राष्ट्र और समाज को दिया सारा जीवन
हजार वर्ष की दासता के अंधकार के बीच यदि आज राष्ट्र और संस्कृति का वट वृक्ष पुनः पनप रहा है तो इसके पीछे उन असंख्य तपस्वियों का जीवन है जिन्होंने अपना कुछ न सोचा । जो सोचा वह राष्ट्र के लिये सोचा, समाज के लिये सोचा और संस्कृति रक्षा में अपने जीवन को समर्पित कर दिया । इन्हीं महा विभूतियों में एक हैं नानाजी देशमुख । स्वतंत्रता के पूर्व उन्होंने असंख्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तैयार किये और स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रसेवा के लिये सैकड़ों स्वयंसेवक तैयार किये ।
ऐसे हुतात्मा संत नानाजी की पुण्यतिथि 27 फरवरी को है । नानाजी देशमुख का जन्म 11 अक्तूबर 1916 को महाराष्ट्र के हिगोंली जिला के छोटे से कस्बे कडोली में हुआ था । उनका प्रारंभिक जीवन अति अभाव और संघर्ष से भरा था । लेकिन चुनौतियों ने उन्हे कमजोर नहीं सशक्त बनाया, संकल्पशक्ति को दृढ़ किया । उन्होंने पुस्तकें खरीदने के लिये सब्जी बेचकर पैसे जुटाये, पढ़ाई की । मंदिरों में रहे लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त की । उन्होंने पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट से उच्च शिक्षा की डिग्री ली। अपनी शिक्षा के दौरान उन्होने राष्ट्र और समाज की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा और समझा। सनातन समाज के भोलेपन का लाभ लेकर विभाजन का षड्यंत्र सब । उन्होंने साहित्य का अध्ययन किया । दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द और तिलक जी के साहित्य से बहुत प्रभावित हुये और समय के साथ संघ से परिचय हुआ । वे 1930 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े । और जीवन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही समर्पित कर दिया । संघ के संस्थापक डा हेडगेवार से उनके व्यक्तिगत और पारिवारिक संबंध थे । नानाजी ने डा हेडगेवार की कार्यशैली देखी । डा हेडगेवार ने अपना व्यक्तित्व, अपना जीवन ही नहीं अपितु अपना पूर्ण अस्तित्व ही राष्ट्र और संस्कृति की सेवा के लिये समर्पित कर दिया था ।
ठीक उसी प्रकार नानाजी ने भी उच्च शिक्षा से सम्पन्न अपना जीवन संघ की धारा पर राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में अर्पित कर दिया । उन्होंने संघ रचना का प्रारंभिक कार्य महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र से आरंभ किया । उनका कार्य त्रिस्तरीय था । परिवार से संपर्क, शिक्षण संस्थान से संपर्क और खेल मैदान में बच्चों से संपर्क करके उन्हेरचनात्मक कार्यों में जोड़ा । नानाजी का कार्य केवल संघ की संगठन रचना तक सीमित भर नहीं था। उनका प्रयास पीढ़ी में संस्कार, संयम, समाज सेवा और संगठन का भाव उत्पन्न करना था । उन्होंने ऐसे समर्पित और अनुशासित युवाओं की एक पीढ़ी तैयार की । उनके द्वारा तैयार स्वयंसेवकों ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया । पूरे विदर्भ ही नहीं अपितु संपूर्ण विदर्भ क्षेत्र के साथ महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के महाकौशल क्षेत्र में भारत छोड़ो उस आँदोलन का नेतृत्व भले किसी ने किया हो पर बड़ी संख्या । समय के साथ नाना जी को महाराष्ट्र से बाहर संगठन विस्तार के दायित्व मिले । उनका अधिकांश जीवन राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बीता । सबसे पहले उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में संघ प्रचारक का दायित्व मिला । उन्होंने गोरखपुर में संघ की पहली शाखा आरंभ की । नाना जी धर्मशाला में रहते थे, स्वयं अपने भोजन का प्रबंध करते और संघ और राष्ट्रसेवा कार्य में जुटे रहते थे । गोरखपुर के बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में संघ कार्य करने के बाद वे उत्तर प्रदेश ही प्रांत प्रचारक बने । संघ ने जब "राष्ट्र-धर्म" और "पाञ्चजन्य" समाचार पत्र निकालने का निर्णय लिया तो नानाजी इसके प्रबंध संपादक थे । अटलजी और दीनदयाल जी के साथ उनकी एक ऐसी सशक्त टोली बनी जिसने पूरे देश को एक वैचारिक दिशा दी । 1951 में जब तत्कालीन सरसंघचालक गुरु जी राजनीतिक दल गठित करने का निर्णय लिया तो इसकी रचना में महत्वपूर्ण भूमिका नाना जी की रही ।
