रायपुर, 04 अक्टूबर 2024 | मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की पहल पर वनौषधि प्रसंस्करण के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की जा रही है ताकि वे आर्थिक रूप से सशक्त हो सकें। वन औषधियों के प्रसंस्करण से न केवल प्राकृतिक संसाधनों का उचित उपयोग हो रहा है, बल्कि स्थानीय महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर भी मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री साय ने इस क्षेत्र में महिलाओं की सक्रीय भूमिका को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करने का आह्वान किया है।
छत्तीसगढ़ के कटघोरा वनमंडल में स्थित हरिबोल स्व सहायता समूह, डोंगानाला की 12 महिलाओं द्वारा संचालित वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र ने अपनी मेहनत, लगन और सामूहिक प्रयासों से एक प्रेरक सफलता हासिल की है। वर्ष 2006-07 में शुरू हुई यह केंद्र यूरोपियन कमीशन परियोजना के अंतर्गत संचालित होता है। आज यह समूह अपने अनूठे प्रयासों के कारण प्रदेशभर में एक मिसाल बन चुका है।
इस समूह की महिलाओं का शुरुआती जीवन बेहद संघर्षपूर्ण था। पहले वे गांव में मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाती थी। उनकी मासिक आय मुश्किल से 500-600 रुपये होती थी। आर्थिक तंगी से जूझते हुए उनके सामने कई चुनौतियाँ थी, लेकिन एक सामूहिक संकल्प ने उनकी जिंदगी बदल दी।
समूह ने वनौषधियों के प्रसंस्करण के क्षेत्र में कदम रखा और आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्माण शुरू किया। समूह द्वारा हिंगवाष्टक चूर्ण, अश्वगंधादि चूर्ण, सीतोपलादी चूर्ण, पुष्यानुग चूर्ण, बिलवादी चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, पंचसम चूर्ण, शतावरी चूर्ण, आमलकी चूर्ण, पयोकिल दंतमंजन, हर्बल काफ़ी चूर्ण, महिला मित्र चूर्ण, हर्बल फेसपैक चूर्ण, हर्बल केशपाल चूर्ण आदि जैसी कई आयुर्वेदिक वनौषधियों का निर्माण किया जाता है। कच्ची वनौषधियों का संग्रहण, घटकों का निर्धारण और प्रसंस्करण कार्य आयुर्वेद चिकित्सक (टेक्निकल स्टाफ) के मार्गदर्शन में किया जाता है। समूह ने हाल ही में आयुष विभाग से 2 करोड़ रुपये का ऑर्डर प्राप्त किया है, जिससे समूह की गुणवत्ता का प्रमाण स्वयं सिद्ध होता है। यह न केवल उनकी उत्कृष्टता को दर्शाता है, बल्कि उनके प्रयासों की निरंतर बढ़ती विश्वसनीयता और मांग को भी साबित करता है।
हरिबोल स्व सहायता समूह की महिलाओं की उद्यमिता से उत्पादित इन वनौषधियों की मांग स्थानीय और प्रदेश स्तर पर अत्यधिक है। समूह द्वारा प्रतिवर्ष औसतन लगभग 44 लाख की वनौषधियों का विक्रय किया जाता है। इसके अलावा केंद्र में नियुक्त अनुभवी वैद्य की देखरेख में स्थानीय एवं आसपास के सैकड़ों मरीजों का विभिन्न बीमारियों का इलाज भी किया जा रहा है।
हरिबोल स्व सहायता समूह की कड़ी मेहनत और समर्पण का परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2007-08 में 97,204 रुपये का लाभ अर्जित किया गया। यह शुरुआत की सफलता ने महिलाओं का आत्मविश्वास और बढ़ा दिया। वर्ष 2023-24 में समूह ने 6,57,254 रुपये का शुद्ध लाभ कमाया, जिससे प्रत्येक सदस्य की वार्षिक आय लगभग पौने दो लाख रुपये तक पहुँच गई। यह आर्थिक परिवर्तन उनकी पुरानी स्थिति के मुकाबले एक विशाल उन्नति थी।
इसके अतिरिक्त समूह की प्रत्येक सदस्य को प्राप्त लाभांश में से 3000 रुपये घरेलू कामों के लिए दिया जाता है, जबकि शेष राशि का उपयोग केंद्र के उन्नयन और विकास के लिए किया जाता है। इस प्रकार समूह न केवल व्यक्तिगत आय में वृद्धि कर रहा है, बल्कि स्थिर और दीर्घकालिक विकास की दिशा में भी अग्रसर है।
