मेजर धन सिंह थापा | The Voice TV

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मेजर धन सिंह थापा

Date : 10-Apr-2023

 मेजर धन सिंह थापा परमवीर चक्र से सम्मानित नेपाली मूल के भारतीय थे। उन्हें यह सम्मान सन 1962 में मिला। 1962 के भारत-चीन युद्ध में जिन चार भारतीय बहादुरों को परमवीर चक्र प्रदान किया गया, उनमें से केवल एक वीर उस युद्ध को झेलकर जीवित रहा, उस वीर का नाम धन सिंह थापा था जो 1/8 गोरखा राइफल्स से, बतौर मेजर इस लड़ाई में शामिल हुआ था। धन सिंह थापा भले ही चीन की बर्बर सेना का सामना करने के बाद भी जीवित रहे, लेकिन युद्ध के बाद चीन के पास बन्दी के रूप में जो यातना उन्होंने झेली, उसकी स्मृति भर भी थरथरा देने वाली है। धन सिंह थापा इस युद्ध में पान गौंग त्सो (झील) के तट पर सिरी जाप मोर्चे पर तैनात थे, जहाँ उनके पराक्रम ने उन्हें परमवीर चक्र के सम्मान का अधिकारी बनाया।

जीवन परिचय

मेजर धन सिंह थापा, शिमला में पैदा हुए मेजर धन सिंह थापा को बहादुरी के लिए परमवीर चक्र से नवाजा गया है। उनके शौर्य के किस्से आज भी सेना के जवानों को बताए जाते हैं। शिमला के एक नेपाली परिवार में 04 जून 1928 को पैदा हुए धन सिंह थापा का बचपन से ही थापा सेना का हिस्सा बनना चाहते थे। बड़े होकर 28 अगस्त 1949 को उन्होंने अपनी इस इच्छा को पूरा किया। यह वह तारीख थी, जब थापा 8 गोरखा राइफ़ल्स की पहली बटालियन का हिस्सा बनाए गए। 20 अक्टूबर 1962 चीनी सैनिकों ने चुशुल एयरफील्ड पर कब्जे के इरादे से लद्दाख की एक पोस्ट पर तोप और मोर्टार से बम दागने शुरू कर दिए।

चीन की इस घुसपैठ का सामना करने के लिए पैंगांग झील के उत्तरी तट पर मौजूद श्रीजप-1 पोस्ट पर गोरखा राइफल्स के कुछ जवान मौजूद थे। जिन्होंने अपने शौर्य से दुश्मन को एक बार नहीं, बल्कि तीन बार पीछे हटने पर मजबूर किया। दुर्भाग्य से वह इस पोस्ट को नहीं बचा पाए और बंदी बना लिए गए। हालांकि, भारतीय सेना को इसकी खबर नहीं थी। इस पोस्ट पर चीनी हमले के साथ ही उसने मान लिया था कि उनके गोरखा जवान शहीद हो गए होंगे। यहां तक कि इस टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे मेजर धन सिंह थापा के परिवार ने उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया था। मगर भारत-चीन युद्ध के बाद मेजर थापा चीन से मौत को मात देकर वापस लौटे और गोरखा रायफल्स की शान बने।

1962 के भारत-चीन युद्ध में दुश्मन से दो-दो हाथ

अपनी नियुक्ति के दिन से ही थापा ने सभी को प्रभावित किया। शौर्य के किस्से उनके साथियों के बीच खू़ब मशहूर थे। सीनियर अधिकारियों द्वारा दी गई हर जिम्‍मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया। यही कारण रहा कि हिमालय क्षेत्र में विवादित सीमाओं पर चीनी सेना की घुसपैठ बढ़ी और भारतीय सेना को इसे रोकने के लिए कहा गया, तो थापा इस अभियान का हिस्सा बने। 1962 में फ़ारवर्ड पालिसी के तहत भारतीय सेना द्वारा विवादित क्षेत्रों पर कई छोटी-छोटी पोस्ट तैयार की गई। ऐसी उम्मीद थी कि भारत के इस कदम के बाद चीनी सेना हमला नहीं करेगी। मगर चीन के दिमाग में कुछ और चल रहा था। चीनी सेना ने भौगोलिक परिस्तिथियों का लाभ उठाया और युद्ध की शुरुआत कर दी, जो इतिहास के पन्नों में काले अक्षरों में दर्ज हुआ।

