संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने पश्चिम एशिया में बढ़ते संकट को रोकने के लिए तत्काल और ठोस कूटनीतिक प्रयासों का आह्वान किया है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में सुरक्षा परिषद की एक आपातकालीन विशेष बैठक को संबोधित करते हुए उन्होंने अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु संयंत्रों पर किए गए हालिया सैन्य हमलों को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए "खतरनाक मोड़" करार दिया।
"हम शांति को नहीं छोड़ सकते — और न ही छोड़ना चाहिए," गुटेरेस ने भावुक अपील करते हुए कहा। उन्होंने आगाह किया कि यह संघर्ष यदि आगे बढ़ा, तो यह प्रतिशोध के एक खतरनाक चक्र में बदल सकता है, जिससे नागरिकों की जान और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति दोनों खतरे में पड़ सकती हैं। महासचिव ने समुद्री मार्गों की सुरक्षा और ईरानी परमाणु कार्यक्रम पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी की अनिवार्यता पर भी ज़ोर दिया।
उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) को ईरान की परमाणु सुविधाओं तक पूर्ण पहुंच दिए जाने की वकालत करते हुए एक "विश्वसनीय, व्यापक और सत्यापन योग्य समाधान" की मांग की, जिससे संकट का शांतिपूर्ण समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
सुरक्षा परिषद की इस आपात बैठक में रूस, चीन और पाकिस्तान द्वारा संयुक्त रूप से एक तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम का प्रस्ताव पेश किया गया। ईरान के स्थायी प्रतिनिधि आमिर सईद इरावानी ने अमेरिका के हमले को "ज़बरदस्त आक्रामकता" बताया और कहा कि तेहरान को आत्मरक्षा का पूर्ण अधिकार है। उन्होंने कहा कि ईरान की जवाबी कार्रवाई का समय, तरीका और सीमा उसके सशस्त्र बलों द्वारा तय की जाएगी।
इस बीच, संयुक्त राष्ट्र में इज़राइल के प्रतिनिधि डैनी डैनन ने अमेरिकी हमलों का समर्थन करते हुए कहा कि इस कार्रवाई ने दुनिया को अधिक सुरक्षित बना दिया है। दूसरी ओर, चीन के राजदूत फू कांग ने अमेरिका की सैन्य कार्रवाई की निंदा की और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की।
रूस के राजदूत वसीली नेबेन्ज़्या ने चेतावनी दी कि अमेरिका ने "भानुमती का पिटारा" खोल दिया है और इस पूरे घटनाक्रम में वाशिंगटन की कूटनीति में कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही।
अमेरिका की ओर से संयुक्त राष्ट्र में राजदूत डोरोथी शीया ने कहा कि ईरान को तनाव बढ़ाने से बचना चाहिए और यदि अमेरिकी नागरिकों या ठिकानों पर कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष हमला हुआ, तो उसका "विनाशकारी जवाब" दिया जाएगा।
यह सत्र विश्व समुदाय के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि पश्चिम एशिया की स्थिति अब कूटनीति और सैन्य शक्ति के बीच नाजुक संतुलन पर टिक गई है — और इसका वैश्विक असर अपरिहार्य हो सकता है।
