स्वतंत्र भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति रहे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारत की स्वतंत्रता के बाद देश को आधुनिक शिक्षा की दिशा में आगे ले जाने में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बतौर शिक्षक के रूप में की थी। एक अध्यापक होने के साथ ही राधाकृष्णन प्रसिद्ध दार्शनिक, विचारक और राजनेता भी थे, इसलिए उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य पर हर वर्ष 05 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
वर्ष 1909 में राधाकृष्णन ने ‘मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज’ में दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद वह ‘मैसूर विश्वविद्यालय’ में भी दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे। यह ब्रिटिश शासन में एक बड़ी उपलब्धि थी जब एक भारतीय को यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर नियुक्त किया गया था। बता दें कि उन्होंने लगभग 40 वर्षों तक अध्यापन का कार्य किया।
इसके बाद वर्ष 1926 में राधाकृष्णन ने भारत की ओर से अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय में इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ फिलॉसफी में CU का प्रतिनिधित्व किया था। उनके ज्ञान और प्रतिभा के कारण उन्हें बाद में इंग्लैंड की विश्वविख्यात ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पूर्वी धर्म और नैतिकता के ‘स्पैल्डिंग प्रोफेसर’ के रूप में भी नियुक्त किया गया था।
वर्ष 1931 से 1936 तक राधाकृष्णन आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति रहे जिसके कुछ वर्षों बाद ही उन्हें 1939 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय का कुलपति बनाया गया जहाँ वह वर्ष 1948 तक कार्यरत रहे। वहीं राधाकृष्णन को ब्रिटिश शासनकाल में ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित भी किया गया था। शिक्षा के क्षेत्र में उनके अतुल्नीय कार्यों और उपलब्धियों के कारण ही हर वर्ष उनके जन्मदिवस के अवसर पर ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जाता है।
राधाकृष्णन एक शिक्षक होने के साथ साथ एक कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। वह वर्ष 1949 से 1952 तक सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक के राजदूत रहे और वर्ष 1952 में भारत के उपराष्ट्रपति पद पर आसीन हुए। इसके कुछ समय बाद ही उन्हें वर्ष 1962 में भारत के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में चुना गया। इसी बीच वर्ष 1954 में भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें ‘भारत रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया।
इसके अलावा डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को अपने जीवन में कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिसमें जर्मनी का पुस्तक प्रकाशन द्वारा ‘विश्व शांति पुरस्कार’ सबसे खास माना जाता हैं। राधाकृष्णन जी का 17 अप्रैल सन 1975 को 86 वर्ष की उम्र में चेन्नई में लंबी बीमारी के बाद इनका देहांत हो गया। लेकिन एक आदर्श शिक्षक और दार्शनिक के रूप में वह आज भी हम सभी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत माने जाते हैं।
हिन्दूवादिता का गहरा अध्ययन
शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक इन्सान पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है। क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों में गहरे तक स्थापित किया जाता था। यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गए। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे। उनकी आलोचना को डॉक्टर राधाकृष्णन ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दूवादिता का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन यह जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है। तब स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे। इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं। इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा संदेश देती है।
भारतीय संस्कृति
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह जान लिया था कि जीवन छोटा है और इसमें व्याप्त खुशियाँ अनिश्चित हैं। इस कारण व्यक्ति को सुख-दुख में समभाव से रहना चाहिए। वस्तुतः मृत्यु एक अटल सच्चाई है, जो कि अमीर-ग़रीब सभी को अपना ग्रास बनाती है तथा किसी भी प्रकार का वर्ग-विभेद नहीं करती है। सच्चा ज्ञान वही है जो आपके अन्दर के अज्ञान को समाप्त कर सकता है। सादगीपूर्ण संतोषवृत्ति का जीवन अमीरों के अहंकारी जीवन से बेहतर है, जिनमें असंतोष का निवास है। एक शांत मस्तिष्क बेहतर है, तालियों की उन गड़गड़ाहटों से जो संसदों एवं दरबारों में सुनाई देती हैं। इस कारण डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को समझ पाने में सफल रहे, क्योंकि वह मिशनरियों द्वारा की गई आलोचनाओं के सत्य को स्वयं परखना चाहते थे। इसीलिए कहा गया है कि आलोचनाएँ परिशुद्धि का कार्य करती हैं। सभी माताएँ अपने बच्चों में उच्च संस्कार देखना चाहती हैं। इस कारण वे बच्चों को ईश्वर पर विश्वास रखने, पाप से दूर रहने एवं मुसीबत में फंसे लोगों की मदद करने का पाठ पढ़ाती हैं। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह भी जाना कि भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का आदर करना सिखाया गया है और सभी धर्मों के लिए समता का भाव भी हिन्दू संस्कृति की विशिष्ट पहचान है। इस प्रकार उन्होंने भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान को समझा और उसके काफ़ी नज़दीक हो गए।
