकों के बीच समन्वय सुनिश्चित करना जटिल हो सकता है और इससे चुनाव कराने में तार्किक विफलताओं या देरी का जोखिम बढ़ सकता है। संविधान संशोधन: विभिन्न स्तरों पर चुनावी चक्र और सरकारों के कार्यकाल को बदलने के लिए संविधान के कई प्रावधानों में संशोधन करने की आवश्यकता होगी, जो एक जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया हो सकती है।
एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव का उद्देश्य चुनावों की आवृत्ति को कम करना और चुनावों के निरंतर चक्र से बचकर अधिक कुशल शासन प्रणाली बनाना है, जो विकास कार्यों को बाधित कर सकता है और महत्वपूर्ण वित्तीय बोझ डाल सकता है। अधिवक्ताओं का तर्क है कि इससे बेहतर नीति निरंतरता होगी, क्योंकि सरकारों के पास बार-बार चुनावों से बाधित हुए बिना अपने कार्यक्रमों को लागू करने के लिए एक निश्चित कार्यकाल और पर्याप्त समय होगा। हालांकि, "एक राष्ट्र, एक चुनाव" के कार्यान्वयन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और इसके लिए संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता होती है। भारतीय संविधान में कहा गया है कि राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है, जबकि लोकसभा का कार्यकाल अविश्वास प्रस्ताव या अन्य तरीकों से पहले ही भंग किया जा सकता है। सभी चुनावों को एक साथ कराने के लिए, राज्य विधानसभाओं या लोकसभा को समय से पहले भंग करना होगा या उनके कार्यकाल को संरेखित करने के लिए विस्तारित करना होगा।
इसके अतिरिक्त, भारत के राजनीतिक परिदृश्य और देश के संघीय ढांचे की विविधता विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्यों के बीच आम सहमति प्राप्त करना जटिल बनाती है। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक गतिशीलता, क्षेत्रीय मुद्दे और स्थानीय चिंताएँ हैं, जो चुनावों के लिए एक केंद्रीकृत दृष्टिकोण के साथ संरेखित नहीं हो सकती हैं।
लेखक:-डॉ. सत्यवान सौरभ
वैसे यह युद्ध कोई नया नहीं है, सत्य और असत्य का युद्ध सदियों से चल रहा है। हर खेमे के अपने-अपने तर्क हैं, किंतु भारतीय वांग्मय अपने संपूर्ण अध्ययन के साथ इसी निष्कर्ष पर पहुंचता है, आखिर विजय सत्य की ही होती है। यह सत्य भले ही फिर अपने संघर्षकाल में अत्यधित परेशान दिख सकता है पर अंतिम परिणाम उसी के पक्ष में आता है। भारत के वर्तमान संदर्भों में भी एक युद्ध चल रहा है। जिसे हम नैरेटिव वॉर भी कहते हैं। इस युद्ध में भारत विरोधी अनेक मुखौटे हैं वे देश के अंदर हैं, देश के बाहर हैं और वह कई सूरतों में हैं । गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) में भी अनेक संस्थाएं हैं जो वैश्विक स्तर पर भारत को हर तरह से कमजोर करने के काम में जुटी हुई हैं। इन्हीं में से एक संस्था ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ भी है, कहने को ये मानवाधिकार संरक्षण के लिए कार्य करती है, किंतु इसका मुख्य कार्य भारत की छवि खराब करना है।