हरिबोल स्व सहायता समूह ने न केवल अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारा है, बल्कि समाज में अपनी पहचान भी मजबूत की है। महिलाएँ अब आत्मनिर्भर हैं और अपने परिवारों को बेहतर जीवन प्रदान कर रही हैं। उनके आत्मविश्वास में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और वे अपनी उद्यमशीलता से दूसरों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।
समूह की अध्यक्ष श्रीमती सरोज पटेल ने इस सफलता के बारे में कहा, राज्य वन विभाग के सहयोग से हमारा जीवन स्तर बहुत सुधर गया है। आज हम आत्मनिर्भर हैं और समाज में सम्मानित स्थान पा चुके हैं।
इस परियोजना की सफलता में छत्तीसगढ़ वन विभाग ने अहम भूमिका निभाई है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख श्री व्ही. श्रीनिवास राव ने कहा कि मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय एवं वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में वन औषधियों के संग्रहण, प्रसंस्करण और विपणन में स्व सहायता समूहों को शामिल करके आय सृजन के प्रति राज्य वन विभाग प्रतिबद्ध है। इस पहल से न केवल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया गया है, बल्कि राज्य की वन संपदा का भी सही उपयोग हो रहा है।
हरिबोल स्व सहायता समूह को न केवल स्थानीय स्तर पर सराहा गया है, बल्कि इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान मिला है। सिंगापुर में इसे प्रतिष्ठित ग्रिट पुरस्कार से सम्मानित किया गया और भारत सरकार के ट्राइफेड और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा बेस्ट फॉरेस्ट प्रोड्यूस पुरस्कार से नवाजा गया है।
डोंगानाला का यह वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र न केवल हरिबोल स्व सहायता समूह की महिलाओं के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गया है। इस पहल ने यह साबित किया है कि सही दिशा और संकल्प के साथ किए गए प्रयास बड़े से बड़े परिवर्तन ला सकते हैं। आज यह समूह अन्य स्व सहायता समूहों और ग्रामीण समुदायों के लिए एक आदर्श उदाहरण है कि सामूहिकता, मेहनत और दृढ़ निश्चय से सपने पूरे किए जा सकते है।
संगठित सफर, श्रद्धा का संग,
अयोध्या की धरती, है सबका अंग।
राम लला के चरणों में हम चलें,
भक्ति की धारा में सब मिलकर पलें।
सुविधाएँ मिलीं, बढ़ी है आस,
यात्रा में बहे, प्रेम का खास।
बसों की कतार, ट्रेन का सफर,
हर दिल में बसी, राम का असर।
छत्तीसगढ़ मुख्यमंत्री की पहल पर श्री राम लल्ला दर्शन योजना (अयोध्या दर्शन कार्यक्रम) का आयोजन जनवारी माह से किया गया है। इस पहल का उद्देश्य छत्तीसगढ़ के श्रद्धालुओं को अयोध्या के राम जन्मभूमि के दर्शन कराने और वहां की धार्मिक सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने का है।
इस कार्यक्रम के तहत, मुख्यमंत्री द्वारा विशेष बस सेवाएँ, यात्रा सुविधाएँ, और समूहों में दर्शन की व्यवस्था की जा रही है। इससे श्रद्धालुओं को अयोध्या पहुँचने और वहां के महत्व को समझने का अवसर मिलेगा।
यह पहल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने और राज्य के लोगों को आध्यात्मिकता से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
राजधानी रायपुर के रेल्वे स्टेशन से अयोध्या जाने वाली 12 कोच वाली विशेष ट्रेन में सैकड़ो राम भक्तों की टोली को लेकर रवाना हुई। ट्रेन में भगवान राम लला के दर्शन के लिए लोगों में अपार उत्साह दिखाई दिया। श्री राम लला के दर्शन के लिए जाने वालों में गांव के लोगों की टोली, पति-पत्नि, रिश्तेदार भी शामिल थे। उनके जय श्रीराम-जय श्री राम के नारों की गूंज ने पूरे रेल्वे स्टेशन के वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