जीवन दर्शन
डॉक्टर राधाकृष्णन समूचे विश्व को एक विद्यालय मानते थे। उनका मानना था कि शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए। ब्रिटेन के एडिनबरा विश्वविद्यालय में दिये अपने भाषण में डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि 'मानव को एक होना चाहिए। मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाति की मुक्ति है। जब देशों की नीतियों का आधार पूरे विश्व में शांति की स्थापना का प्रयत्न हो।' डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से पूर्ण व्याख्याओं, आनंददायक अभिव्यक्ति और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे।
रवीन्द्रनाथ टैगोर से भेंट
दर्शन शास्त्र के मर्मज्ञ के तौर पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पहचान क़ायम हो चुकी थी। जुलाई, 1918 में मैसूर प्रवास के समय उनकी भेंट रवीन्द्रनाथ टैगोर से हुई। इस मुलाकात के बाद वह टैगोर से काफ़ी अभिभूत हुए। उनके विचारों की अभिव्यक्ति हेतु डॉक्टर राधाकृष्णन ने 1918 में 'रवीन्द्रनाथ टैगोर का दर्शन' शीर्षक से एक पुस्तक लिखी जो 'मैकमिलन प्रकाशन' द्वारा प्रकाशित हुई। इसके बाद उन्होंने दूसरी पुस्तक 'द रीन आफ रिलीजन इन कंटेंपॅररी फिलॉस्फी' लिखी। इस पुस्तक ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दी। इस पुस्तक को भारत के शिक्षार्थियों ने 'आत्मतत्त्व ज्ञान' की पुस्तक के रूप में स्वीकार किया। यही नहीं, इसे इंग्लैण्ड तथा अमेरिका के विश्वविद्यालयों में भी बेहद पसन्द किया गया। एक बार मैसूर में इनके शिक्षार्थियों ने इनसे पूछा था-क्या आप उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना पसन्द करेंगे? तब इनका प्रेरक जवाब था - नहीं, लेकिन वहाँ शिक्षा प्रदान करने के लिए अवश्य ही जाना चाहूँगा।
मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध
विद्यार्थियों के साथ राधाकृष्णन के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण रहते थे। जब वह अपने आवास पर शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करते थे, तो घर पर आने वाले विद्यार्थियों का स्वागत हाथ मिलाकर करते थे। वह उन्हें पढ़ाई के दौरान स्वयं ही चाय देते थे और साथी की भाँति उन्हें घर के द्वार तक छोड़ने भी जाते थे। राधाकृष्णन में प्रोफेसर होने का रंचमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका मानना था कि जब गुरु और शिष्य के मध्य संकोच की दूरी न हो तो अध्यापन का कार्य अधिक श्रेष्ठतापूर्वक किया जा सकता है। डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के ऐसे मैत्री सम्बन्धों के कारण एक मिसाल भी क़ायम हुई, जो कि बहुत ही अनोखी थी। दरअसल जब उनको कलकत्ता में स्थानान्तरित होना था, तब विदाई का कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। इसके लिए उन्होंने मना कर दिया। इनके विद्यार्थियों ने बग्घी के द्वारा इन्हें स्टेशन तक पहुँचाया था। इस बग्घी में घोड़े नहीं जुते थे, बल्कि विद्यार्थियों के द्वारा ही उस बग्घी को खींचकर रेलवे स्टेशन तक ले जाया गया। उनकी विदाई के समय मैसूर स्टेशन का प्लेटफार्म 'सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जय हो' के नारों से गूँज उठा था। वहाँ पर मौजूद लोगों की आँखों में अश्रु थे। राधाकृष्णन भी उस अदभुत प्रेम के वशीभूत होकर अपने आँसू रोक नहीं पाए थे। गुरु एवं विद्यार्थियों का ऐसा सम्बन्ध वर्तमान युग में कम ही देखने को प्राप्त होता है।
आलोचनाओं का सामना
इसके बाद डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कोलकाता में 1921 से 1931 तक समय व्यतीत किया। इन्हें कोलकाता के 'किंग जॉर्ज पंचम विश्वविद्यालय' में मानसिक एवं नैतिक दर्शन शास्त्र का प्रोफेसर नियुक्त किया गया। इस दौरान उन्होंने भारत की शैक्षिक सेवा में अभिवृद्धि करने का भी कार्य किया। यहाँ पर वह गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के सम्पर्क में भी रहे। टैगोर के विचारों का काफ़ी प्रभाव राधाकृष्णन पर पड़ा। कलकत्ता विश्वविद्यालय के सभी संगठनों और विभागों को उन्नत करने के लिए इन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। यूरोप के विद्वान भी इनके दर्शन शास्त्रीय विचारों से काफ़ी प्रभावित हुए। इनके विचारों में विषय की स्पष्टता होती थी। यह सम्बोधन में क्लिष्टता का समावेश नहीं करते थे। इनकी भाषा में विद्यार्जित विद्वत्ता का ऐसा चमत्कार होता था कि श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनता रह जाता था। लेकिन वर्तमान युग में आलोचना तो संसार के रचयिता की भी होती है। इस कारण डॉक्टर राधाकृष्णन को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। इनके आलोचकों का कहना था कि राधाकृष्णन ने दर्शन शास्त्र को नया कुछ भी नहीं दिया है, भारत के आध्यात्मिक दर्शन की प्राचीनता को ही उजागर किया है। पश्चिम के सम्मुख उन्होंने भारतीय आध्यात्म को मात्र अंग्रेज़ी भाषा में उदधृत करने का ही कार्य किया है, लेकिन राधाकृष्णन ने अपने आलोचकों को कभी भी स्पष्टीकरण देने की आवश्यकता महसूस नहीं की। इसके बाद इनका एक लेख 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' के 14वें संस्करण में प्रकाशित हुआ जो एक बड़ी उपलब्धि थी।