अब ताजा उदाहरण ही ले लें, जम्मू और कश्मीर में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं, वहां तीन चरणों में विधानसभा चुनाव हो रहा है। पहले फेज में 24 सीटों पर 18 सितंबर को चुनाव हुए और 17 सितम्बर को जैसे ही घड़ी में रात के बारह बजे के बाद का समय आरंभ हुआ और 18 सितंबर शुरू होती है, ये ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ भारत के विरोध में एक रिपोर्ट तीन भाषाओं अंग्रेजी, हिन्दी और उर्दू में प्रकाशित करती है, शीर्षक- ‘‘भारत : सरकार को जम्मू-कश्मीर में असहमति का दमन रोकना चाहिए’’ विचार करें, आखिर उसने ये ही दिन इसके लिए क्यों चुना? जबकि उसे पता है कि जम्मू-कश्मीर जैसे वर्षों से संवेदनशील रहे राज्य में चुनाव हो रहे हैं। अभी आगे भी दूसरे फेज में 26 सीटों पर 25 सितंबर और तीसरे फेज में 40 सीटों पर एक अक्टूबर को यहां वोटिंग होनी है। वास्तव में ये है भारत विरोध का नैरेटिव गढ़ना ।
जम्मू-कश्मीर में हो रहे विकास को नकारती है ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’
‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ ने एक सिरे से इस बात को नकार दिया है कि पिछले वर्षों में केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद जम्मू-कश्मीर में भारी विकास हुआ है और यह विकास हर सेक्टर में दिखता है। आतंकवाद का सफाया करने में मोदी सरकार की नीतियां प्रभावी सिद्ध हुई हैं। पिछले सालों में कई नए उद्योगपति, खिलाड़ी एवं अन्य अनेक प्रतिभावान लोगों का इस राज्य से व्यापक फलक पर आना इसलिए संभव हुआ, क्योंकि यहां शांति और विकास जो वर्षों से अवरुद्ध था, उसके लिए द्वार खुले। किंतु ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ क्या कह रही है? यही कि केंद्र सरकार यहां के लोगों को बहुत प्रताड़ित कर रही है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियां यहां के लोगों की बोलने तक की स्वतंत्रता को दबाने का काम कर रही हैं।
संस्था खुलेआम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आरोप लगाती है, ‘‘...जबसे भारत ने राज्य की विशेष स्वायत्तता रद्द की है उसके बाद से सरकार द्वारा मानवाधिकारों का दमन बढ़ता जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लिया गया, पासपोर्ट निरस्त किए गए, अपारदर्शी 'नो फ़्लाइंग लिस्ट 'बनी। ’’ जबकि ये कितना बड़ा जूठ है, वह हाल ही में सामने आए पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री के बयान से समझा जा सकता है। वर्ष 2014 में केंद्र की भाजपा सरकार के पहले सुशील कुमार शिंदे भारत के गृहमंत्री थे, उन्होंने जम्मू-कश्मीर से जुड़ा अपना अनुभव साझा किया। राशिद किदवई की किताब 'फाइव डिकेड्स इन पॉलिटिक्स' के लॉन्च पर कांग्रेस नेता शिंदे बोले, ‘गृह मंत्री बनने से पहले मैं शिक्षाविद विजय धर से मिलने गया था। मैं उनसे सलाह मांगता था। उन्होंने मुझे सलाह दी कि लाल चौक (श्रीनगर में) घूमना नहीं बल्कि जाना और लोगों से मिलना, डल झील घूमना। ऐसा करोगे तो लोगों को लगेगा कि ये कितना अच्छा गृहमंत्री है जो बिना डरे कश्मीर जाता है, इससे लोकप्रियता मिलेगी। लेकिन मैं किसे बताऊं कि लाल चौक पर मेरी फ$% (आपत्तिजनक शब्द) रही थी ।’ पर आज क्या जम्मू-कश्मीर में यह स्थिति है?
