पृथ्वी से ही जीवन है
Date : 22-Apr-2024
मध्यप्रदेश में राज्यपालरहे : हिन्दू पूर्वजों पर गर्व था
अहिंसा परमो धर्मः’ सिद्धांत के लिए जाने जाते रहे भगवान महावीर का अहिंसा दर्शन आज के समय में सर्वाधिक प्रासंगिक और जरूरी हो गया है क्योंकि वर्तमान समय में मानव अपने स्वार्थ के वशीभूत कोई भी अनुचित कार्य करने और अपने फायदे के लिए हिंसा के लिए भी तत्पर दिखाई देता है। आज के परिवेश में हम जिस प्रकार की समस्याओं और जटिल परिस्थितियों में घिरे हैं, उन सभी का समाधान भगवान महावीर के सिद्धांतों और दर्शन में समाहित है। अपने जीवनकाल में उन्होंने ऐसे अनेक उपदेश और अमृत वचन दिए, जिन्हें अपने जीवन तथा आचरण में अमल में लाकर हम अपने मानव जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
भगवान महावीर के प्रमुख अमृत वचन
- संसार के सभी प्राणी बराबर हैं, अतः हिंसा को त्यागिए और ‘जीओ व जीने दो’ का सिद्धांत अपनाइए।
- जिस प्रकार अणु से छोटी कोई वस्तु नहीं और आकाश से बड़ा कोई पदार्थ नहीं, उसी प्रकार अहिंसा के समान संसार में कोई महान् व्रत नहीं।
- जो मनुष्य स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है या दूसरों से हिंसा करवाता है अथवा हिंसा करने वालों का समर्थन करता है, वह जगत में अपने लिए वैर बढ़ाता है।
- धर्म उत्कृष्ट मंगल है और अहिंसा, तप व संयम उसके प्रमुख लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों का मन सदैव धर्म में रहता है, उन्हें देव भी नमस्कार करते हैं।
- मानव व पशुओं के समान पेड़-पौधों, अग्नि, वायु में भी आत्मा वास करती है और पेड़ पौधों में भी मनुष्य के समान दुख अनुभव करने की शक्ति होती है।
- संसार में प्रत्येक जीव अवध्य है, इसलिए आवश्यक बताकर की जाने वाली हिंसा भी हिंसा ही है और वह जीवन की कमजोरी है, वह अहिंसा कभी नहीं हो सकती।
- जिस जन्म में कोई भी जीव जैसा कर्म करेगा, भविष्य में उसे वैसा ही फल मिलेगा। वह कर्मानुसार ही देव, मनुष्य, नारक व पशु-पक्षी की योनि में भ्रमण करेगा।
- कर्म स्वयं प्रेरित होकर आत्मा को नहीं लगते बल्कि आत्मा कर्मों को आकृष्ट करती है।
- जिस मनुष्य का मन सदैव अहिंसा, संयम, तप और धर्म में लगा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।
- धर्म का स्थान आत्मा की आंतरिक पवित्रता से है, बाह्य साधन धर्म के एकान्त साधक व बाधक नहीं हो सकते।
- संसार का प्रत्येक प्राणी धर्म का अधिकारी है।
- क्रोध प्रेम का नाश करता है, मान विषय का, माया मित्रता का नाश करती है और लालच सभी गुणों का। जो व्यक्ति अपना कल्याण चाहता है, उसे पाप बढ़ाने वाले चार दोषों क्रोध, मान, माया और लालच का त्याग कर देना चाहिए।
- रुग्णजनों की सेवा-सुश्रुषा करने का कार्य प्रभु की परिचर्या से भी बढ़कर है।
- वासना, विकार व कर्मजाल को काटकर नारी व पुरुष दोनों समान रूप से मुक्ति पाने के अधिकारी हैं।
- जब तक कर्म बंधन है, तब तक संसार मिट नहीं सकता। गति भ्रमण ही संसार है।
- छोटे-बड़े किसी भी प्राणी की हिंसा न करना, बिना दी गई वस्तु स्वयं न लेना, विश्वासघाती असत्य न बोलना, यह आत्मा निग्रह सद्पुरुषों का धर्म है।
- ज्ञानी होने का यही एक सार है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे। यही अहिंसा का विज्ञान है।
- जो लोग कष्ट में अपने धैर्य को स्थिर नहीं रख पाते, वे अहिंसा की साधना नहीं कर सकते। अहिंसक व्यक्ति तो अपने से शत्रुता रखने वालों को भी अपना प्रिय मानता है।
- संसार में रहने वाले चल और स्थावर जीवों पर मन, वचन एवं शरीर से किसी भी तरह के दंड का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
- ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बाद यदि कर्म श्रेष्ठ हैं, वही व्यक्ति ब्राह्मण है किन्तु ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी यदि वह हिंसाजन्य कार्य करता है तो वह ब्राह्मण नहीं है जबकि नीच कुल में पैदा होने वाला व्यक्ति अगर सुआचरण, सुविचार एवं सुकृत्य करता है तो वह बाह्मण है।
- प्रत्येक प्राणी एक जैसी पीड़ा का अनुभव करता है और हर प्राणी का एकमात्र लक्ष्य मुक्ति ही है।
- आत्मा शरीर से भिन्न है, आत्मा चेतन है, आत्मा नित्य है, आत्मा अविनाशी है। आत्मा शाश्वत है। वह कर्मानुसार भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेती है।
लेखक :- योगेश कुमार गोयल
भाजपा इस बार दक्षिण भारत की जंग में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए जी-जान लगा रही है। वह इस चुनावी जंग में अपने प्रतिद्वंदियों को किसी भी सूरत में कोई स्पेस देने के मूड में नहीं है। जिनको लगता है कि भाजपा का दक्षिण भारत में कोई वजूद ही नहीं है, वे घोर मुगालते में हैं। भाजपा इस बार इन राजनीतिक अल्प-ज्ञानियों को पूरी तरह से गलत साबित करना चाहती है। दक्षिण भारत के राज्य भाजपा के लिए अब तक कठिन चुनौती वाले प्रदेश रहे हैं, इसमें कोई दोराय नहीं है । लेकिन, अब परिस्थितियां बदली हैं। इस बार पार्टी ने दक्षिण भारत में चुनावी स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने का मन ही नहीं बनाया, बल्कि दृढ़ संकल्प किया हुआ है। वास्तव में 2024 का लोकसभा चुनाव भाजपा के संबंध में दक्षिण की धारणा को पूरे समाज, मीडिया और समीक्षकों की राय बदलने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
भाजपा ने अपने दो बेहद तेजतर्रार मुख्यमंत्रियों क्रमश: योगी आदित्यनाथ और प्रमोद सावंत को दक्षिण भारत में सघन चुनाव अभियान की जिम्मेदारी सौंपी है। ये दोनों ही अपने कुशल नेतृत्व के चलते उत्तर प्रदेश और गोवा को विकास की बुलंदियों पर लेकर जा रहे हैं। प्रमोद सावंत कर्नाटक में भाजपा के उम्मीदवारों के पक्ष में जमकर कैंपेन कर रहे हैं। वे कर्नाटक में अपना भाषण कन्नड़ में ही देते हैं। जाहिर है, इस वजह से वे तुरंत स्थानीय जनता से संबंध स्थापित कर उन्हें प्रभावित करते हैं। योगी आदित्यनाथ को भी दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में प्रचार करना है।
योगी आदित्यनाथ और प्रमोद सावंत की अखिल भारतीय छवि बन चुकी हैं। योगी आदित्यनाथ पूर्व में कर्नाटक में कैंपन करते रहे हैं । उन्हें कर्नाटक का युवा, मेहनतकश और महिलाएं बहुत ध्यान से सुनती हैं। उन्होंने बीमारू उत्तर प्रदेश को देश के सबसे विकसित होते राज्य की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। उन्होंने साबित कर दिया है कि चुस्त-सख्त प्रशासन से गुंडे मवाली भाग खड़े होते हैं। अगर बात प्रमोद सावंत की करें तो वे गोवा की स्थापित छवि को बदल रहे हैं। वे चाहते है कि गोवा को उसके समुद्री तटों, गिरिजाघरों के अलावा उसके समृद्ध अतीत के रूप में भी जाना जाए। गोवा को लेकर एक खास तरह की भ्रांति पूर्ण धारणा बना दी गई है, जबकि सच्चाई यह है कि गोवा एक प्राचीन सनातन भूमि है। गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने पर्यटन संग आध्यात्मिक राष्ट्रवाद से गोवा को विकसित बनाने का संकल्प लिया है।
बेशक, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के साथ-साथ यह दोनों भी दक्षिण भारत में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में अहम रोल निभाने जा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ अपने गृह प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान और बिहार में भी बड़ी सभाओं को संबोधित कर चुके हैं। वे जिधर भी जाते हैं वहां पर उनका अभूतपूर्व स्वागत होता है । इस बीच, तमिलनाडु उन अनूठे राज्यों में से एक है, जहां 87 फीसद से अधिक हिंदू आबादी है। यह उन राज्यों में एक है जहां राष्ट्रीय दलों यानी भाजपा और कांग्रेस की उपस्थिति अब तक काफी कमजोर रही है।