राजनीतिक जीवन
यह सर्वपल्ली राधाकृष्णन की ही प्रतिभा थी कि स्वतंत्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वह 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इस समय यह विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किए गए। अखिल भारतीय कांग्रेसजन यह चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जाएं। जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि राधाकृष्णन के संभाषण एवं वक्तृत्व प्रतिभा का उपयोग 14 - 15 अगस्त, 1947 की रात्रि को किया जाए, जब संविधान सभा का ऐतिहासिक सत्र आयोजित हो। राधाकृष्णन को यह निर्देश दिया गया कि वह अपना सम्बोधन रात्रि के ठीक 12 बजे समाप्त करें। उसके पश्चात् संवैधानिक संसद द्वारा शपथ ली जानी थी।
राजनयिक कार्य
सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने ऐसा किया और ठीक रात्रि 12 बजे अपने सम्बोधन को विराम दिया। पंडित नेहरू और राधाकृष्णन के अलावा किसी अन्य को इसकी जानकारी नहीं थी। आज़ादी के बाद उनसे आग्रह किया गया कि वह मातृभूमि की सेवा के लिए विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें। इस प्रकार विजयलक्ष्मी पंडित का इन्हें नया उत्तराधिकारी चुना गया। पंडित नेहरू के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शन शास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह संदेह था कि डॉक्टर राधाकृष्णन की योग्यताएँ सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं। लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वह बेहतरीन थे। वह एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे। जो मंत्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वह उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे, क्योंकि उसके बाद उनके शयन का समय हो जाता था। जब राधाकृष्णन एक शिक्षक थे, तब वह नियमों के दायरों में नहीं बंधे थे। कक्षा में यह 20 मिनट देरी से आते थे और दस मिनट पूर्व ही चले जाते थे। इनका कहना था कि कक्षा में इन्हें जो व्याख्यान देना होता था, वह 20 मिनट के पर्याप्त समय में सम्पन्न हो जाता था। इसके उपरान्त भी यह विद्यार्थियों के प्रिय एवं आदरणीय शिक्षक बने रहे।
सोवियत संघ से विदा
डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन को स्टालिन से भेंट करने का दुर्लभ अवसर दो बार प्राप्त हुआ। 14 जनवरी, 1945 के दिन वह पहला अवसर आया, जब स्टालिन के निमंत्रण पर वह उनसे मिले। स्टालिन के हृदय में 'फिलास्फर राजदूत' के प्रति गहरा सम्मान था। इनकी दूसरी मुलाकात 5 अप्रैल, 1952 को हुई। जब भारतीय राजदूत सोवियत संघ से विदा होने वाले थे। विदा होते समय राधाकृष्णन ने स्टालिन के सिर और पीठ पर हाथ रखा। तब स्टालिन ने कहा था – तुम पहले व्यक्ति हो, जिसने मेरे साथ एक इंसान के रूप में व्यवहार किया हैं और मुझे अमानव अथवा दैत्य नहीं समझा है। तुम्हारे जाने से मैं दु:ख का अनुभव कर रहा हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम दीर्घायु हो। मैं ज़्यादा नहीं जीना चाहता हूँ। इस समय स्टालिन की आँखों में नमी थी। फिर छह माह बाद ही स्टालिन की मृत्यु हो गई।
उपराष्ट्रपति
1952 में सोवियत संघ से आने के बाद डॉक्टर राधाकृष्णन उपराष्ट्रपति निर्वाचित किए गए। संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था। नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया। उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया। उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला। सन् 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाए गए। बाद में पंडित नेहरू का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया। संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिए काफ़ी सराहा। इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं। सितंबर, 1952 में इन्होंने यूरोप और मिडिल ईस्ट देशों की यात्रा की ताकि नए राष्ट्र हेतु मित्र राष्ट्रों का सहयोग मिल सके।
अयोध्या में रामनवमी के अवसर पर रामलला के सूर्यतिलक का अद्भुत नजारा देखने को मिला. अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के बाद यह रामलला की पहली रामनवमी है. ऐसे में विशेष पूजा अर्चना का आयोजन किया गया. साथ ही रामलला के दिव्य सूर्यतिलक का नजारा भी बेहद मनमोहक था. रामनवमी के खास मौके पर मंदिर का विशेष श्रृंगार किया गया है. बता दें कि रामनवमी के दिन वैज्ञानिक दर्पण के जरिए सूर्य की किरणों को भगवान रामलला के मस्तिष्क तक पहुंचाया गया. इस दौरान 5 मिनट तक रामलला के ललाट पर सूर्य की किरण दिखाई दी.
4 लेंस और 4 शीशों की मदद से हुआ रामलला का सूर्यतिलक
दरअसल, रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप चौहान ने साइंस एडिटर पल्लव बागला से बात करते हुए बताया कि रामलला के विशेष सूर्यतिलक के लिए ऑप्टिकल मैकेनिकल सिस्टम को डिजाइन किया गया है. इसके जरिए राम मंदिर की तीसरी मंजिल पर 4 लेंस और 4 शीशों को लगाया गया है, जिनकी मदद से रामलला के मस्तिष्क तक सूर्य की किरणों को पहुंचाया गया है. सेंट्रल बिल्डिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. प्रदीम चौहान ने बताया कि इसके लिए एस्ट्रोनॉमिकल कैलकुलेशन का इस्तेमाल किया गया है.
