यह पल्लवों द्वारा बनाए गए सात मंदिरों में से एक है; उनमें से 6 समुद्र में डूबे हुए हैं, और यह उनमें से अंतिम माना जाता है। 2004 की सुनामी ने ग्रेनाइट ब्लॉक से बने पुराने ढह चुके मंदिर को उजागर कर दिया। इसने हाथियों, शेरों और मोरों की कुछ चट्टानी संरचनाओं को भी उजागर किया। यह यूरोपीय लोगों की डायरियों में उपलब्ध जानकारी की भी पुष्टि करता है जिन्होंने इस साइट को सात पैगोडा के स्थल के रूप में वर्णित किया था, और यह संभवतः नाविकों के लिए एक मील का पत्थर के रूप में कार्य करता था। यह शहर पल्लवों के दौरान चीनी व्यापारियों के साथ व्यापार के लिए मुख्य बंदरगाह शहर था।
किनारे का मंदिर ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर बनाया गया है, जिसे धर्मराज रथ की प्रतिकृति माना जाता है । तीन मंदिरों में से बीच वाला भगवान विष्णु का मंदिर है, और दोनों तरफ के दो अन्य मंदिर भगवान शिव के मंदिर हैं।
पुणे हिट एंड रन मामले के बाद एक बार फिर पूरे देश में इस संबंधी कानून और नियंत्रण पर नई बहस छिड़ गई है। इस दर्दनाक घटना के आरोपित को नाबालिग बताकर कानून की खामियों या कमियां, दोनों का भरपूर लाभ दिया गया। वह तो देशव्यापी जन आक्रोश को देखकर फैसला बदला गया वरना जिम्मेदारों ने तो अपना फर्ज निभा ही दिया था। निश्चित रूप से ऐसे मामले चर्चाओं में क्यों आते हैं बिना कुछ कहे सब एकदम साफ है। अब एक बार फिर कानून में सुधार पर नए सिरे से सोचना होगा। आरोपित की मंशा और दुर्घटना की परिस्थितियों तथा यदि उपलब्ध है तो डिजिटल साक्ष्य को ध्यान में रख कार्रवाई के लिए प्रभावी व पारदर्शी सुधारों की दरकार महसूस होने लगी है। यह यकीनन बड़ी चुनौती है लेकिन दोष-निर्दोष और अनजाने हुई दुर्घटना के बीच की महीन लकीरों को बिना मिटाए या प्रभावित किए, प्रभावी कार्रवाई चुनौती भी है और जरूरी भी।
पुणे दुर्घटना में अकाल मृत्यु के आगोश में समाए 24-24 बरस के अनीस अवधिया और अश्विनी कोस्टा तो वापस नहीं आएंगे लेकिन दुर्घटना उपरान्त पूछताछ के नाम पर पुलिसिया सवालों से आहत पीड़ित परिवार का दर्द जरूर बड़ा सवाल है। जिम्मेदारों और माननीयों को इस पर भी सोचना होगा। वहीं बड़ा सवाल उस बिगड़ैल रईसजादे का है जिसे नाबालिग होते हुए भी पिता ने महंगी गाड़ी चलाने को कैसे दी? जबकि पता था कि न रजिस्ट्रेशन है और न औलाद के पास लाइसेंस। इसे अमीरी का रुतबा कहें या व्यवस्थाओं पर तमाचा जो पुणे जैसे शहर में पैसों की खुमारी से नाबालिग बिना नंबर की गाड़ी 200 किलोमीटर की रफ्तार सड़क पर चला नहीं उड़ा रहा था? आखिर दो बेकुसूरों को उड़ाने का दोषी सिर्फ नाबालिग ही नहीं उसका पिता भी बराबर का है!