हां भाजपा कोयंबटूरऔर कन्याकुमारी में जरूर अच्छे वोट जुटाती रही है। तमिलनाडु में भाजपा मजबूत नहीं हुई। इसका सबसे बड़ा कारण राज्य में नेतृत्व का अभाव रहा, कई भाजपा नेता विवादास्पद बयान के लिए जाने जाते रहे । लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने इस धारणा को बदल दिया है। और फिर पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई को तमिलनाडु भाजपा का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद दक्षिणी राज्य में भाजपा की संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं। अन्नामलाई राज्य में पार्टी के लिए जमीन तैयार करने में काफी हद तक सफल भी हुए हैं।
मोदी और शाह लगातार अन्नामलाई के नेतृत्व को अपना समर्थन दे रहे हैं। भाजपा ने इसी आधार पर तमिलनाडु में अकेले 23 सीटों पर चुनाव लड़ने का साहस दिखाया। तमिलनाडु में 19 अप्रैल को मतदान हुआ। भाजपा को लगता है कि वह इस बार तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों में भी चौंकाने वाले नतीजे देगी। दक्षिण भारत में लोकसभा की कुल मिलाकर 130 सीटें हैं। इसमें तमिलनाडु (39), कर्नाटक (28), आंध्र प्रदेश (25), तेलंगाना (17), केरल (20) और पुदुचेरी (1) शामिल हैं। कांग्रेस ने 2019 में दक्षिण से 28 लोकसभा सीटें जीतीं थीं। इसमें केरल में 15, तमिलनाडु में 8, तेलंगाना में तीन, कर्नाटक में एक और पुदुचेरी में एक, जबकि भाजपा ने कर्नाटक में 25 और तेलंगाना में 4 सीटें जीती थीं।
तमिलनाडु में भाजपा का खाता नहीं खुला था जबकि उसका जे. जयललिता की पार्टी ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) से गठबंधन था। केरल और आंध्र प्रदेश में भी हाल यही रहा। खास बात है कि दक्षिण भारत में सबसे ज्यादा सीटें तमिलनाडु में ही हैं। मोदी- शाह के साथ भाजपा के चुनावी रणनीतिकार इस राज्य में ही खाता खोलने पर पूरा फोकस करते रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भी तमिलनाडु का रिश्ता जोड़ा गया है और सफलतापूर्वक आयोजित की गई तमिल संगम इसकी बानगी है।
योगी आदित्यनाथ और प्रमोद सावंत को बहुत सोच समझकर दक्षिण का किला फतेह करने का काम सौंप गया। इसी तरह से योगी आदित्यनाथ और प्रमोद सावंत को आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल को साधने के लिए भी भेजा जाएगा। योगी आदित्यनाथ की सरपरस्ती में उत्तर प्रदेश जिस तरह से निजी क्षेत्र का निवेश हासिल कर रहा है, उसका संदेश दूर तक जा रहा है। कोरोना काल के बाद जब निवेशक बहुत सोच-समझकर और फूंक-फूंककर निवेश कर रहे हैं, तब उत्तर प्रदेश में 80 हजार करोड़ रुपये के निवेश का वादा हो चुका है। पिछले कुछ समय पहले लखनऊ में हुए एक निवेशक सम्मेलन में हजारों करोड़ रुपए की परियोजनाएं धरातल पर उतरीं। उत्तर प्रदेश अपनी छवि तेजी से बदलता जा रहा है।
इसे दक्षिण भारत की जनता भी देख रही है। यह ही स्थिति प्रमोद सावंत की है। वे भाजपा के सबसे कुशल मुख्यमंत्रियों के रूप में उभरे हैं। भाजपा तमिलनाडु में द्रमुक और अपेक्षाकृत कमजोर अन्नाद्रमुक जैसे स्थापित दलों से मुकाबला कर रही है। वहीं, कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) के साथ एक व्यावहारिक गठबंधन बनाया है, ताकि वोक्कालिंगा और लिंगायत जैसे प्रमुख समुदायों के वोटों का विभाजन रोक सके। भाजपा तेलंगाना में पिछले विधानसभा चुनाव में अपने बढ़े हुए वोट प्रतिशत का फायदा उठाने में जुटी है। वाईएसआरसीपी प्रमुख जगन मोहन रेड्डी के साथ मोदी जी के अच्छे समीकरण के बावजूद पार्टी ने आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) और पवन कल्याण की जन सेना पार्टी के साथ गठबंधन किया है।