प्रत्येक रामनवमी पर इस तकनीक से होगा रामलला का सूर्यतिलक
वैज्ञानिक डॉ. प्रदीप चौहान ने बताया कि प्रत्येक रामनवमी के मौके पर इसी तकनीक की मदद से रामलला का सूर्यतिलक होगा और यह कम से कम 2 से 3 मिनट तक देखा जा सकेगा. उन्होंने यह भी बताया कि हिंदी तिथियों के लिए अंग्रेजी कैलेंडर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है और इस वजह से हिंदी कैलेंडर के मुताबिक 19 वर्षों के चक्र को ध्यान में रखते हुए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल फिजिक्स और सीबीआरआई ने इस सूर्यतिलक को डिजाइन किया है. प्रत्येक रामनवमी पर इस तकनीक से होगा रामलला का सूर्यतिलक
विदेशी व्यापार के क्षेत्र में भारत के लिए एक बहुत अच्छी खबर आई है। वित्तीय वर्ष 2023-24 के दौरान भारत के व्यापार घाटे में 36 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई है। यह विशेष रूप से भारत में आयात की जाने वाली वस्तुओं एवं सेवाओं में की गई कमी के चलते सम्भव हो सका है। केंद्र सरकार लगातार पिछले 10 वर्षों से यह प्रयास करती रही है कि भारत न केवल विनिर्माण के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने बल्कि विदेशों से आयात की जाने वाली वस्तुओं का उत्पादन भी भारत में ही प्रारम्भ हो। अब यह सब होता दिखाई दे रहा है क्योंकि भारत के आयात तेजी से कम हो रहे हैं एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, रूस-यूक्रेन युद्ध, इजराईल-हम्मास युद्ध, लाल सागर व्यवधान, पनामा रूट पर दिक्कत के साथ ही वैश्विक स्तर पर मंदी के बावजूद एवं विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं के हिचकोले खाने के बावजूद भारत से वस्तुओं एवं सेवाओं के निर्यात में मामूली बढ़ौतरी दर्ज हुई है। जिसका स्पष्ट प्रभाव भारत के व्यापार घाटे में आई 36 प्रतिशत की कमी के रूप में दृष्टिगोचर हो रहा है। भारत का कुल व्यापार घाटा वित्तीय वर्ष 2022-23 के 12,162 करोड़ अमेरिकी डॉलर की तुलना में कम होकर वित्तीय वर्ष 2023-24 में 7,812 करोड़ अमेरिकी डॉलर हो गया है।
बंजारी माता,भूलन माता और मरही माता , क्या है? इतिहास और महत्व।
यह कितना दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि सनातन के ध्वजवाहक, रेशम महापथ के उत्कृष्ट व्यापारी, देश के स्वतंत्रता संग्राम में पूर्णाहुति देने वाले सनातनी विमुक्त, घुमंतू और अर्द्ध घूमंतू जनजातीय परिवार सदियों से रह रहे अपने ही भारत देश में पराए हो गए, न ठीक से नागरिकता मिली, न आधार कार्ड,न मतदान का अधिकार, न आवास और न ही सुविधाएं? और मुस्लिम और ईसाई घुसपैठिए देश के अल्पसंख्यक सुविधा भोगी नागरिक बन गए और तो और भगोड़े रोहिंग्या मुसलमान भी देश के नागरिक बन गए।स्वाधीनता के बाद भी इनकी सुध न ली गई परंतु सन् 2014 के बाद से भारत सरकार ने विधिवत् इनकी सुध ली और आगे इनके उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए भगीरथ प्रयास प्रारंभ हुए और प्रगति पर हैं। देश की इनकी जनसंख्या 2011 में 15 करोड़ थी अब तो 20 करोड़ हो गई होगी।
अंग्रेजों ने 53 देशों में शासन किया परंतु केवल भारत की घुमंतू जातियों के लिए "क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट 1871" पारित करके इन्हें आपराधिक जनजाति बना दिया क्योंकि इन घूमंतू जनजातियों ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम छेड़ दिया था। गौरतलब है कि पिंडारी और ठगों ने बरतानिया सरकार के विरुद्ध लंबा संघर्ष किया है इसलिए अंग्रेजों ने इनका सर्वनाश करने के लिए षड्यंत्र रचने कर जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया। विडंबना तो देखिए कि बरतानिया सरकार के सुर में सुर मिलाकर वामपंथी और तथाकथित सेक्यूलर इतिहासकारों ने भी इनको अपराधी मानकर इतिहास लिख डाला। अब सही इतिहास लिखने का समय आ गया है। घूमंतू जातियों का बहुत ही गौरवशाली इतिहास है, जो समय-समय पर प्रेषित होगा परंतु आज तो चैत्र नवरात्र की अष्टमी है और इसलिए महाकौशल प्रांत में ये घुमंतू परिवार, देवी भवानी की उपासना किस रुप करते हैं, इस विषय पर पहली बार शोध आलेख पत्रिका समाचार पत्र के यशस्वी पत्रकार श्रीयुत लाली कोष्टा जी के भगीरथ प्रयास और विचार से तैयार कर प्रेषित कर रहे हैं। मेरा क्या है वही गिलहरी जितना योगदान है। पत्रिका के संपादक श्रीयुत राजेंद्र गहरवार के साथ समस्त पत्रिका समाचार पत्र का आभार।
"भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी,हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप निहारी ।। "
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद 9 अप्रैल को पहली बार रामनवमी का आयोजन हो रहा है। इस रामनवमी को पांच सौ वर्षों बाद श्रीराम लला अपने घर में जन्मदिन मनाएंगे। भव्य राम मंदिर में रामनवमी का ये स्वर्णिम और ऐतिहासिक अवसर सनातनधर्मियों को कड़े संघर्ष से हासिल हुआ है, जिसका पांच सदियों से अधिक का इतिहास है। इसमें 70 से अधिक बार का संघर्ष, जिसमें से अधिकतर मुगल आक्रांताओं द्वारा भारतवासियों और हमारे मंदिरों पर हमले का रक्तरंजित इतिहास शामिल है। लेकिन सबसे ज्यादा पीड़ादायक पिछले 75 वर्ष रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने तुष्टिकरण की राजनीति को सिर माथे से लगाया और हिंदू आस्थाओं और भावनाओं को कुचलने में कोई कसर बाकी नही रखी। नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह की सरकार तक ने राम मंदिर की राह में रोड़े अटकाने का काम किया।
भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार संसद में कहा था कि राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय स्वाभिमान का मुद्दा है। उनका वह वक्तव्य सही मायने में एक संदेश था जिसमें राजनीति नहीं थी। सही बात तो ये है कि राम मंदिर का विरोध करने वालों ने ही इसे वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा बना दिया। कांग्रेस और अन्य कुछ दल मुस्लिम मतों के कारण इस मुद्दे पर हिंदुओं के न्यायोचित दावों की अनदेखी करते रहे। प्रतिक्रिया स्वरूप इस मामले ने दूसरा मोड़ ले लिया। लेकिन दुर्भाग्य है कि देश की बहुसंख्यक आबादी के आराध्य श्रीराम की जन्मभूमि को अवैध कब्जे से मुक्त करवाने का कार्य न्यायालय के निर्णय से संभव हो सका। और वह प्रक्रिया भी वर्षों नहीं दशकों तक चली। सबसे बड़ी बात ये हुई कि बाबरी ढांचे की तरफदारी मुस्लिम धर्मगुरुओं के साथ ही साथ धर्मनिरपेक्षता के झंडाबरदार बने हिन्दू नेतागण भी करते रहे।
सोमनाथ मंदिर को अंतिम बार औरंगजेब ने यह कहकर तोड़वाया था कि, ‘इस बार इसे पूरी तरह नेस्तानाबूद कर दो कि मंदिर का कहीं कोई निशान तक दिखाई न दे।’ सोमनाथ पर मस्जिद और कब्रिस्तान को सरदार पटेल ने इतिहास की विकृति का चिह्न और राष्ट्रीय अपमान बताकर कहा था कि, ‘‘राष्ट्र के गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण आवश्यक है।’’ गांधी जी भी इससे सहमत थे। हिन्दू बहुल देश में प्रभु श्रीराम की जन्मस्थली को मुक्त करवाने में जिस तरह के अवरोध उत्पन्न किए गए वे अकल्पनीय हैं। यदि सोमनाथ के साथ ही राम जन्मभूमि का मसला भी तत्कालीन नेहरू सरकार सुलझा लेती तब शायद इसे लेकर राजनीति करने का किसी को अवसर नहीं मिलता।
वर्तमान में देश में राम नाम की प्रचंड लहर के चलते अब कांग्रेस नेता, समर्थक और मीडिया का एक वर्ग यह साबित करने में जुटा है कि राम मंदिर में कांग्रेस का भी योगदान है। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि, कांग्रेस ने राम के नाम पर घिनौनी राजनीति का प्रदर्शन किया है। एक ऐसी राजनीति जिसने राम मंदिर मुद्दे को उलझाने का काम किया। राम मंदिर केस में कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया था कि अयोध्या मामले की जांच को कोर्ट 2019 के आम चुनाव तक टाल दे। 2008 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस मामले में हलफनामा दाखिल कर सेतु समुद्रम परियोजना के लिए राम सेतु को तोड़ कर तय वर्तमान मार्ग से ही लागू किये जाने पर जोर देते हुए कहा था कि भगवान राम के अस्तित्व में होने के बारे में कोई पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। ये भी कहा था कि रामायण महज कल्पित कथा है।
हिंदू विरोध की भावना कांग्रेस के डीएनए में है। आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने पहली लोकसभा में 1955-56 में हिंदू कोड बिल्स पास किए। इस बिल को लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच राजनीतिक मतभेद उत्पन्न हो गया था। इसकी एक बड़ी वजह दोनों का धर्म को लेकर रवैया था। वर्ष 1976 में इंदिरा ने देश में आपातकाल के दौरान प्रस्तावना में संशोधन किया, जिसमें सेक्युलर शब्द शामिल किया गया था। जिसका मतलब था कि भारत हिन्दू देश होते हुए भी हिन्दू देश नहीं कहा जा सकता। 1991 में लागू किया गया यह प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। यह कानून तब लाया गया जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम सीमा पर पहुंचा था। इस कानून की परिधि से अयोध्या की राम जन्मभूमि को अलग रखा गया है। कांग्रेस के बनाए कानूनों के चलते ही वर्तमान में ज्ञानवापी, भोजशाला और मथुरा आदि हिंदू आस्था के स्थलों को वापस पाने लिए हिंदू समाज कानूनी लड़ाई लड़ रहा है।