वे नवगठित इस राजनैतिक दल "भारतीय जनसंघ" के संस्थापक महासचिव बने । उन्होंने एक ओर जहाँ जनसंघ को कार्य विस्ता, देने का कार्य किया वहीं भारतीय विचारों के समीप राजनेताओ से भी संपर्क साधा । इसमें समाजवादी पार्टी के नेता डा राम मनोहर लोहिया भी थे । यह नानाजी का प्रयास महत्वपूर्ण था कि समाजवादी पार्टी और जनसंघ की निकटता बढ़ी । यदि 1967 में देश के कुछ प्रांतों में संविद सरकारें बनी तो इसके पीछे नानाजी और डा लोहिया की निकटता ही रही है । नानाजी ने ही उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति की शुरूआत की थी जो देशभर एक उदाहरण बनी । इसी शक्ति के कारण उत्तर प्रदेश के चंद्रभानु गुप्ता जैसे बड़े नेता को पराजय का मुँह देखना पड़ा ।
1977 में जनता पार्टी की केंद्रीय सरकार बनी तो प्रधानमंत्री मोरारजी भाई ने नानाजी के सामने मंत्री पद का प्रस्ताव रखा । नानाजी यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि वे साठ वर्ष की आयु पार कर चुके हैं इस आयु के बाद व्यक्ति को समाज सेवा करना चाहिए । और अपने संकल्प के साथ नानाजी समाज सेवा में जुट गये । उन्होंने चित्रकूट में ग्रामोदय विश्व विद्यालय आरंभ किया । चित्र कूट का यह प्रकल्प नानाजी का पहला प्रकल्प नहीं था । वे जहां रहे वहां उन्होंने ऐसे प्रकल्प कार्यकर्ताओं से आरंभ कराये । इसके लिये उन्होंने सदैव पिछड़े गाँव चुने । उनके संकल्प में स्वत्व और स्वावलंबन को प्राथमिकता रही । उन्होंने इसी दिशा के प्रकल्प आरंभ किये । उन्हे अपने अभियान में दीनदयाल जी के आकस्मिक निधन से भारी क्षय अनुभव किया । वे दीनदयाल उपाध्याय की असामयिक मृत्यु के बाद काफी दिनों तक अन्यमनस्क रहे और अंततः उन्होंने 1972 में दीन दयाल शोध संस्थान की स्थापना की और पूरा जीवन इसी संस्थान को सशक्त करने में लगा दिया । नानाजी ने 1980 में राजनैतिक और सार्वजनिक जीवन से सन्यास लेकर चित्र कूट प्रकल्प में ही अपना जीवन और समय इसी संस्थान को अर्पित कर दिया । इस संस्थान में आधुनिक कृषि, स्वरोजगार और स्थानीय वस्तुओं की आत्म आत्म निर्भरता का जीवन जीने को प्रोत्साहित किया । इसी प्रकल्प के चलते उन्हे पद्म भूषण और 2019 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया ।
उन्होंने 95 वर्ष की आयु में 27 फरवरी 2010 को इसी प्रकल्प में शरीर त्यागा । 2019 में भारत सरकार ने मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया ।
लेखक -
प्रयागराज में महाकुंभ 2025 कल रात महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर अंतिम पवित्र स्नान के साथ सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। इस 45 दिवसीय आध्यात्मिक महापर्व में अब तक 66 करोड़ 30 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में पवित्र डुबकी लगाई। महाकुंभ में कई प्रमुख हस्तियां भी शामिल हुईं, जिनमें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भूटान के नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक, विदेशी प्रतिनिधि, विभिन्न राज्यों के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शामिल थे, जिन्होंने संगम में स्नान किया। हमारे संवाददाता के अनुसार, महाशिवरात्रि के अवसर पर 1 करोड़ 53 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने अंतिम पवित्र डुबकी लगाई।