धारा 370 हटने से इतना बदला है ये राज्य
सच पूछिए तो देश का यह राज्य पिछले वर्षों में बहुत बदला है। कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटे चार वर्ष से ज्यादा का समय हो गया। कश्मीर में कई बड़े बदलाव दिखाई देते हैं, वह तरक्की के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। पुलिस और सेना पर पत्थर फेंकने वाले अब नजर नहीं आते। शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, निर्बाध ऑनलाइन सेवाएं, बिजली उन्नयन, सड़क नेटवर्क, पाइप जलापूर्ति और अन्य सभी सुविधाएं घाटी की जनता को मिल रही हैं। यहां पहले अधिकतर दिन स्कूल बंद हुआ करते थे और अब स्कूल अपने अधिकतम दिन खुले रहते हैं।
पहले जिस लालचौक पर खुलेआम पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते थे वहां अब तिरंगा लहराता है। वास्तव में तिरंगा का यहां लहराना अपने आप में बहुत कुछ कह रहा है । ये तस्वीर दिखाती है कि पांच अगस्त 2019 के बाद से कश्मीर पहले वाला नहीं रहा । स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत यहां के घंटा घर को एफिल टॉवर का लुक दिया गया है। जम्मू-कश्मीर में शांति लौटने का सबसे ज्यादा फायदा टूरिज्म इंडस्ट्री में दिखता है। आतंकवाद के दौर में दूर हो गई फिल्म इंडस्ट्री तथा सिनेमा संस्कृति दोबारा लौट आई है। नाइट लाइफ सड़कों पर लौट आई है। डल झील देर रात तक आबाद रहती है। मैदानों में देर रात तक लोग खेल का रोमांच लेते देखे जा सकते हैं। पहली बार विदेशी निवेश भी हुआ है और कई हजार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है।
‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ सुरक्षा के नाम पर छुपा जाती है, सही बात का दावा करनेवालों के नाम
चलो, एक बार को मान लेते हैं कि ये सरकारी आंकड़े हैं, किंतु क्या यहां की जनता भी आज झूठ बोल रही है। ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ जिन कुछ नामों का हवाला देकर भारत विरोधी नैरेटिव गढ़ती है, उनके असली नाम तक वह सुरक्षा का हवाला देकर छुपा जाती है। किंतु हम उनकी बात करते हैं, जिनके नाम भी असली है और पहचान भी। वे वहां खुलकर आज मीडिया को बता रहे हैं कि केंद्र में मोदी सरकार के रहते विकास की नई कहानी लिखी गई है। शिक्षा, किसान, युवाओं, महिलाओं, उद्यमियों समेत सभी वर्गों का ख्याल रखा जा रहा है। मोमिन नाम के विद्यार्थी की बात सुनिए; स्कूल में पहले से कई गुना बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं। एक छात्रा बोली, "हमारा स्कूल अब पहले से बेहतर है, और इसमें पहले से ज़्यादा सुविधाएँ हैं। जम्मू-कश्मीर की ये छात्रा डॉक्टर बनना चाहती है।
दिल्ली में जेएनयू छात्रसंघ की पूर्व उपाध्यक्ष और मुस्लिम एक्टिविस्ट शेहला रशीद जिन्होंने कभी कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाए जाने का विरोध किया, जो पिछले 10 साल के दौरान मोदी सरकार के खिलाफ सिर्फ जहर उगलती रही हैं, वे आज कह रही हैं कि कश्मीर में हुए बदलाव का श्रेय पीएम मोदी और अमित शाह को जाता है। इस राज्य में सर्वत्र विकास हो रहा है।
श्रीनगर में रहते अशाक हुसैन का भी यही अनुभव है, वे कह रहे हैं, ‘‘हमारे पास बेहतर सड़कें हैं, अधिक व्यवसाय फिर से खुल रहे हैं और सामान्य स्थिति लौटने की भावना है।’’ इसी तरह से श्रीनगर के डाउनटाउन निवासी ‘बसारत’ का अपना एक नया अनुभव है, उनके अनुसार ‘‘यह ताज़ी हवा के झोंके जैसा है। इन सड़कों पर जो डर और तनाव कभी हावी रहता था, वह अब खत्म हो गया है। लोग आज़ादी से घूम रहे हैं, कारोबार बढ़ रहा है और शांति का ऐसा अहसास है जो हमने सालों से महसूस नहीं किया था। यह नया कश्मीर है जिसकी हमें हमेशा से उम्मीद थी।’’ आज की हकीकत यही है कि श्रीनगर का डाउनटाउन इलाका अब एक नए विकासात्मक-उत्साही समय से गुजर रहा है । जामिया मस्जिद के आसपास का इलाका, जो कभी वीरान रहता था, अब जीवंत हो उठा है जो कभी अशांत क्षेत्र था।
