मुझे याद है आज से 20-25 साल पहले जब हम छोटे हुआ करते थे उम्र यही कोई पांच 7 साल के आसपास, तब घरों में फ्रिज बहुत ही दुर्लभ चीज हुआ करती थी। जिसके घर में फ्रिज होता था हम उसे बहुत अमीर आदमी मानते थे। हमारे घर में फ्रिज नहीं था तो हमें यह लगता था कि हम बहुत गरीब हैं। उस समय फ्रिज की आइसक्रीम खाने के लिए पूरा मोहल्ला किसी एक ही घर परिवार पर आश्रित रहता था। लेकिन ठंडा पानी पीने के लिए लगभग सभी घरों में घड़े हुआ करते थे। और आज जब लगभग सभी घरों में फ्रिज है तो मैं उन दिनों को याद करता हूं जब हम छत पर सोते थे और एक छोटी सी सुराही भी अपने साथ लेकर सोते थे कि अगर रात में पानी पीने की जरूरत हो तो उस सुराही से निकाल कर के पी सकें।
गर्मियों में फ्रिज का पानी पीना सब को अच्छा लगता है। परंतु फ्रिज का पानी पीने से कुछ देर के लिए तो हमें ठंडक मिलती है लेकिन बाद में बहुत ही जल्दी प्यास लगाती है और यह गर्मी भी प्रदान करता है। परंतु मटके का पानी जो प्यास बुझाता है उसका मुकाबला फ्रिज के पानी से नहीं किया जा सकता। मटके का पानी कई बीमारियों को दूर करता है जबकि दूसरी ओर फ्रिज का पानी कई बीमारियों को जन्म देता है। मटका शुद्ध मिट्टी से बना हुआ होता है। इसलिए मटके का पानी स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा होता है। मटके का पानी पीने से काफी देर तक प्यास नहीं लगती है जबकि फ्रिज का पानी पीने से उसी समय दुबारा पानी पीने का मन करता है। फ्रिज का पानी चाहे कितनी बार भी क्यों न पी लो परंतु प्यास बुझती ही नहीं है। मटके का पानी पीने से हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। मटके का पानी पीने से पेट में गैस नहीं बनती है और पाचन संबंधी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। सबसे बड़ी बात मटके का पानी पीने से हमारे मटका बनाने वाले भाइयों को रोजगार मिलता है।
मिट्टी के घड़े में पानी बाहरी तापमान के अनुसार ही ठंडा रहता है। अगर बाहरी तापमान में गर्मी ज्यादा है तो मिट्टी के घड़े का पानी ज्यादा ठंडा होगा और अगर बाहरी तापमान थोड़ा कम गर्म है तो पानी भी कम गर्म रहेगा। ऐसे में मिट्टी के घड़े में रखा पानी हमेशा शरीर के तापमान के अनुसार ही ठंडा रहता था और यही कारण है कि मिट्टी के घड़े का ठंडा पानी कभी भी नुकसान नहीं करता जबकि फ्रिज से निकाला हुआ पानी पीने से सर्दी जुकाम की संभावना बनी रहती है। मिट्टी के घड़े में पानी रखने से मिट्टी में उपस्थित बहुत से खनिज तत्व उस पानी में मिल जाते हैं और जब हम उस पानी को पीते हैं तो वह खनिज तत्व हमारे शरीर में पहुंचकर हमारे शरीर को पोषित करते हैं। जैसा हम जानते हैं कि मिट्टी में लगभग 80 प्रकार के खनिज तत्व विभिन्न मात्रा में मौजूद होते हैं। इन तत्वों में बहुत सारे तत्व हमारे शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। आज लोग फ्रिज का पानी पी रहे हैं लेकिन साथ ही मिनरल सप्लीमेंट भी ले रहे हैं। जबकि पहले किसी को मिनरल सप्लीमेंट लेने की जरूरत नहीं होती थी।
मिट्टी के घड़े में पानी रखने से पानी में मिट्टी की सोंधी खुशबू समा जाती थी। जब हम इस पानी को पीते थे तो प्यास बुझने के साथ ही हमें एक संतुष्टि भी मिलती थी जबकि फ्रिज का पानी पीने से ना तो प्यास ही बुझ पाती है और ना ही संतुष्टि मिलती है। मिट्टी का घड़ा हर साल बदला जाता था और कभी-कभी सीजन में दो या तीन घरों की जरूरत पड़ती थी। ऐसे में कुम्हार भाइयों को पूरे साल भर रोजगार मिला रहता था। आज हर घर में फ्रिज आ जाने से यह व्यवसाय पूरी तरीके से नष्ट हो चुका है। मिट्टी के घड़े में पानी फ्रिज के अपेक्षा ज्यादा शुद्ध रहता था साथ ही मिट्टी के घड़े से पानी हमेशा किसी अन्य बर्तन में लेकर पिया जाता था जिससे घड़ा भी शुद्ध रहता था लेकिन आज फ्रिज में रखी बोतल से सीधे पानी पिया जाता है। यह बोतलें परजीवी संक्रमण की दृष्टि से बहुत ही नुकसानदायक है साथ ही प्लास्टिक अपने आप में ही स्वास्थ के लिए बहुत नुकसानदायक है।