ऐसे हिट एंड रन देश में चर्चाओं में रहते हैं। दो-चार दिन हो-हल्ला के बाद शांत भी हो जाते हैं। लेकिन न तो दुर्घटनाएं रुकती हैं और न ही सड़कों पर वाहन दौड़ाने वाले रईसों में कोई डर दिखता है। हां, साधारण लोग जरूर कानून, कायदे के जंजाल में फंस जाते हैं या फंसा दिए जाते हैं, क्योंकि वो रईस नहीं होते। यहां कानपुर के उस मामले के भी चर्चा जरूरी है जिसमें एक नामी डॉक्टर के केवल 15 बरस के नाबालिग औलाद ने अक्टूबर 2023 में तेज रफ्तार गाड़ी चलाते हुए सागर निषाद और आशीष रामचरण नाम के दो बच्चों को रौंदकर मार डाला। कानून का माखौल कहें या जिम्मेदारों की छत्रछाया जो दोबारा 31 मार्च 2024 को इसी बिगड़ैल ने 4 लोगों के ऊपर फिर कार चढ़ा दी। तब भी कानूनी खानापूर्ति में मामूली धाराओं में पुलिस ने प्रकरण बनाया और आरोपी बेलगाम घूमता रहा। लेकिन पुणे की घटना के बाद शायद पुलिस की आत्मा जागी या डरी पता नहीं, दोनों मामलों पर एकाएक सख्त कार्रवाई करते हुए आरोपित नाबालिग और उसके डॉक्टर पिता को भी 6-7 महीने बाद आरोपी जरूर बना लिया। हैरानी की बात है कि तब भी यही कानून थे और अब भी वही कानून हैं। लेकिन पुलिस का रवैया अलग-अलग विचारणीय है?
पुणे घटना का एक दूसरा पहलू भी है। आरोपी नाबालिग ने दोस्तों संग दो पबों में 69 हजार रुपयों का जाम छलकाया जिसके सुबूत भी मिले। लेकिन हैरानी है कि मेडिकल रिपोर्ट निगेटिव आई? अब पुणे में अवैध पब ढ़हाए जा रहे हैं, यह जिम्मेदारों को पहले क्यों नहीं दिखे? कैसे नाबालिगों को शराब परोसी गई? कानून की धज्जियों उड़ाने वाले सवालों की शृंखला में कई कड़ी हैं। दुर्घटना करने वाली दो करोड़ से ज्यादा की पोर्स कार के रजिस्ट्रेशन के बारे में महाराष्ट्र ट्रांसपोर्ट विभाग का हैरान कर देने वाला खुलासा सामने आया। महज 1,758 रुपये की फीस नहीं चुकाने से कार का रजिस्ट्रेशन मार्च से पेंडिंग था और विभाग खामोश। अब कहा जा रहा है कि आरोपित का ड्राइविंग लाइसेंस उम्र 25 साल पूरा होने तक नहीं बनेगा। लेकिन यह क्यों नहीं कोई बताता कि बिना लाइसेंस रईसजादा कैसे सड़क पर बेखौफ होकर फर्राटे भर रहा था? क्या रईसजादों को लाइसेंस की जरूरत नहीं होती? क्या रईसजादों पर उम्र का बंधन नहीं होता? कानून के रक्षकों के शायद इसी दोहरे रवैये से रईस नाबालिगों के हिट एंड रन के हैरान करने वाले मामले सामने आते हैं जो आम लोगों से भेदभाव करते हैं। लगता नहीं कि अपराध की गंभीरता देखी जानी चाहिए न कि उम्र? नए दौर में कानून में ऐसे सुधारों की दरकार है जिसमें आयु की जगह अपराध की गंभीरता और मंशा अहम हो। नाबालिगों के ऐसे-ऐसे अपराध सामने आने लगे हैं जो चिंताजनक हैं। लूटपाट, हत्या, गैंग रैप, धमकाना और वो साइबर अपराध जिन्हें करते वक्त नाबालिग कैसे बड़ों-बड़ों को मात देता है। तब उसका अपराध नाबालिग होने के कारण छूट का कारण कैसे हो सकता है?