सी-वोटर का सर्वे भी करता है इस राज्य में विकास की बात
सी-वोटर ने इस साल एक सर्वे 15 जुलाई से 10 अगस्त के बीच किया था। जम्मू और कश्मीर में जनता की राय इसमें हर पहलू से जानी गई। सर्वे का निष्कर्ष आज सभी के सामने है, जिसमें कि यहां के लोग अब आतंक की बात नहीं करते हैं, बल्कि विकास चाहते हैं और मुख्यधारा से जुड़ने के लिए खासे उत्साहित हैं। राज्य के सुरक्षा हालात में लगातार 2014 के बाद से बदलाव आया है। अब जम्मू-कश्मीर में आतंक की घटनाएँ दहाई आँकड़ों में सिमट गई हैं । आँकड़ा बता रहा है कि यहाँ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। सुरक्षा स्थिति सुधरने के कारण 2023 में जम्मू कश्मीर में 2.11 करोड़ पर्यटक आए। यह संख्या 2015 में मात्र 1.33 करोड़ थी।
पीएम पैकेज के तहत नियुक्त सरकारी कर्मियों को आवास की सुविधा मुहैया कराई जा रही है। कश्मीर घाटी में बॉलीवुड की वापसी की दिशा में सरकार ने नई फिल्म नीति का निर्माण किया है। पिछले चार साल में 500 से अधिक फिल्मों की शूटिंग की अनुमति दी गई है। श्रीनगर में मॉल समेत दक्षिणी व उत्तरी कश्मीर में सिनेमा हॉल खोले गए हैं। इसी तरह से जम्मू कश्मीर के आर्थिक सर्वे के मुताबिक़, 2014-15 में राज्य की अर्थव्यस्था का आकार ₹98366 करोड़ था। यह अब बढ़ कर ₹2.25 लाख करोड़ हो चुका है। यानी राज्य की अर्थव्यवस्था मोदी सरकार के बीते लगभग 10 वर्षों में दोगुनी से भी अधिक बढ़ी है। वर्तमान में राज्य के 15 लाख से अधिक घरों में सीधे नल से जल पहुँच रहा है। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत राज्य में 47 हजार से अधिक घरों को मंजूरी मिल चुकी है। राज्य में दो नए एम्स भी केंद्र सरकार ने बनाए हैं।
जम्मू-कश्मीर के निवासी शाह इम्तियाज आज कह रहे हैं कि ‘‘पहले यह मुश्किल था। अशांति के कारण बाजार अक्सर बंद रहता था और हम जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहे थे। लेकिन अब, चीजें बेहतर के लिए बदल गई हैं। हमारे पास स्थानीय और पर्यटक दोनों तरह के ग्राहकों का निरंतर प्रवाह है।’’ उन्होंने अनुच्छेद 370 को हटाने के समर्थन में भी बात कहीं।
बदलाव की बयार उन माता-पिता से भी पूछो जो अपने बच्चों का सुखद भविष्य चाहते हैं
बदलाव क्या होता है! यह वहां की आम जनता (माता-पिता) द्वारा कराई जा रही वे गोपनीय जांचे हैं, जो अपनी बेटी के सुखद भविष्य के लिए वे करा रहे हैं। अभिभावक जानना चाहते हैं कि जिसके साथ उनकी बेटी का विवाह होने जा रहा है, कहीं उसके आतंकी कनेक्शन तो नहीं। अब इससे बड़ा विकास का उदाहरण भला क्या हो सकता है? जबकि एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के बोर्ड के अध्यक्ष आकार पटेल कह रहे हैं, ‘भारतीय अधिकारी जम्मू-कश्मीर में डर का माहौल बनाने के लिए मनमाने प्रतिबंधों और दंडात्मक कार्रवाइयों का उपयोग कर रहे हैं...इसी कारण वे देश के भीतर और बाहर स्वतंत्र रूप से घूमने में असमर्थ हैं। सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) का भी दुरुपयोग जारी रखा है’ ये एमनेस्टी इंटरनेशनल का कितना बड़ा जूठ और भारत को विश्व भर में बदनाम करने का नैरेटिव है, आप ये अच्छे से सोच सकते हैं!