इन सभी रणनीतियों का परिणाम तो वोट काउंटिंग के दिन ही सामने आएगा, लेकिन इतना जरूर तय हो गया है कि भाजपा ने दक्षिण को साधने के लिए पुख्ता रणनीति तैयार कर ली है। अगर दक्षिण भारत के राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन पहले से बेहतर रहता है तो इसका श्रेय योगी आदित्यनाथ और प्रमोद सावंत को भी देना होगा जो अपने अपने राज्यों को छोड़कर यहां प्रचार करने के लिए आए।
लेखक : आर.के. सिन्हा
देश में होने जा रहे लोकसभा चुनाव में फरवरी में आई अमेरिकी थिंकटैंक प्यू रिसर्च सेंटर की लोकतांत्रिक देशों को लेकर जारी सर्वेक्षण रिपोर्ट समीचीन हो गई है। यह रिपोर्ट कुछ लोगों के लिए चौंकाने वाली हो सकती है। वह इसलिए कि देशवासियों को डेमोक्रेसी का ऑटोक्रेसी मॉडल अधिक लुभा रहा है। सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार देश की लोकतांत्रिक सरकार की कार्य व्यवस्था को लेकर स्वीडन के बाद दूसरे नंबर पर भारत के लोग संतुष्ट है। स्वीडन में जहां 75 फीसदी लोग वहां लोकतांत्रिक सरकार के काम करने के तौर तरीके से संतुष्ट हैं वहीं भारत में 72 प्रतिशत लोग लोकतांत्रिक सरकार के काम करने के तौर-तरीकों को पसंद करते हैं। इस साल भारत समेत दुनिया के करीब 50 देशों में चुनाव होने जा रहे हैं। इस मायने में 24 देशों में किया गया यह सर्वेक्षण लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर खास महत्व रखता है। मजे की बात यह है कि सर्वेक्षण में शामिल देशों में केवल 33 फीसदी अमेरिकी ही अपने यहां की लोकतांत्रिक सरकार के कार्य करने की व्यवस्था को लेकर संतुष्ट है। खैर यह तो अलग बात हुई। मगर सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि दुनिया के अधिकांश देशों की आम जनता बोल्ड निर्णय करने वाले नेता को अधिक पसंद करने लगी है। भारत के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। 2017 में 55 प्रतिशत देशवासी ऑटोक्रेसी को पसंद करते थे। अब उसका ग्राफ तेजी से बढ़ा है। आज 67 प्रतिशत लोगों को ऑटोक्रेसी (अधिनायकवादी नेता) पर अधिक विश्वास है। ऑटोक्रेसी पर विश्वास बढ़ने वाले देशों में भारत के अलावा केन्या, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, पोलैंड सहित कई देश हैं। सर्वेक्षण में शामिल 24 में से आठ देशों में ऑटोक्रेसी के प्रति रुझान बढ़ा है।
दरअसल लोग निर्णय करने वाले नेता को पसंद करते हैं। कुछ करने का जज्बा ही देशवासी नेता में खोजते हैं। विपक्ष के लाख आरोप-प्रत्यारोपों के बीच नरेन्द्र मोदी पिछले दो चुनाव में लगातार जनता की पसंद बने रहे और 2024 का चुनाव भी लगभग उसी दिशा में बढ़ रहा है। विपक्षी दल मुद्दे बनाने के प्रयास करते हैं पर वहीं मुद्दे सेल्फ गोल में परिवर्तित होने लगते हैं। हालिया इलेक्शन बॉन्ड को लेकर जिस तरह से भाजपा को घेरने का प्रयास किया गया वह अभी तक तो सिरे नहीं चढ़ता नहीं नजर आ रहा है। समझने वाली एक महत्वपूर्ण बात यह हो जाती है कि चंदा देने वाले कौन हैं? साफ है पैसे वाले अमीर लोग। इलेक्शन बॉण्ड में पैसा तो अमीर लोगों से आ रहा है और उनका प्रतिशत इतना नहीं है कि वह चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सके। इसके विपरीत सत्तारूढ़ दल को गरीब आम मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है। यानी कि इसे मुद्दा बनाने के बावजूद नरेन्द्र मोदी या भाजपा आम मतदाता को अपने पक्ष में साधने में पूरी तरह सफल है। दूसरा यह कि कोई भी पार्टी हो उसके अधिकांश टिकट पैसे वाले लोगों को ही मिलते हैं।