भारत में सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़े चिंताजनक हैं। केवल 2022 के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो रोजाना 1264 सड़क दुर्घटनाओं में 462 लोगों की मृत्यु हुई जो हर घंटे के लिहाज से 53 दुर्घटनाओं तथा 19 मौतों का है। यह विस्तार से लिखने का विषय है।
उन्नत तकनीक का दौर है। गांव-गांव ऑप्टिकल फाइबर के जंजाल से लेकर हर कहीं सैटेलाइट्स की जद है। टोलब्रिज पर फास्टटैग से भुगतान और वाहन के सारे डिटेल्स सर्वर को चंद सेकेंड में मिल जाते हैं। अब असंभव भी नहीं कि हर शहर, कस्बे, सड़क, राजमार्ग पर इसी तर्ज पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई संचालित हाई रिजॉल्यूशन स्पीड ट्रैप कैमरे, सेंसर व जरूरी उपकरण लगें, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर वक्त-बेवक्त ड्रोन कैमरों से सतत निगरानी हो। सारा कुछ जिम्मेदार विभाग या शहर, नगर, कस्बे, पंचायत व स्थानीय पुलिस थानों में बड़े स्क्रीनों पर देखा जा सके। पुलिस को बजाए सड़कों पर खड़ा करने नियंत्रण कक्ष से ही सारी गतिविधियां ऑन कैमरा परखी और जांची जाएं। एआई तकनीक का ऑटोमैटिक अलार्म सिस्टम भी संदिग्ध, ओवर स्पीडिंग, बिना नंबर, बिना हेलमेट, या बिना सीट बेल्ट लगाए वाहन निष्पक्षता व पारदर्शिता से ट्रैप कर पलक झपकते चाहे शहर हों या राजमार्ग, सारी सूचनाएं सर्वर, करीबी गश्ती दल, थाने या नाके तक पहुंचाएं। जरा सी भी आशंका पर अगले ठिकाने में संदिग्ध या कानून तोड़ता वाहन भी डिजिटल प्रमाणों के चलते जद में होगा। ऐसी निगरानी का भरपूर प्रचार हो ताकि सड़कों पर सबको पता हो कि वो तकनीक के जद में है। महानगरों की तर्ज पर ऐसे संसाधनों का इस्तेमाल एक बार के निवेश जैसा है जिसे थोड़े से बजट से हर महीने मेन्टेन या अपडेट किया जा सकेगा।
लगता नहीं कि यह अत्याधुनिक तकनीकों का दौर है। नियंत्रण कक्षों में उन्नत यंत्रों से आ रही सूचनाओं को देखना, जांचना और कार्रवाई संबंधी प्रणाली विकसित करना चाहिए ताकि कोई भी बेखौफ, रसूखदार, नशेड़ी, अपराधी एआई की निगाह से न बच पाए। रिकॉर्ड का नियमित उच्च स्तरीय ऑडिट, जांच-परख भी हो ताकि भेदभाव की गुंजाइश न रहे। यकीनन संजय रूपी तीसरी आंख बिना भेदभाव काम करेगी जिसकी जद में सब होंगे तो क्या राजा, क्या रंक सबको अपनी हदों या औकात का पता होगा। लगता नहीं कि बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं या हिट एंड रन को रोकने के लिए यही सस्ता, प्रभावी और निष्पक्ष उपाय ही कारगर हो सकता है?