गर्मियों के मौसम में आज भी कई घरों में मिट्टी का बना घड़ा या मटका नजर आ जाता है। भारत में मटके में पानी रखने की परंपरा बहुत पुरानी है। कई तरह के वॉटर प्यूरीफायर और कंटेनर्स आने के बाद भी आज तक लोग मिट्टी का घड़ा अपने घरों में रखते हैं। इसके कई फायदे हैं और इसे स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा माना जाता है। अक्सर गर्मी लगने पर कई बार आप फ्रिज में रखा ठंडा पानी पी लेते हैं। ये आपके गले और शरीर पर बुरा प्रभाव डालता है। गले की कोशिकाओं का तापमान अचानक गिर जाता है और इसके कारण बहुत सी समस्यायें हो जाती हैं। गले की ग्रंथियों मे सूजन आ जाती है। जबकि आप अगर घड़े का पानी पीते हैं तो उसका कोई गलत प्रभाव नहीं पड़ता है। घड़े में रखे पानी में मौजूद विटामिन और मिनरल्स शरीर के ग्लूकोज के स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं। ये शरीर को ठंडक प्रदान करने का काम करते हैं। अगर आप नियमित तौर पर घड़े का पानी पीते हैं तो व्यक्ति का इम्युन सिस्टम मजबूत होता है। जबकि प्लास्टिक की बोतल में पानी रखने से उसमें अशुद्धियां इकट्ठी हो जाती हैं। मिट्टी के घड़े खरीदने के दोहरे फायदे हैं। इसलिए आज ही अपने घर में एक सुन्दर सा मटका ले आइये और स्वस्थ रहिये।
लेखिका:- प्रियंका सौरभ
बृहदेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर में स्थित एक प्राचीन मंदिर है, जिसका निर्माण राजा चोल द्वारा 1010 ईस्वी में करवाया गया था। बृहदेश्वर भगवान शिव को समर्पित एक प्रमुख मंदिर है जिसमें उनकी नृत्य की मुद्रा में मूर्ति स्थित है जिसको नटराज कहा जाता है। मंदिर को राजेश्वर मंदिर, राजराजेश्वरम और पेरिया कोविल के नाम से भी जाना जाता है। यह देश के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है और उस समय की द्रविड़ वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है।
बृहदेश्वर मंदिर की वास्तुकला
बृहदेश्वर मंदिर भारत का एक प्रमुख मंदिर है, इस मंदिर की वास्तुकला चमत्कार कर देने वाली है। 130,000 टन से अधिक ग्रेनाइट का उपयोग से बने इस मंदिर का प्रमुख आकर्षण 216 फीट लंबा टॉवर है जो मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनाया गया है। जब पर्यटक शहर में प्रवेश करते हैं तो दूर से ही इस टॉवर को देख सकते हैं। इस मंदिर में एक और हैरान कर देने वाली चीज नंदी बैल की प्रतिमा है जिसकी उंचाई लगभग दो मीटर, लंबाई में छह मीटर और चौड़ाई में ढाई मीटर है। इस प्रतिमा का बजन लगभग 20 टन है। प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य बाराथनट्यम के विभिन्न आसन मंदिर की ऊपरी मंजिल की बाहरी दीवारों पर हैं।
बृहदेश्वर मंदिर का इतिहास:
बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण चोल राजा, राजाराज प्रथम द्वारा भगवान शिव के प्रति अपनी शक्ति और भक्ति का प्रदर्शन करने के लिए किया गया था। मंदिर का निर्माण 1010 ईस्वी में पूरा हुआ। मंदिर को प्रसिद्ध वास्तुकार कुंजरा मल्लन राजा राजा पेरुंथाचन द्वारा डिजाइन किया गया था |
मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का एक अनुकरणीय नमूना है, जो इसकी विशाल विमान , विशाल आंगन, जटिल मूर्तियों और विस्तृत भित्तिचित्रों की विशेषता है। मुख्य विमान 216 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और पौराणिक कथाओं और धार्मिक प्रतीकों को दर्शाते हुए जटिल नक्काशी और मूर्तियों से सजाया गया है। मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिर, और प्रवेश द्वार भी हैं, जो सभी इसकी भव्यता में योगदान देते हैं।
मंदिर किलेबंद दीवारों के पीछे स्थित है, जो संभवतः 16वीं शताब्दी में निर्मित की गई थीं। विमानम 216 फीट (66 मीटर) ऊंचा है और यह दुनिया की सबसे ऊंची संरचना है। चट्टान के एक ही खंड से उकेरे गए मंदिर के कुंबम को उठाने के लिए लगभग 80 टन वजन की आवश्यकता होती है।
प्रवेश द्वार पर, नंदी (पवित्र बैल) की एक बड़ी मूर्ति है, जिसे एक ही चट्टान से तराश कर बनाया गया है और इसकी लंबाई लगभग 16 फीट (4.9 मीटर) और ऊंचाई 13 फीट (4.0 मीटर) है। मंदिर के निर्माण में ग्रेनाइट का उपयोग किया गया है,
मंदिर यूनेस्को का हिस्सा है
तंजावुर पेरिया कोविल चोलों की सबसे प्रभावशाली कृति है, तथा इसे तंजावुर में लगभग किसी भी स्थान से देखा जा सकता है, जिससे यह संभवतः विश्व का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसमें यह विशेषता है।
मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल "ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स" का एक हिस्सा है, जो प्राचीन चोल संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित है। जब मंदिर ने सितंबर 2010 में अपनी 1000वीं वर्षगांठ मनाई, तो इसने पूरे देश में व्यापक ध्यान आकर्षित किया। इंडिया पोस्ट ने इस अवसर को याद करते हुए एक रुपया डाक टिकट जारी किया, जिसमें 216 फुट ऊंचा राज गोपुरम दिखाया गया, जो शहर का सबसे प्रमुख स्थल है। RBI ने इस अवसर को मनाने के लिए पाँच रुपये का सिक्का जारी किया है। निकट भविष्य में तंजावुर पेरिया कोविल के 5 रुपये के सिक्के के समान डिज़ाइन वाला 1000 रुपये का स्मारक सिक्का जारी करने की योजना है। बैंक ने मंदिर की 50वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में अप्रैल 1954 में मंदिर की एक मनोरम छवि को दर्शाते हुए 1000 रुपये का करेंसी नोट जारी किया |
बृहदेश्वर मन्दिर का रहस्य
बृहदेश्वर मंदिर वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। मंदिर ऐसे बनाया गया है कि इसके शिखर यानि गुंबद की परछाई जमीन पर नहीं पड़ती है।
मंदिर के शिखर तक 80 टन वजनी पत्थर कैसे ले जाया गया, यह आज तक एक रहस्य बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि 1.6 किलोमीटर लम्बा एक रैंप बनाया गया था, जिसपर इंच दर इंच खिसकाते हुए इसे मंदिर के शिखर पर ले जाकर लगाया गया।
नंदी भगवान की अद्भुत मूर्ति
मंदिर के अंदर गोपुरम में स्थापित नंदी की विशाल मूर्ति भी एक अनोखा आश्चर्य है. नंदी की यह मूर्ति 16 फीट लम्बी, 8.5 फीट चौड़ी और 13 फीट ऊँची है जिसका वजन 20,000 किलो है। खास बात ये है कि मूर्ति को एक ही पत्थर को तराश कर बनाया गया है. ये भारत में नंदी की दूसरी सबसे बड़ी मूर्ति है।