ऐसे ही एक श्रद्धालु तिल्दा ब्लॉक से पहली बार अयोध्या जा रही श्रीमती झांसी वर्मा तिल्दा ने कहा कि अयोध्या धाम जाने के लिए वह बहुत खुश और उत्साहित हैं। उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान राम लला के दर्शन का सौभाग्य जो मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय द्वारा दिया गया है उसके लिए मैं मुख्यमंत्री जी को बहुत-बहुत धन्यवाद देती हूं।
स्पेशल ट्रेन से तिल्दा-नेवरा से भगवान रामलला के दर्शन करने अपनी पत्नी श्रीमती देवकी वर्मा के साथ अयोध्या जा रहे श्री तुलसी राम वर्मा ने बताया कि अयोध्या में जब भगवान राम लला झोपड़ी में रहते थे, तब उनके दर्शन किये थे। हमारा सौभाग्य है कि अब तीर्थयात्रा में अयोध्या धाम जाने का फिर अवसर मिला है। उन्होंने योजना के माध्यम से अयोध्या में भगवान राम के दर्शन करवाने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के साथ मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय का भी आभार जताया।
तिल्दा ब्लॉक की श्रीमती सिंधु लता वर्मा ने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय को अयोध्या धाम में रामलला के दर्शन के लिए भेजने के लिए धन्यवाद देते हुए व्यवस्था की तारीफ की और कहा कि हर किसी को यह मौका मिलना चाहिए। तिल्दा ब्लॉक के ग्राम चांपा के श्री तुलाराम ने राम लला के दर्शन के लिए भेजने के लिए राज्य सरकार को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हुए कहा कि भगवान मुख्यमंत्री को हमेशा सुखी रखे।
गौरतलब है कि छतीसगढ़ देश का पहला राज्य है, जहां की जनता को सरकारी खर्च पर श्री रामलला का दर्शन कराया जा रहा है। आने वाले दिनों में श्री रामलला दर्शन योजना के तहत यह विशेष ट्रेन छत्तीसगढ़ के श्रद्धालुओं को सप्ताह में एक बार अयोध्या धाम का दर्शन कराएगी। श्री रामलला दर्शन योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा श्रद्धालुओं को छत्तीसगढ़ से अयोध्या ले जाने के साथ वहां ठहरने, मंदिर दर्शन कराने के साथ नाश्ते और खाने की भी व्यवस्था की गई है। श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य, सुविधा और सुरक्षा की दृष्टि से ट्रेन में टूर एस्कॉर्ट, सुरक्षा कर्मी और चिकित्सकों का दल भेजे जा रहे हैं।
भारी मशीनरी की खनक-खनक की आवाज़ से अभ्यस्त होने में कुछ समय लग सकता है। शुरू में जया को फैक्ट्री के जीवन की सटीकता और गति डरावनी लगी। याद रखने के लिए नियम थे, अनुसरण करने के लिए कदम थे और सम्मान करने के लिए पदानुक्रम थे। 38 साल की उम्र में, कोविड-19 की पहली लहर के दौरान अपने पति की अचानक मृत्यु के बाद, जया को एक ऐसी भूमिका में धकेल दिया गया था, जिसके लिए किसी ने उसे तैयार नहीं किया था। जया की कहानी महिलाओं को सशक्त बनाने और समुदायों को बदलने में लेबर हेल्पलाइन और लेबर रिसोर्स सेंटर के दूरगामी प्रभाव का प्रमाण है। छत्तीसगढ़ श्रम विभाग को यूएनडीपी के संसाधन, विशेषज्ञता और सहायता ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जया ने कहा, जब मेरे पति का निधन हुआ, तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं घुटन भरे अंधेरे में घिर गई हूं, जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा है। पति की मृत्यु के बाद जीवन आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक कलंक से भरा हुआ था, जो अक्सर भारतीय समाज में विधवा होने के साथ होता है। जया दुख और अविश्वास के सागर में डूबी हुई थी। लेकिन जल्द ही उसे अपने पति के कर्ज की सच्चाई का सामना करना पड़ा। अनिश्चित वित्तीय भविष्य सामने था और जया जानती थी कि उसे चीजों को सही करने के लिए कार्यबल में प्रवेश करना होगा।