इस युद्ध के दौरान धन सिंह थापा 8 गोरखा राइफ़ल्स की पहली बटालियन के 27 अन्य साथियों के साथ पैंगांग झील के उत्तरी तट पर स्थित सृजप पोस्ट पर तैनात थे। उन्हें अपने आसपास के करीब 48 वर्ग किमी के क्षेत्र को चीनी सैनिकों से सुरक्षित रखना था। वह अपनी पोस्ट पर मुस्तैद थे।

तभी 20 अक्टूबर, 1962 को चीनी सेना के करीब 600 सैनिकों ने तोपों और मोर्टारों की मदद से थापा की पोस्ट पर धावा बोल दिया. गोरखा दुश्मन के साथ पूरी ताकत से लड़े और बड़ी संख्या में चीनी सैनिकों को मार गिराया. साथ ही चीनी सैनिकों की पहली कोशिश को नाकाम कर दिया। दुश्मन गोरखा के जवाब को देखकर हैरान था। उसके समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। मसलन गुस्से में आकर वह तेजी से थापा की पोस्ट के करीब पहुंचे और और उसे आग के हवाले कर दिया।

शत्रु द्वारा बंदी

अब मेजर धनसिंह थापा के पास सिर्फ तीन सैनिक रह गए, बाकी चार हताहत हो गए। उनका यह हाल मेजर धनसिंह थापा के बंकर पर अग्नि बम गिरने से हुआ। इसके साथ ही चीनी फौज ने उस चौकी और बंकर पर क़ब्ज़ा कर लिया और मेजर धनसिंह थापा शत्रु द्वारा बन्दी बना लिए गए। उसके बाद चीन की फौजों ने तीसरा हमला टैंक के साथ किया। इस बीच नाव लेकर बच निकला नायक रविलाल फिर बटालियन में पहुँचा और उसने सिरी जाप चौकी के पराजित होने, तथा सारे सैनिकों और मेजर धनसिंह थापा के मारे जाने की खबर वहाँ अधिकारियों को दी। उसने बताया कि वहाँ सभी सैनिक और मेजर थापा बहादुरी से, अपनी आखिरी सांस तक लड़े। बटालियन नायक द्वारा दी गई इस खबर को सच मान रही थी, जब कि सच यह नहीं था। मेजर थापा अपने तीन सैनिकों के साथ बंदी बना लिए गए थे। लेकिन भाग्य को अभी भी नया कुछ दिखाना था। पकड़े गए थापा सहित तीन बन्दियों में से राइफल मैन तुलसी राम थापा, चीनी सैनिकों की पकड़ से भाग निकलने में सफल हो गया। वह चार दिनों तक अपनी सूझ-बूझ से चीनी फौजों को चकमा देता रहा और किसी तरह भाग कर छिपता हुआ अपनी बटालियन तक पहुँच पाया। तब उसने मेजर धनसिंह थापा तथा दो अन्य सैनिकों के चीन के युद्धबन्दी हो जाने की सूचना दी, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मेजर थापा लम्बे समय तक चीन के पास युद्धबन्दी के रूप में यातना झेलते रहे। चीनी प्रशासक उनसे भारतीय सेना के भेद उगलवाने की भरपूर कोशिश करते रहे। वह उन्हें हद दर्जे की यातना देकर तोड़ना चाहते थे, लेकिन यह सम्भव नहीं हुआ। मेजर धनसिंह थापा न तो यातना से डरने वाले व्यक्ति थे, न प्रलोभन से।

देश लौटकर सेना में आने के बाद मेजर थापा अंतत: लेफ्टिनेंट कर्नल के पद तक पहुँचे और पद मुक्त हुए। उसके बाद उन्होंने लखनऊ में सहारा एयर लाइंस के निदेशक का पद संभाला।


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