कांग्रेस और इंडी गठबंधन में शामिल घटक दलों के कई नेता राम मंदिर और सनातन धर्म पर आपत्तिजनक बयानबाजी करते हैं। ऐसे में कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी पूरे हिंदू समाज को अखरती है। इससे यह संदेश भी जाता है कि अर्नगल बयानबाजी करने वालों को आलाकमान का समर्थन और मूक सहमति प्राप्त है। वास्तव में, सोमनाथ से अयोध्या तक कांग्रेस का चरित्र बिल्कुल भी बदला नहीं है। 18वीं लोकसभा के गठन के लिए आम चुनाव हो रहे हैं। इंडी गठबंधन में शामिल राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव नवरात्र के प्रथम दिन मछली खाने का वीडियो बड़ी बेशर्मी से पोस्ट करते हैं। इससे पहले बीते साल सावन के महीने में राजद नेता लालू प्रसाद यादव, तेजस्वी यादव ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ मटन बनाने को वीडियो शेयर किया था। इन वीडियो पर राजद, कांग्रेस और इंडी गठबंधन के दल भले ही कोई तर्क दें, वास्तव में उनका मकसद हिंदू समाज को अपमानित करने का है। मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस, राजद, तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल किस स्तर तक नीचे गिरेंगे, इसका आप अंदाजा नहीं लगा सकते।
रामलला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत विपक्ष के तमाम दल और नेता शामिल नहीं हुए। कांग्रेस राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के शुभ अवसर को भाजपा और आरएसएस को इवेंट बताती रही। लेकिन जमीन सच्चाई यह है कि कांग्रेस समेत विपक्ष ने राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दूरी बनाकर वही गलती की है, जो गलती कभी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी। उस वक्त नेहरू सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में नहीं गए थे। असल में मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस के एजेंडे में प्रथम स्थान पर है। उसके एजेंडे में न सोमनाथ था और न ही अयोध्या है।
राममंदिर किसी की आस्था पर आक्रमण नहीं, भारत की अस्मिता से जुड़े प्रश्नों का उत्तर है। राम मंदिर के निर्माण से संपूर्ण विश्व में रचता बसता हिंदू समाज आह्लादित है। न्यायालय के निर्णय के बाद भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए हिंदू समाज ने दिल खोलकर सहयोग किया। यह ऐतिहासिक सहयोग इस बात का साक्षात प्रतीक है कि हिंदु समाज इस घड़ी के लिए चिर प्रतीक्षित था। आज अयोध्या में जो भव्य राम मंदिर संसार की शोभा बढ़ा रहा है, वो संसारभर के हिंदुओं की आस्था, एकता, अखण्डता, श्रद्धा, मान्यता और संकल्प का सर्वोच्च पवित्र प्रतीक है। इस रामनवमी को हिंदू समाज अपने आराध्य भगवान श्रीराम के पूजन वंदन के समय अपने पूर्वजों के संघर्ष और बलिदान को भी अवश्य स्मरण करना चाहिए। इसी दिन के लिए तो निहत्थे राम भक्तों ने अपने सीनों पर गोलियां खाई थी। जिस सरयू में आज हम और आप स्नान ध्यान और आचमन कर रहे हैं, उसका जल किसी समय राम भक्तों के रक्त से लाल हुआ था। इसी दिन के लिए तो हमारे पूर्वजों ने धैर्य पूर्वक हिंदू विरोधी सरकारों से राजनीतिक लड़ाई लड़ी। न्यायालय में अपना पक्ष तथ्यों और साक्ष्यों के साथ प्रस्तुत किया। किसी भी स्तर पर उतावलापन, उत्तेजना और अधीरता का प्रदर्शन नहीं किया। इस घमंड या अहंकार में भी नहीं आए कि हम बहुसंख्यक हैं। वास्तव में, राम मंदिर के लिए संघर्ष संपूर्ण हिंदू समाज की सहनशीलता, धैर्य और कानून के प्रति आदर के उच्च भाव को दर्शाता है। वो अपने संकल्पों पर अडिग रहता है। बड़ी से बड़ी बाधा को वो कानून और नैतिकता के सीमा में रहकर ही पार करता है।
इस रामनवमी को एक दीपक उन सभी नाम अनाम शहीद कारसेवकों और रामभक्तों के नाम का भी अवश्य प्रज्जवलित करना चाहिए जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन में अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। उन्हीं महान बलिदानियों के त्याग के कारण आज बालक राम भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो पाए हैं। रामनवमी के शुभ अवसर पर भगवान सूर्य अपने प्रकाश से बालक राम का तिलक करके अखिल विश्व को यह संदेश देंगे कि लाखों षडयंत्रों, अन्याय और अत्याचारों के बावजूद सनातन धर्म का मस्तक झुकाया नहीं जा सकता।