लेखक - ऋतुपर्ण दवे
केंद्रीय भू-जल बोर्ड और राजस्थान के भू-जल विभाग की डायनामिक ग्राउंड वाटर रिसोर्स रिपोर्ट में 2025 तक जयपुर अजमेर, जैसलमेर और जोधपुर में पानी की उपलब्धता का आकलन शून्य किया गया है। भगवान ना करे, जयपुर अजमेर, जैसलमेर और जोधपुर में कभी ऐसा हो। बावजूद इसके इस रिपोर्ट को महज रिपोर्ट समझने की जरूरत नहीं है। यह सारे देश के लिए गंभीर चेतावनी है। भारत के कई हिस्सों में जमीन धंस और फट रही है। मकानों में दरारें आ रही हैं। राजस्थान के बीकानेर और बाड़मेर जिलों में भी ऐसा हो चुका है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में बांदा जिले के मटौंध गांव के आसपास खेत फटने लगे थे।
यह समझने की जरूरत है कि ऐसा उन स्थानों पर होता है जहां भू-जल खत्म जाता है। ऐसी स्थिति ना आए, इसके लिए वर्षा ऋतु में परंपरागत जल संग्रहण जरूरी है। इसकी सबसे आसान विधि मानसून आने से पूर्व खेतों पर मेड़ बनानी चाहिए। फिर मेड़ पर पेड़ लगाना होगा। यह आज की नहीं, हमारे पुरखों की परंपरागत विधि है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कैच द रेन का आह्वान इसी विधि की ओर इशारा करता है। ऐसा करने से तालाब, कुआं, नाला, सामुदायिक जलाशयों में बरसात का पानी भर जाता है। इससे भू-जल का स्तर आसानी से ऊपर आता है और कुछ ही सालों में यह संकट हमेशा-हमेशा के लिए दूर हो जाता है।
गांवों में यह संकट ना आए, इसके लिए खेतों और मरवा जमीन में कीटनाशक दवा का छिड़काव बंद होना चाहिए। इस दवा के छिड़काव से मिट्टी को पानी की जरूरत ज्यादा पड़ती है। उर्वरक क्षमता कम हो जाती है।खेत के मित्र जीव-जंतु समाप्त हो जाते हैं। इसका एकमात्र निदान प्राकृतिक और परंपरागत खेती की ओर लौटने से ही संभव है। यह सभी मानते हैं कि प्रकृति ने इनसान की जरूरत के हिसाब से हर चीज बनाई है। इसलिए उसका उतना ही उपयोग किया जाए, जितना जरूरी है। उसकी बरबादी एक न दिन तबाही लाती है। इसलिए पानी की बरबादी कतई न की जाए। इसी बरबादी का नतीजा है कि आज मनुष्य को पेयजल के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है।
इस संबंध में राजस्थान भू-जल विभाग के मुख्य अभियंता सूरज भान सिंह का कहना है कि अटल भू-जल योजना के तहत पिछले चार वर्ष में 15 हजार जल संचयन संरचनाएं बनाई गईं। इसके अलावा 30 हजार से अधिक किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर की ओर मोड़कर पानी खपत कम करने की कोशिश भी की गई। इससे 17 जिलों की 1129 ग्राम पंचायतों में से 189 ग्राम पंचायतों में जलस्तर बढ़ा है। 289 ग्राम पंचायतों में स्थिति में मामूली सुधार हुआ है। दूसरा तथ्य यह है कि राजस्थान की सकल जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 27 प्रतिशत है और कृषि में भू-जल की हिस्सेदारी 69 प्रतिशत यानी राजस्थान की कुल जीडीपी में भू-जल की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत है।
दुनिया में ऐसे कई देश हैं, जहां लोग पेयजल के लिए तरस रहे हैं। इनमें दक्षिण अफ्रीका की राजधानी केपटाउन प्रमुख है। केपटाउन को दुनिया का पहला जलविहीन शहर घोषित किया गया है। देश में स्थिति सुखद है, ऐसा नहीं है। केंद्रीय भू-जल बोर्ड व राजस्थान के भू-जल विभाग ने रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 2025 में पानी का संकट काफी विकराल रूप ले लेगा। राजस्थान के चार जिलों जयपुर, अजमेर, जोधपुर और जैसलमेर में पानी खत्म हो जाएगा। इसकी वजह है बारिश के पानी का भूमि में स्टोर ना हो पाना। जितना भू-जल जमा होता है, उससे ज्यादा की खपत होती है। मरू प्रदेश राजस्थान की प्यास कैसे बुझेगी, आज यह यक्ष प्रश्न हम सबके सामने खड़ा है। राजस्थान में हर साल बारिश और अन्य स्रोतों से जितना पानी रिचार्ज होता है उससे 5.49 बिलियन क्यूबिक मीटर ज्यादा पानी इस्तेमाल हो रहा है। यानी भविष्य की बचत को आज ही खर्च किया जा रहा है। तब तो यह नौबत आनी ही थी। मगर अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा। खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़ लगाकर इस नौबत को टाला जा सकता है।
