ओडिशा के बालासोर में तीन ट्रेनों की भीषण टक्कर में 261 लोगों की मौत हो गई और 900 से अधिक लोग घायल हो गए। घायलों का इलाज अस्पताल में चल रहा है। वहीं प्रधानमंत्री मोदी भी आज बालासोर जाकर दुर्घटनास्थल का दौरा किया और निर्देश दिये जिनकी भी गलती है उनके ऊपर सख्त कार्यवाही होगी | इन सब के बीच अब ट्रेन दुर्घटना होने की वजह भी सामने आ रही है। सिग्नलिंग कंट्रोल रूम की प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार दुर्घटना से कुछ मिनट पहले कोरोमंडल एक्सप्रेस ट्रेन ने गलत ट्रैक ले लिया था। जिसकी वजह से इतना बड़ा हादसा हो गया।
दुर्घटना से कुछ मिनट पहले गलत ट्रैक पर चली गई थी कोरोमंडल एक्सप्रेस
रेलवे के खड़गपुर डिवीजन के सिग्नलिंग कंट्रोल रूम के एक वीडियो के अनुसार, चेन्नई जाने वाली कोरोमंडल एक्सप्रेस ने शुक्रवार शाम करीब 6.55 बजे बहानगर बाजार स्टेशन को पार करने के बाद मुख्य लाइन के बजाय एक लूप लाइन ले ली, जहां मालगाड़ी खड़ी थी। जिसकी वजह से यह भीषण हादसा हो गया।
127 किलोमीटर थी कोरोमंडल एक्सप्रेस की रफ्तार
रेल मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि करीब 127 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही कोरोमंडल एक्सप्रेस ,मालगाड़ी से टकरा गई और मुख्य लाइन पर पटरी से उतर गई। टक्कर के कुछ ही मिनटों के भीतर, उपरोक्त उद्धृत अधिकारी ने कहा कि विपरीत दिशा से आ रही हावड़ा जाने वाली यशवंतनगर एक्सप्रेस से भी कोरोमंडल एक्सप्रेस टकरा गई।
बंद कर दिया गया है इस रूट पर ट्रेन संचालन
रेलवे ने इस रूट पर ट्रेनों का आवागमन बंद कर दिया है. हादसे के बाद दक्षिण पूर्व रेलवे ने पुरी एक्सप्रेस 12837, यशवंतपुर एक्सप्रेस 12863, संतरागाछी पुरी स्पेशल 02837, शालीमार-संबलपुर 20831, चेन्नई मेल 12839 को रद्द करने की घोषणा की है. इसके अलावा ट्रेन नंबर- 22807, ट्रेन नंबर- 18409, ट्रेन नंबर- 22817, ट्रेन नंबर 15929, ट्रेन नंबर- 22873, 12840 चेन्नई सेंट्रल-हावड़ा, 18048 वास्को डी गामा- शालीमार और सिकंदराबाद-शालीमार साप्ताहिक ट्रेनों के रूट डायवर्ट कर दिए गए हैं.
हालांकि, ट्रेन कैसे ट्रैक से बेपटरी हुई यह तो जांच का विषय है लेकिन आज हम आपको ऐसे ट्रेन हादसे के बारे में बताएंगे,
जिस हादसे के बाद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उस समय के तत्कालीन रेलमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने अपना इस्तीफा दे दिया था। अरियालुर रेल हादसा 23 नवंबर 1956 की सुबह 4.30 बजे की है। जब थूथुकुडी एक्सप्रेस ट्रेन, अरियालुर रेलवे स्टेशन से दो मील की दूरी पर मरुदैयारु नदी पर पुराने पुल के खंभे से होकर गुजर रही थी। उस वक्त नदी में तेज उफान था और झमाझम बारिश भी हो रही थी। नदी का पानी पुल की पटरियों को लगभग छू रहा था। तभी सुबह करीब 4.30 बजे के करीब अचानक से पुराने खंभों पर बना पुल लगातार बारिश और उफान की वजह से दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इसी दौरान ट्रेन का स्टीम इंजन और सात डिब्बे नदी में गिर गये। गौरतलब है कि थूथुकुडी एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने से ठीक आधे घंटे पहले, एक दूसरी ट्रेन पुल पार कर चुकी थी। 144 लोगों की हुई थी मौत तकरीबन 67 साल पहले हुए इस हादसे में 144 लोगों की मौत हुई थी और सैंकड़ों घायल हुए थे। यही नहीं, 200 से ज्यादा यात्री लापता हो गये थे। पानी के तेज बहाव के कारण उनके शव तक नहीं मिले। इस हादसे से उस वक्त के रेलमंत्री लाल बहादुर शास्त्री बहुत आहत हुए थे। उन्होंने इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंप दिया। आपको बता दें कि जवाहरलाल नेहरु के प्रधानमंत्री कार्यकाल में लाल बहादुर शास्त्री 13 मई 1952 से लेकर 7 दिसम्बर 1956 तक रेलमंत्री के रुप में कार्यरत रहे। संसद में शास्त्री के इस्तीफे पर नेहरू बोले 26 नवंबर 1956 को लाल बहादुर शास्त्री के इस्तीफे को लेकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रपति से इस्तीफा स्वीकार करने का निवेदन किया। इसके बाद लोकसभा में जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि वह इस्तीफा इसलिए स्वीकार नहीं कर रहे हैं कि इस हादसे में किसी भी तरह से लाल बहादुर शास्त्री जिम्मेदार है। बल्कि इसलिए कर रहे है कि यह आने वाले भविष्य में एक नजीर बने। बता दें कि थूथुकुडी एक्सप्रेस हादसे से पहले 2 सितंबर 1956 में हैदराबाद के नजदीक महबूबनगर में पुल टूटने से रेल हादसा हो गया था। जिसमें 112 लोगों की मौत हुई थी। जिसके बाद लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। तब प्रधानमंत्री नेहरु ने इसे अस्वीकार कर दिया। लेकिन, तीन महीनों बाद हुए अरियालुर रेल हादसे के बाद उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया। 9 लाख से ज्यादा की दी गई मदद राशि इस हादसे के तकरीबन एक साल बाद 6 अगस्त 1957 में तत्कालीन डिप्टी रेल मिनिस्टर शाह नवाज खान ने लोकसभा में बताया कि मद्रास के त्रिची के पास अरियालुर ट्रेन दुर्घटना के बाद तकरीबन 9.34 लाख रुपये की सहायता राशि दी जा चुकी है। जो उस दौर में एक बड़ी राशि मानी जा सकती हैं।
शास्त्री की तरह नीतीश कुमार ने भी दिया था इस्तीफा भारतीय राजनीति के इतिहास में लाल बहादुर शास्त्री के बाद नीतीश कुमार दूसरे ऐसे रेलमंत्री थे। जिन्होंने रेल हादसे के बाद नैतिकता के आधार पर गलती मानकर अपने पद से इस्तीफा दिया था। भारत के 28वें रेल मंत्री नीतीश कुमार ने (19 मार्च 1998 से 5 अगस्त 1999 तक) असम में अगस्त 1999 में गैसल ट्रेन दुर्घटना के लिए नैतिक आधार पर अपना पद छोड़ दिया था। इस हादसे में 290 लोगों की जान गई थी। उस समय अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे। वाजपेयी के ही कार्यकाल में एनडीए की रेलमंत्री ममता बनर्जी ने भी दो रेल हादसों की नैतिक जिम्मेदारी लेकर 2000 में इस्तीफा दिया था. हालांकि तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उनका इस्तीफा अस्वीकार कर दिया था.
1981 में हुआ भारत का सबसे बड़ा रेल हादसा
बिहार में 6 जून, साल 1981 के हुए हादसे को पूरी दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल हादसा कहा जाता है।ऐसा कहा जाता है कि इस हादसे में 800 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि कई लोगों के तो शव भी बरामद नहीं हो पाए थे। भारतीय रेलवे हमेशा अपने यात्रियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रखती है, लेकिन कभी-कभी ऐसे भीषण रेल हादसे हो जाते हैं, जिससे विभाग पर कई सवाल खड़े हो जाते हैं।बरसात का मौसम चल रहा था, शाम का समय था और दिन था 6 जून 1981। अपनों से मिलने की आस लिए हुए सभी यात्री खचाखच भरी हुई ट्रेन में सफर कर रहे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उनके साथ इतना भीषण हादसा हो जाएगा। 6 जून 1981 में शाम के समय 9 बोगियों वाली गाड़ी संख्या 416dn पैसेंजर ट्रेन, मानसी से सहरसा की ओर जा रही थी। ट्रेन अपने गंतव्य स्थान पर जा ही रही थी कि अचानक से मौसम का मिजाज बदल गया। तेज आंधी और बारिश होने लगी थी। बदला स्टेशन पार करने के बाद आगे बागमती नदी थी। ट्रेन को बागमती नदी पर बने पुल संख्या 51 से होकर गुजरना था, लेकिन जैसे ही ट्रेन के ड्राइवर ने पुल पर ट्रेन चढ़ाई। उसने कुछ ही मिनट के बाद इमरजेंसी ब्रेक लगा दिया। ब्रेक लगाने के तुरंत बाद ही ट्रेन की 9 बोगियां में से सात डिब्बे अलग हो कर उफनती नदी बागमती में जा गिरी थी और देखते ही देखते पूरा मंजर बदला गया। चारों और चीख पुकार मच गई। लोग बचाओ-बचाओ चिल्लाने लगे। भारी बारिश होने के कारण नदी में डूबे लोगों को तुरंत सहायता नहीं मिल सकी। घटनास्थल पर पहुंचने के लिए राहत-बचाव की टीम को घंटों की देरी हो गई। इसी वजह से सैकड़ों की संख्या में लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। राहत-बचाव की टीमें और गोताखोर किसी भी तरह से लोगों को बचाने में जुटे हुए थे। उन्हें केवल 286 ही शव बरामद हुए, कईयों का तो पता नहीं चल सका। ये रेल हादसा भारत का अब तक का सबसे बड़ा ट्रेन हादसा हुआ है, जिसे आज भी याद कर लोगों की आखें नम हो जाती हैं। उस समय तकलीन प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी और रेल मंत्री केदार पांडेय थे |