आशा की एक किरण रायपुर में स्थापित सीएम श्रमिक हेल्पलाइन (मुख्यमंत्री श्रमिक सहायता केंद्र) के रूप में सामने आई। वहां, जया को मुख्यमंत्री निर्माण श्रमिक मृत्यु एवं दिव्यांग सहायता योजना के बारे में पता चला, जो एक सरकारी योजना थी जो एक मृत मजदूर के परिवार को वित्तीय सहायता प्रदान करती थी। दयालु स्टाफ सदस्यों ने जया को सरकारी योजना की जटिलताओं को समझने में मदद की और उसे 1,00,000 रुपये की सहायता राशि दिलाने में सहायता की।
यह रकम उनकी जीवनरेखा बन गई और कर्ज चुकाने में मदद की। उन्होंने कहा, मेरे पति की अचानक मृत्यु हो गई थी, इसलिए यह योजना बहुत मददगार रही। कर्ज चुकाने के बीच में ही इस योजना ने उन्हें बचाया। जिस दिन जया कर्ज मुक्त हुईं, उनकी सोच बदल गई। उन्हें न केवल राहत मिली, बल्कि आगे बढ़ने का दृढ़ संकल्प भी मिला। जया ने तय किया कि अब समय आ गया है कि वह अपने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर काम पर लग जाएं।
खस्ता मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में फैक्ट्री की नौकरी के पहले दिन उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। मशीनरी और निर्माण प्रक्रिया डराने वाली थी, लेकिन जया ने पहले भी कई चुनौतियों का सामना किया था। धीरे-धीरे, मुस्कुराते हुए, सौम्य सहकर्मियों की मदद से, जया ने अपनी नई भूमिका को अपनाया।
अग्रसेन जयंती एक महान राजा अग्रसेन महाराज के जन्मदिन का उत्सव है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार अग्रसेन जयंती अश्विन महीने के चौथे दिन मनाई जाती है। महाराजा अग्रसेन जयंती वैसे तो पूरे देश में धूमधाम से मनाई जाती है लेकिन दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में अग्रसेन जयंती पर विशेष आयोजन किया जाता है।
महाराजा अग्रसेन प्रतापनगर के राजा वल्लभ के पुत्र थे। वे अग्रोहा, हिसार के महान राजा थे। महाराजा अग्रसेन अपने आदर्शों और समाज कल्याण के लिए वैश्य समाज में प्रमुख रूप से जाने जाते हैं लेकिन अपने सामाजिक कार्यों के कारण वे केवल एक समाज या समुदाय तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी करुणा, दयालुता और दूरदर्शी सोच के साथ –साथ लोगों को जोड़कर रखने की क्षमता के कारण हर समुदाय के लोगों के लिए महान हैं । महाराजा अग्रसेन समानता के प्रति समर्पण और पुरानी संकीर्ण विचारधारा के प्रति अपने दृढ़ विरोध के लिए भी प्रसिद्ध थे।
महाराजा अग्रसेन ने गरीब और जरुतमंद लोगों के लिए मुफ़्त शिक्षा, अस्पताल, सामुदायिक भवन जैसे अनेक कल्याणकारी कार्य भी शुरू किए थे, जिनके कारण वे आज भी महान और दयालु राजा माने जाते हैं। महाराज अग्रसेन के बारे में कहा जाता है कि उनका शासन केवल युद्धों तक सीमित नहीं था बल्कि समाज कल्याण ही उनकी प्राथमिकता थी। आज भी अग्रसेन जयंती पर देश भर में उनकी जयंती के उपलक्ष्य में कई सामाजिक, धार्मिक कार्यों का आयोजन किया जाता है। देश में अग्रसेन जी के नाम पर आज भी कई अस्पताल, विद्यालय ,महाविद्यालयों का संचालन एवं गरीब लड़कियों का विवाह, मुफ्त भोजन की व्यवस्था जैसी कई कल्याणकारी कार्यक्रम चलाई जा रही हैं।
महाराजा अग्रसेन ने "एक ईंट और एक रुपया" का नया विचार सुझाया, जिसके तहत अग्रोहा में पहले से रहने वाला प्रत्येक परिवार पड़ोस में रहने वाले प्रत्येक नए परिवार को एक ईंट और एक रुपया प्रदान करेगा। इस तरह के कार्य ने नए लोगों को अपना घर बनाने और अपना कारोबार शुरू करने में सक्षम बनाया। जिससे कई लोगों को अपना घर और कारोबार चलाने में एक बड़ी मदद मिली। 'एक ईंट और एक रुपया' विचार ने लोगों को समाज के रूप में एकजुट किया।