लेखक: डॉ. आशीष वशिष्ठ
पूरे विश्व में आज विभिन्न देशों के नागरिकों में शांति का अभाव दिखाई दे रहा है एवं परिवार के सदस्यों के बीच भी भाईचारे की कमी दिखाई दे रही है। शादी के तुरंत बाद तलाक लेना तो जैसे आम बात हो गई है। आज कई विकसित देशों में तलाक की दर 60 प्रतिशत से भी अधिक है। बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करने वाला उनका अपना कोई साथ नहीं है। अमेरिका में तो लगभग 10 लाख बुजुर्ग नागरिक खुले में रहते हुए अपना जीवनयापन करने को मजबूर हैं। इन देशों में तो जैसे सामाजिक तानाबाना ही छिन्न-भिन्न हो गया है।
इसी प्रकार के अन्य कई कारणों के चलते आज सनातन हिंदू धर्म के प्रति विदेशी लोग आकर्षित हो रहे हैं, क्योंकि सनातन हिंदू धर्म का अपना एक अलग ही महत्व है। सनातन हिंदू धर्म में कुटुंब के प्रति वफादारी बचपन से ही सिखाई जाती है। भारत में आज भी संयुक्त परिवार की प्रथा प्रचलन में हैं, जिससे बच्चे अपने बचपन में ही अपने माता पिता की सेवा करने के संस्कार सीखते हैं और उन्हें पूरे जीवन भर अपने साथ रखने का संकल्प लेते हैं।
विश्व में कुछ अन्य धर्मों में बच्चों को बचपन में ही कट्टरता सिखाई जाती है एवं केवल अपने धर्म को ही सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में पेश किया जाता है। इससे इन बच्चों में अन्य धर्मों के प्रति सद्भावना विकसित नहीं हो पाती है। कई बार तो अन्य धर्म को मानने वाले नागरिकों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें अपना धर्म मानने को मजबूर भी किया जाता है। इसके ठीक विपरीत सनातन हिंदू धर्म किसी अन्य मजहब को मानने वाले व्यक्ति पर कभी भी कोई दबाव नहीं डालता है। सनातन हिंदू संस्कृति अन्य धर्मों के नागरिकों को किसी प्रकार का धर्म मानने की खुली स्वतंत्रता प्रदान करती है।
ऐसा कहा जाता है कि जब इस दुनिया में कोई भी धर्म नहीं था तब इस धरा पर निवास करने वाले लोग केवल सनातन हिंदू धर्म का ही पालन करते थे। सनातन हिंदू धर्म बहुत ही ज्यादा संयमित धर्म है जो किसी अन्य धर्म की ना तो उपेक्षा करता है और न ही वह अपने धर्म के वर्चस्व को सबके सामने रखने का प्रयास करता है। इसी कारण से कट्टरता के इस माहौल में आज पूरे विश्व में सनातन हिंदू धर्म के प्रति लोगों की आस्था एवं रुचि बढ़ रही है।
सनातन हिंदू धर्म आज विश्व में तीसरा सबसे बड़ा धर्म है और भारत में अधिकतर लोग इस धर्म को मानते हैं। एक अनुमान के अनुसार सनातन हिंदू धर्म इस पृथ्वी पर 10,000 वर्षों से हैं। लेकिन यदि वेदों और उपनिषदों में लिखी बातों को माने तो सनातन हिंदू धर्म की उत्पति लाखों वर्ष पहिले हुई थी उस समय ये सनातन धर्म के नाम से जाना जाता था। हिंदू धर्म को मानने वाले लोग भारत में रहते थे। इस धर्म को बहुत प्रभावशाली माना गया है। अन्य कुछ धर्मों के संस्थापक रहे हैं, जैसे ईसाई धर्म के संस्थापक के रूप में प्रभु यीशु को माना जाता है तथा इस्लाम धर्म के लिए मोहम्मद साहिब को संस्थापक माना जाता है और बौद्ध धर्म के लिए गौतम बुद्ध को संस्थापक जाना जाता है। परंतु हिंदू धर्म के बारे में कहा जाता है कि कुछ संतों एवं महापुरुषों ने एक होकर जीवन को सही तरीके से व्यतीत करने का तरीका विकसित किया था। सनातन हिंदू संस्कृति को, धर्म नहीं बल्कि यह, जीवन जीने का एक तरीका भी माना जाता था।
सनातन हिंदू धर्म का यह मानना है कि प्रभु परमात्मा ने इस धरा पर सबको खुलकर हंसने, उत्सव मनाने और मनोरंजन करने की योग्यता दी है। यही कारण है कि सनातन हिंदू धर्म में सबसे अधिक त्यौहार और संस्कार होते हैं। उत्सव, जीवन में सकारात्मक संदेश लेकर आते हैं और हमारे संस्कार मिलन सरिता को दर्शाते हैं। सनातन हिंदू धर्म की यही प्रक्रिया दुनिया पसंद करती है। तभी तो ब्रज की होली और कुम्भ के मेले का अवलोकन करने के लिए पूरी दुनिया से लोग भारत में आते हैं। यही एक कारण है कि आज पूरी दुनिया के कोने कोने में लोग हिंदू धर्म में अपनी रुचि दिखा रहे हैं।
हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के अनुसार, आबादी के लिहाज से दुनिया के तीसरे सबसे बड़े देश अमेरिका में अब हिंदूओं की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और हिंदू वहां राजनैतिक रूप से भी सक्रिय हो रहे हैं। इसके अलावा, कोरोना महामारी के बाद से पूरे अमेरिका एवं विश्व के अन्य देशों में योग और ध्यान की ओर लोगों का आकर्षण बहुत बढ़ गया है। योग और ध्यान पूरे विश्व को सनातन हिंदू धर्म की ही देन है। सनातन हिंदू धर्म बिलकुल ही कट्टरपंथी धर्म नहीं है। अन्य धर्मों की तरह इसमें किसी भी प्रकार का सामाजिक दबाव नहीं हैं।
इस धर्म में धार्मिक शिक्षा के लिए कोई भी जोर जबरदस्ती नहीं है जैसा कि कुछ अन्य धर्मों में होता है। हिंदू धर्म मानता है कि शिक्षा सभी तरह की होनी चाहिए केवल धार्मिक आधार पर शिक्षा देना उचित नहीं है। किसी भी बच्चे की शिक्षा में अगर संस्कार जुड़ जाए तो वह बच्चा बड़ा होकर एक जिम्मेदार नागरिक बनता है और वह एक अच्छा इंसान बनता है। सनातन हिंदू धर्म में परोपकार की भावना होती है। अन्य धर्मों की तरह यह केवल अपने वर्चस्व के बारे में नहीं सोचता है।
इंडोनेशिया जो कि एक मुस्लिम बहुल देश हैं वहां पर सनातन हिंदू धर्म से जुड़े संस्कार आज भी पाए जाते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि यह देश हिंदू धर्म से कितना प्रभावित रहा है। मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद हिंदू धर्म का बहुत बड़ा प्रभाव यहां आज भी दिखाई देता है। मुस्लिम लोग भी अपना नाम हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर रखना पसंद करते हैं। सनातन हिंदू धर्म कभी भी किसी नागरिक पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं डालता है। सनातन हिंदू धर्म कभी भी किसी को लालच देकर धर्म परिवर्तन नहीं करवाता है। परंतु, आज प्रत्येक वर्ष पूरे विश्व में बहुत से लोग अन्य धर्मों को छोड़कर स्वप्रेरणा से हिंदू धर्म अपना रहे हैं
सनातन हिंदू धर्म में स्त्रियों को जितना सम्मान दिया जाता है उतना किसी भी अन्य धर्म में नहीं दिया जाता है। सनातन हिंदू धर्म में स्त्रियों की पूजा की जाती है। सनातन हिंदू धर्म में आस्था का मतलब है कि जीवन में उमंग, उत्साह, उल्लास और मानवता की ओर झुकाव। जहां भारत में सनातन हिंदू धर्म को मिटाने की नाकाम कोशिश की जाती है वहीं रूस, ब्रिटेन, अमेरिका, घाना, सूरीनाम जैसे देशों में हिंदू धर्म तेजी से फैल रहा है। सनातन हिंदू धर्म पूरी दुनिया को शांति का संदेश देता है।
कई देशों में तो आज सनातन हिंदू संस्कारों का अनुपालन करते हुए विशेष गांव स्थापित किए जा रहे हैं। आयरलैंड में 22 एकड़ का एक हिंदू आइलैंड बन गया है। इसे हरे कृष्णा आइलैंड का नाम दिया गया है। यहां निवासरत समस्त नागरिकों द्वारा सनातन हिंदू धर्म के प्राचीन रीति रिवाजों का पालन बहुत ही सहजता के साथ किया जाता है। सनातन हिंदू धर्म के वैदिक नियमों को सदा सदा के लिए जीवित रखने के लिए यहां पर रहने वाले सनातनी हिंदू, मांस का परित्याग का शाकाहारी भोजन गृहण करते हैं।
नशीले पदार्थों, शराब एवं सिगरेट आदि पदार्थों से भी दूर रहते हैं। सुबह एवं शाम मंदिरों में पूजा अर्चना करते हैं। उनका जीवन सादगी भरा रहता है तथा कृषि एवं गाय पालन करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। महिलाएं साड़ी पहनती है एवं पुरुष धोती कुर्ता धारण करते हैं। इसी प्रकार के गांव जहां हिंदू सनातन संस्कृति का अनुपालन किया जाता है अन्य कई देशों यथा घाना, फीजी एवं अन्य कई अफ्रीकी देशों, सुदूर अमेरिका, यूरोप के देशों, आदि में भी तेजी से फैलते जा रहे हैं।
इसी प्रकार, कजाकिस्तान एक मुस्लिम देश है । यहां की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी इस्लाम को मानने वाले लोगों की है। परंतु, हाल ही के समय में यहां भी एक बड़ा बदलाव देखने में आ रहा है और यहां नागरिक सनातन हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित होते दिखाई दे रहे हैं। यहां सनातन हिंदू धर्म की लहर इतनी तेजी से उठी है कि हर तरफ हिंदू धर्म की आस्था एवं आध्यात्म का फैलाव दिखाई दे रहा है। यहां के युवा विशेष रूप से भगवत गीता पढ़ने की ओर आकर्षित हो रहे हैं और हिंदू धर्म को समझने का प्रयास कर रहे हैं। एक कजाकिस्तानी महिला मारीना टारगाकोवा की भगवत गीता को पढ़कर हिंदू धर्म के प्रति रुचि इतनी बढ़ी है कि अब उसने जैसे बीड़ा ही उठा लिया है कि वह कजाकिस्तान में सनातन हिंदू धर्म को फैलाने का प्रयास लगातार करती नजर आ रही है।
लेखक : प्रहलाद सबनानी