जहां तक लोकतंत्र के ऑटोक्रेसी मॉडल की बात है आज नरेन्द्र मोदी पर यह आरोप खुले आम विपक्ष लगाता आ रहा है पर विगत के पन्ने खोलें तो नरेन्द्र मोदी का गुजरात मॉडल ही उन्हें केन्द्र की सत्ता दिलाने में सहायक रहा है। दरअसल देश को हमेशा सख्त मिजाज मजबूत नेता की आवश्यकता महसूस होती रही है। किसी भी दल से सख्त मिजाज नेता सामने आया है तो आमजन ने उसे हाथों हाथ लिया है। नेहरू को उस समय के संदर्भ में लोगों द्वारा महत्व दिया गया तो नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री को ईमानदार और दबंग नेता के रूप में आज भी याद किया जाता है। जय जवान-जय किसान जो आज एक कदम आगे बढ़कर जय जवान-जय किसान-जय विज्ञान हो गया है। 1971 की भारत-पाक लड़ाई और बांग्लादेश के गठन के चलते इंदिरा गांधी को देशवासियों ने सिर चढ़ाया।
इस सर्वेक्षण रिपोर्ट में ऑटोक्रेसी को पसंद करने वाले लोगों की 12 प्रतिशत बढ़ोतरी से साफ समझ में आ जाना चाहिए कि लोग परिणाम पर नहीं जाते, आलोचना-प्रत्यालोचना को भी खारिज कर देते हैं जब कोई निर्णय लेने में हिचकता नहीं है। नरेन्द्र मोदी के पक्ष में यही बात जाती है। नरेन्द्र मोदी पर विपक्ष तानाशाही और जुमलेबाज जैसे आरोप लगाते हैं पर 2014 और 2019 के चुनाव परिणाम तो विपक्ष के आरोपों को सिरे से नकार रहे हैं। 370, राम मंदिर, तीन तलाक, पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसे बोल्ड निर्णय और विदेशी नेताओं के बीच बॉस की भूमिका को देशवासी अपना गौरव समझने लगे हैं। दरअसल इस तरह के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। यही कारण है कि यह चुनाव भी मोदी बनाम विपक्ष के बीच लड़ा जा रहा है। लोकसभा के पिछले दो चुनाव भी मोदी के नाम से ही लड़े गए और जनता ने भारी बहुमत देकर सब कुछ साफ कर दिया। कुछ समय पहले पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भी भाजपा ने क्षेत्रीय क्षत्रपों के स्थान पर मोदी की गारंटी के नाम से लड़े। परिणाम सामने हैं।
दरअसल डेमोक्रेसी के नए रूप ऑटोक्रेसी में एक ही चेहरा-एक ही नाम पर लड़ा जाता है। इस लोकसभा चुनाव में भी यही हालात है। कहने को भले ही यह कहा जा रहा है कि 2024 के चुनाव की दशा और दिशा नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, शरद पवार, एमके स्टालिन, तेजस्वी यादव, असदुद्दीन औवेसी तय करने वाले हैं। मगर जमीनी हकीकत तो यह है कि 2024 का चुनाव एक ही चेहरा-एक ही नाम नरेन्द्र मोदी के इर्द-गिर्द है। नरेन्द्र मोदी बनाम समूचा विपक्ष चुनाव आकार ले चुका है। पहले चरण की 102 लोकसभा सीटों के लिए 19 अप्रैल को मतदान होना है। अब राजनीतिक दलों को यह समझ लेना होगा कि आमजन को मुखर और निर्णय लेने की क्षमता वाला नेता चाहिए। सत्ता में आना है तो आमजन तक यह संदेश जाना जरूरी है। आज विपक्ष में ऐसा कोई नेता नजर नहीं आ रहा।
लेखक : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
महान स्वतंत्रता सेनानी तात्या टोपे का आज बलिदान दिवस है। 18 अप्रैल को उन्हें फांसी दी गई थी। भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाने में उनकी अहम भूमिका रही है। उन्होंने 1857 की क्रांति में अपनी युद्ध करने की नीति से अंग्रेज सैनिकों को खूब छकाया। युद्ध में कभी हार भी मिलती तो वह निराश में नहीं होते बल्कि तुरंत दूसरे युद्ध की तैयारी में जुट जाते। कहा जाता है कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में अंग्रेजों के खिलाफ करीब डेढ़ सौ लड़ाइयां लडीं और इस दौरान उन्होंने दुश्मन के लगभग दस हजार सैनिकों को मार गिराया। इस तरह वे अंग्रेजों की नाक में हमेशा दम किए रहते।