सातवें चरण के मतदान के साथ ही लोकसभा चुनाव 2024 की मतदान प्रक्रिया संपन्न हो गई। शनिवार को मतदान संपन्न होने के बाद शाम करीब साढ़े छह बजे से एग्जिट पोल जारी हो गए। लोकसभा चुनाव के नतीजे 4 जून को घोषित किए जाएंगे। देश में किस पार्टी की सरकार बन सकती है? किस पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं? इसके लिए किस पोल में क्या अनुमान लगाए गए? विस्तार से जानिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को उम्मीद जताई कि लोगों ने एक बार फिर एनडीए सरकार को चुनने के लिए रिकॉर्ड मतों से मतदान किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अवसरवादी विपक्षी गठबंधन मतदाताओं के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहा और लोगों ने उनकी प्रतिगामी राजनीति को नकार दिया।
पीएम मोदी ने कहा कि उनकी सरकार जिस तरह से गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों, दलितों के जीवन में गुणात्मक बदलाव लाई है, उसे लोगों ने देखा है। उन्होंने लोकसभा चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने वाले मतदाताओं को धन्यवाद दिया और कहा कि लोगों की सक्रिय भागीदारी हमारे लोकतंत्र की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि मैं नारी शक्ति और युवा शक्ति की खास तौर पर तारीफ करना चाहूंगा क्योंकि इनकी मजबूत उपस्थिति उत्साहजनक संकेत है।
विपक्षी गठबंधन पर निशाना साधते हुए पीएम मोदी ने कहा, 'अवसरवादी इंडी गठबंधन मतदाताओं के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहा। वे जातिवादी, सांप्रदायिक और भ्रष्ट हैं। मुट्ठी भर परिवारों की रक्षा करने के उद्देश्य से बनाया गया विपक्षी गठबंधन राष्ट्र के लिए भविष्य की दृष्टि प्रस्तुत करने में विफल रहा।'
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चलिए जानते हैं कि इस साल अपरा एकादशी कब है और क्या है इस व्रत की पौराणिक कथा|
पौराणिक काल में एक राजा था जिसका नाम था महीध्वज| यह राजा बहुत ही नेक और न्यायप्रिय था| लेकिन इसका छोटा भाई वज्रध्व पापी, क्रूर,अधर्मी और अन्याय करने वाला था| छोटा भाई राजा से बहुत बैर रखता था| उसने साजिश रखकर राजा की हत्या कर दी और उसके शव को जंगल में एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया| अकाल मृत्यु होने के कारण राजा महीध्वज की आत्मा आजाद नहीं हो पाई और वो प्रेत बन गया| प्रेत बना राजा पीपल के नीच काफी उत्पात करता और लोगों को परेशान करता| एक बार धौम्य ऋषि वहां से गुजर रहे थे और उन्होंने पेड़ पर राजा महीध्वज का प्रेत देखा| राजा के प्रेत बनने की कहानी जानकर उन्होंने उसे पीपल के पेड़ से उतारा और परलोक विद्या का उपदेश दिया| ऋषि राजा को सलाह दी कि वो अपरा एकादशी का व्रत करें| इससे उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाएगी| राजा ने ऐसा ही किया और उसके पश्चात अपरा एकादशी के व्रत के चलते राजा दिव्य देह धारण करके स्वर्ग का भागी बना|
शास्त्रों में कहा गया है कि झूठ, निन्दा, क्रोध, धोखा देने वालों को नर्क में स्थान मिलता है| इसके साथ ही अनजाने में किए गए पाप भी नरक का भागी बनाते हैं| ऐसे में अपरा एकादशी का व्रत करने वाले लोग अनजाने में किए गए पापों से मुक्त हो जाते हैं और स्वर्ग के भागी बनते हैं| मान्यता है कि अपरा एकादशी पर व्रत करने पर गाय, सोना और जमीन का दान करने का पुण्य प्राप्त होता है| जो लोग इस व्रत को करते हैं उन्हें जीवन में सुख-समृद्धि, धन और धान्य से भरपूर घर-परिवार मिलता है|
अर्जुन बोले - "क्यों नहीं, यह व्यवस्था कर सकते हैं | अभी इसका प्रबंध करते हैं |"
यह सुनकर ब्राम्हण अर्जुन से कहने लगा "तो क्या मुझे किसी अन्य स्थान पर जाना होगा ?"
अर्जुन के कहा " महाराज अब तो लाचारी है |"
स्थिति समझकर ब्राम्हण बोलै- " महाराज! तो अब मैं चलूँ ?"