महाकुंभ मेले में भारतीय वायुसेना के एयर शो और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा घाटों पर गुलाब की पंखुड़ियों की वर्षा ने श्रद्धालुओं को एक अविस्मरणीय अनुभव प्रदान किया। अधिकारियों द्वारा एकीकृत कमान और नियंत्रण केंद्र से यातायात व्यवस्था का सख्ती से पालन किया गया।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस अवसर पर श्रद्धालुओं, संतों और कल्पवासियों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं ने संगम में पवित्र डुबकी लगाकर पूरी दुनिया को राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रवाद के प्रति समर्पण का संदेश दिया है।
भस्मना शुद्धयते कांस्यं ताम्रमम्लेन शुद्धयति |
राजसा शुद्धयते नारी नदी वेगेन शुद्धयति | |
यहां आचार्य शुद्धि की चर्चा करते हुए कहते हैं कि कांसा भस्म से शुद्ध होता है, तांबा अम्ल से, नारी रजस्वला होने से तथा नदी अपने वेग से शुद्ध होती है |
भाव यह है कि राख से साफ किये जाने पर कांसा चमक उठता है तांबा तेज़ाब से साफ हो जाता है | हर माह होनेवाले मासिक धर्म से स्त्रियाँ अपने आप शुद्ध हो जाती हैं और बहते रहने से नदी शुद्ध हो जाती है |
कहा जा सकता है कि जो नदियाँ धीरे-धीरे बहती हैं उनका पानी गंदला और सदैव अशुद्ध रहता है जबकि वेग से बहनेवाली नदी का जल शुद्ध स्वच्छ रहता है | इसी प्रकार स्त्री की शुद्धि उसके रजस्वला होने के बाद ही होती है | उसके बाद ही गर्भधारण के योग्य हो पाती है | रजोधर्म हीन स्त्री बन्ध्या होती हैं |
टिमटिमाते तारों के नीचे महाकुम्भ नगरी प्रयागराज में संगम किनारे आसमान से देखिए तो तारों का शहर बहुत खूबसूरत लगता है। लगता है जैसे किसी ने सारे तारे लाकर त्रिवेणी के किनारे टांक दिए हों। आज यानी 26 फरवरी को ब्रह्म मुहूर्त के साथ शिवरात्रि का स्नान शुरू हो चुका है। संगम की धरती पर भले ही दिन पूरी तरह न चढ़ा हो, लेकिन एक नये कीर्तिमान का उदय हो चुका है। महाकुम्भ का यह अंतिम स्नान है। स्नान की शुरूआत के साथ ही महाकुम्भ में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं की संख्या 65 करोड़ के विशाल आंकड़े को पार कर गयी है। जो अपने आप में नया और ऐतिहासिक कीर्तिमान है। संगम में डुबकी लगाने वालों की यह संख्या दुनिया के 200 से अधिक देशों की जनसंख्या से ज्यादा है। सिर्फ भारत और चीन की आबादी महाकुम्भ आए श्रद्धालुओं से ज्यादा है। बता दें, उत्तर प्रदेश सरकार को महाकुम्भ में 45 करोड़ श्रद्धालु आने का अनुमान था।
अब तक 65 करोड़ से ज्यादा कर चुके स्नान : आज मेले का अंतिम और 45वां दिन है। मंगलवार को 1.33 करोड़ ने आस्था की डुबकी लगायी थी। आज प्रात: 4 बजे तक 25.64 करोड़ श्रद्धालु स्नान कर चुके है। मेला प्रशासन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 13 जनवरी से अब तक 65.41 करोड़ श्रद्धालु संगम में स्नान कर चुके हैं। आज मेले का अंतिम दिन है। आज शिवरात्रि पर 3 करोड़ श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। यानी, कुल आंकड़ा 68 से 69 करोड़ तक पहुंच जाएगा।
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश महाकुम्भ नगर : चीन व भारत को छोड़ उतने लोग आए, जितनी दुनिया के बड़े देशों की जनसंख्या नहीं है। अमेरिका, रूस, इंडोनेशिया, ब्राजील, पाकिस्तान की आबादी से ज्यादा लोग महाकुम्भ नगर में आ चुके हैं। यूएस सेंसस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया के 200 से अधिक राष्ट्रों में जनसंख्या के दृष्टिकोण से टॉप 10 देशों में क्रमश: भारत (1,41,93,16,933), चीन (1,40,71,81,209), अमेरिका (34,20,34,432), इंडोनेशिया (28,35,87,097), पाकिस्तान (25,70,47,044), नाइजीरिया (24,27,94,751), ब्राजील (22,13,59,387), बांग्लादेश (17,01,83,916), रूस (14,01,34,279) और मैक्सिको (13,17,41,347) शामिल हैं।