भारत विरोधियों को सही ठहराने में लगी ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’
ये संस्था केंद्र सरकार के विरोध में लोगों को उकसा रही है । उदाहरण के तौर पर जम्मू और कश्मीर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) से जुड़े एक कार्यकर्ता और राजनीतिक नेता वहीद पारा के दिए वक्तव्य को देखा जा सकता है। इल्तिजा मुफ्ती, जो पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी से जुड़ी राजनीतिक नेता महबूबा मुफ्ती की बेटी और मीडिया सलाहकार हैं, अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से लगातार केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ बोलती रही हैं, उन समेत ब्रिटिश पत्रकार अमृत विल्सन के वक्तव्यों को देखिए। निताशा कौल कश्मीरी मूल की राजनीति की ब्रिटिश-भारतीय प्रोफेसर हैं, जिन्होंने विदेश मामलों की यूनाइटेड स्टेट हाउस कमेटी के समक्ष कश्मीर में मानवाधिकार की स्थिति के बारे में गवाही दी है और जिनका काम ही मोदी सरकार एवं भारत की सरकार का विरोध करना है, उन्हें सही ठहराने का काम ये ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ आज कर रही है।
जून 2024 में, भारतीय अधिकारियों ने जम्मू और कश्मीर कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष मियां अब्दुल कयूम को गिरफ़्तार किया, जो भारतीय अधिकारियों द्वारा मानवाधिकारों के उल्लंघन और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद से लगातार देश विरोध में जहर उगल रहे थे। जुलाई 2024 में, उन्होंने पीएसए के तहत तीन और वकीलों को गिरफ़्तार किया । सभी चार वकीलों को हिरासत में रखा जा रहा है। वहीं, पत्रकार माजिद हैदरी और सज्जाद गुल हिरासत में हैं। इन सभी पर “राष्ट्र-विरोधियों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने” और “राष्ट्र-विरोधी और अलगाववादी समर्थक” विचारधारा रखने के आरोप है। यहां ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल’ इन सभी भारत विरोधियों के खिलाफ समर्थन का माहौल बनाने में जुटी है।
अपराधियों में भी खोज रही हिन्दू-मुस्लिम एंगल
एमनेस्टी इंटरनेशनल मुस्लिम बहुल श्रीनगर में हिंदू बहुल जम्मू की तुलना में लगातार अधिक मामले दर्ज किए जाने का दावा करती है, जबकि वह भूल जाती है कि जहां अपराध अधिक होता है, वहीं प्रकरण अधिक दर्ज होते हैं, इसमें हिन्दू और मुस्लिम जनसंख्या से क्या लेना-देना है? लेकिन वह यहां अपराध में भी हिन्दू-मुस्लिम करने में लगी है! वह एलजी की शक्तियों का खुलकर विरोध कर रही है। इस संस्था के इंडिया अध्यक्ष आकार पटेल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के नाम पर सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत रिहा किरने की मांग कर रहे हैं। अब बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह संस्था ऐसा पहली बार कर रही है? उत्तर होगा नहीं, बिल्कुल नहीं। इससे पहले नक्सलवादियों को मदद के प्रकरण हों या भारत विरोधी अन्य मामले, इसमें भी इस संस्था की संलिप्तता बार-बार सामने आती है । अब देश हित में यही अच्छा होगा कि भारत सरकार इसकी संपूर्ण गतिविधियों को संज्ञान में ले और इसे भारत के बाहर का रास्ता दिखाए।
लेखक: डॉ. मयंक चतुर्वेदी