मुख्य स्नान पर्वों बढ़ी भीड़ : महाकुम्भ की शुरूआत 13 जनवरी को पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ हुई। इस दिन 1.70 करोड़ ने संगम में पुण्य की डुबकी लगायी थी। इस स्नान के अगले ही दिन 14 जनवरी को मकर संक्रांति को प्रथम अमृत स्नान था। इस दिन 3.50 करोड़ श्रद्धालु डुबकी लगाकर पुण्य की भागी बनें। 29 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन दूसरा अमृत और महाकुम्भ का तीसरा स्नान था। इस दिन दुखद हादसा भी पेश आया था, जिसमें 30 श्रद्धालु जान गंवा बैठे थे। दूसरे अमृत स्नान के दिन 7.64 करोड़ श्रद्धालुओं ने स्नान किया। 03 फरवरी बसंत पंचमी को तीसरा और अंतिम अमृत स्नान था। इस दिन 2.57 करोड़ श्रद्धालु डुबकी लगाने प्रयागराज पहुंचे। 12 फरवरी माघ पूर्णिमा के दिन महाकुम्भ का पांचवां स्नान सम्पन्न हुआ। इस दिन 2.04 करोड़ श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगायी। इसी दिन स्नान दान के साथ एक महीने से चले आ रहे कल्पवास का भी समापन हुआ।
वसंत पंचमी के बाद भीड़ कम नहीं हुई : प्राय: यह माना जाता कि वसंत पंचमी के स्नान के बाद मेले में भीड़ कम हो जाती है। क्योंकि वसंत पंचमी को अमृत स्नान के बाद अखाड़े अपने अपने गंतव्य की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। 3 फरवरी को वसंत पंचमी के स्नान के दो दिन बाद तक भीड़ थोड़ी कम रही। लेकिन 6 फरवरी से श्रद्धालुओं का जो रेला प्रयागराज पहुंचना शुरू हुआ, वो अब तक लगातार जारी है। 12 फरवरी को माघ पूर्णिमा के स्नान में 2.04 करोड़ शामिल हुए थे। 13 फरवरी को 85.46 लाख, 14 फरवरी को 96.98 लाख, 15 फरवरी को 1.36 करोड़, 16 फरवरी को 1.49 करोड़, 17 फरवरी को 1.35 करोड़, 18 फरवरी को 1.26 करोड़, 19 फरवरी को 1.08 करोड़, 20 फरवरी को 1.28 करोड़, 21 फरवरी को 1.28 करोड़, 22 फरवरी को 1.43 करोड़, 23 फरवरी को 1.32 करोड़, 24 फरवरी को 1.30 करोड़ और 25 फरवरी को 1.33 करोड़ श्रद्धालुओं ने पवित्र संगम में डुबकी लगायी।
हर दिन डेढ करोड़ श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी : इस बीच, महाकुम्भ में श्रद्धालुओं की भीड़ ने एक नया रिकॉर्ड कायम किया है। पिछले सात दिनों में महाकुम्भ में रोजाना एक करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु त्रिवेणी की धारा में आस्था की डुबकी लगा रहे हैं। 13 जनवरी से शुरू हुए महाकुंभ में 65 करोड़ से ज्यादा श्रद्धालु शामिल हो चुके हैं। अगर औसत की बात की जाए तो अब तक हर रोज डेढ करोड़ श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। श्रद्धालुओं की यह संख्या अपने आप में एक महारिकॉर्ड है।
विशेष स्नान पर्वों पर श्रद्धालुओं की संख्या : 13 जनवरी (पौष पूर्णिमा, महाकुम्भ की शुरूआत) को 1.70 करोड़
14 जनवरी (मकर संक्रांति, प्रथम अमृत स्नान) को 3.50 करोड़
29 जनवरी (मौनी अमावस्या, दूसरा अमृत स्नान) को 7.64 करोड़
03 फरवरी (वसंत पंचमी, तीसरा और अंतिम अमृत स्नान) को 2.57 करोड़
12 फरवरी (माघी पूर्णिमा स्नान) को 2.04 करोड़
महाशिवरात्रि (26 फरवरी) पर विशेष
भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करने का विशेष अवसर है महाशिवरात्रि, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं और महाशिवरात्रि का व्रत रखने से पापों का नाश होता है, मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। प्रतिवर्ष फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 26 फरवरी को मनाया जा रहा है। महाशिवरात्रि को भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन माना गया है, जो सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी है। भारत में धार्मिक मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि का बहुत महत्व है। यह आध्यात्मिक चरम पर पहुंचने का सुअवसर है। महाशिवरात्रि को शिव तत्व को आत्मसात करने, नकारात्मक ऊर्जाओं को समाप्त करने और आध्यात्मिक उत्थान प्राप्त करने का सबसे उत्तम अवसर माना जाता है।
महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है। इस दिन शिवलिंग का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक, बेलपत्र, धतूरा, भांग एवं शहद अर्पित करने से विशेष फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस दिन जलाभिषेक के साथ भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने और व्रत रखने से वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं और उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। दाम्पत्य जीवन में प्रेम और सुख-शांति बनाए रखने के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है। इस रात्रि को जागरण करने वाले भक्तों को अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शिवपुराण के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने और रात्रि जागरण करने से समस्त पापों का नाश होता है और भक्तों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व है, जिसमें हर प्रहर में शिवलिंग का अलग-अलग द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है, पहले प्रहर में जल, दूसरे प्रहर में दही, तीसरे प्रहर में घी और चौथे प्रहर में शहद से अभिषेक करने का विधान है।
धर्मग्रंथों में भगवान शिव को ‘कालों का काल’ और ‘देवों का देव’ अर्थात् ‘महादेव’ कहा गया है। एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। देवाधिदेव भगवान शिव के समस्त भारत में जितने मंदिर अथवा तीर्थस्थान हैं, उतने अन्य किसी देवी-देवता के नहीं। आज भी समूचे देश में उनकी पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है। सर्वत्र पूजनीय शिव को समस्त देवों में अग्रणी और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वे अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। वे भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता के प्रतीक हैं। भारत में शायद ही ऐसा कोई गांव मिले, जहां भगवान शिव का कोई मंदिर अथवा शिवलिंग स्थापित न हो। यदि कहीं शिव मंदिर न भी हो तो वहां किसी वृक्ष के नीचे अथवा किसी चबूतरे पर शिवलिंग तो अवश्य स्थापित मिल जाएगा।
हालांकि बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जिस प्रकार विभिन्न महापुरुषों के जन्मदिन को उनकी जयंती के रूप में मनाया जाता है, उसी प्रकार भगवान शिव के जन्मदिन को उनकी जयंती के बजाय रात्रि के रूप में क्यों मनाया जाता है? इस संबंध में मान्यता है कि रात्रि को पापाचार, अज्ञानता और तमोगुण का प्रतीक माना गया है और कालिमा रूपी इन बुराइयों का नाश करने के लिए हर माह चराचर जगत में एक दिव्य ज्योति का अवतरण होता है, यही रात्रि शिवरात्रि है। शिव और रात्रि का शाब्दिक अर्थ एक धार्मिक पुस्तक में स्पष्ट करते हुए कहा गया है, ‘‘जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करुणासागर भगवान शिव हैं। जो नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं। महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से ‘सगुण ईश्वर’ और ‘निर्गुण ब्रह्म’ कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं।’’
शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है, जिसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे। इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया। विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने गए। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है और इसी कारण भगवान शिव ‘चन्द्रशेखर’ भी कहलाए।
धार्मिक ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।
लेखक - योगेश कुमार गोयल
"स्व के लिए सर्वस्व अर्पित: स्वातंत्र्य वीर सावरकर "।
"हिंदुत्व के तेज, तप, त्याग और तितिक्षा की प्रतिमूर्ति वीर सावरकर "