कर्ण बोलै- " महाराज ! आप तनिक रुकिये, मैं, आपकी व्यवस्था करता हूँ |"
संघर्ष, बलिदान और आँदोलन का एक लंबा सिलसिला
भारत को स्वाधीनता 15 अगस्त 1947 को मिल गई थी लेकिन भोपाल रियासत में अंग्रेजों और पाकिस्तान के समर्थक माने जाने वाले नवाब हमीदुल्ला खाँ का शासन बना रहा। इसके लिये भोपाल वासियों ने पुनः संघर्ष किया। इसे विलीनीकरण आँदोलन नाम मिला और अंततः स्वतंत्रता के लगभग पौने दो वर्ष बाद 1जून 1949 को भोपाल रियासत भी भारतीय गणतंत्र का अंग बन गई।
भोपाल में स्वाधीनता संघर्ष की कहानी बहुत लंबी है। भोपाल में नवाबी शासन की स्थापना धोखे और रक्तपात से हुई थी। मुक्ति संघर्ष की दास्तान भी नवाबी शासन शुरू हुई और भारतीय गणतंत्र में विलय के साथ समाप्त हुई। आरंभ में यह संघर्ष सशस्त्र रहा लेकिन 1857 की क्रांति की असफलता के बाद अहिंसक जन जागरण के माध्यम से निरन्तर हुआ। इस संघर्ष को दबाने के लिये भी नवाबी शासन ने सख्ती दिखाई। सीहोर, बरेली और उदयपुरा में गोलियाँ चलीं, आँदोलनकारी बलिदान हुये। जेल की प्रताड़नाओं से भी आँदोलन कारियों के प्राण गये। आरंभिक संघर्ष नागरिक सम्मान और असामाजिक तत्वों से मुक्ति के लिये था जो बाद में नवाबी से मुक्ति का विलीनीकरण आँदोलन बना। एक जून 1949 को भारतीय गणतंत्र का अंग बनने के बाद भोपाल रियासत क्षेत्र को एक पृथक और स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया गया। पृथक विधानसभा और राज्य सरकार बनी। यह स्थिति 1 नवम्बर 1957 तक रही। फिर मध्य प्राँत के कुछ भाग, विन्ध्य प्रदेश, महाकौशल, बुन्देलखण्ड का कुछ भाग और मध्यभारत आदि के साथ भोपाल राज्य मिला कर मध्यप्रदेश अस्तित्व में आया और भोपाल इसकी राजधानी बना।
इतिहास में जहाँ तक दृष्टि जाती है भोपाल परिक्षेत्र का उल्लेख मिलता है। यह क्षेत्र वैदिक काल में भी था और रामायण काल में भी। सुप्रसिद्ध पुरातात्व वेत्ता वाकणकर जी ने भोपाल नगर और इसके आसपास लाखों वर्ष पुराने मानव बसाहट के चिन्ह खोजे हैं। फिर भी मौर्यकाल, गुप्तकाल के भी चिन्ह हैं किन्तु अधिकांश निर्माण दसवी शताब्दी के आसपास परमार काल में हुआ। दिल्ली सल्तनत के लगातार हमलों से 1325 में परमारों का पतन हुआ तब भोपाल में गौंडवांना शासन प्रारंभ हुआ। गौंडवांना का मुख्यालय गिन्नौरगढ़ था तथा भोपाल नगर उपकेन्द्र। गौंडवांना की अंतिम रानी कमलापति थीं। 1720 में रानी का बलिदान हुआ दोस्त मोहम्मद ने अधिकार करके नवाबी कायम की। नवाबी से मुक्ति का संघर्ष सतत चला और सैकड़ों बलिदान हुये।
मुक्ति संघर्ष : नवाबीकाल के आरंभ से 1857 तक
भोपाल में मुक्ति का संघर्ष नवाबी काल के पहले दिन से आरंभ हुआ। यह माना गया था कि नबाब हमीदुल्ला खान ने धोखे से भोपाल पर अधिकार किया और गौंडवांना की अंतिम रानी कमलापति का बलिदान हुआ। इसलिये जनता में रोष था। 1723 में नवाबी स्थापित होने के साथ पहला संघर्ष बैरागढ़ मार्ग पर हुआ। इस संघर्ष में रक्तपात के कारण ही इस स्थान का नाम "लालघाटी" पड़ा। सभी संघर्ष कर्ताओं को बंदी बनाकर जहाँ मौत के घाट उतारा गया। उस स्थान का नाम "हलालपुर" पड़ा। भोपाल की मुक्ति का दूसरा बड़ा संघर्ष 1824 में हुआ। यह नरसिंहगढ़ के राजकुमार कुँअर चैनसिंह ने किया और उन्होंने आधे से अधिक क्षेत्र को मुक्त करा लिया था। अंततः उनका बलिदान हुआ। सीहोर में जिस स्थान पर उनका बलिदान हुआ वहाँ उनकी स्मृति में एक "छत्री" बनी हुई है।
इसके बाद बीच बीच में कुछ स्थानीय संघर्ष के विवरण मिलते हैं लेकिन बड़ा संघर्ष 1857 में हुआ । देश भर में आरंभ सशस्त्र क्रांति का प्रभाव भोपाल राज्य पर भी पड़ा। उन दिनों सीहोर में सैन्य छावनी हुआ करती थी। 1857 की क्रान्ति के लिये महू और इंदौर से संदेश आये और सैनिक महावीर कोठ, वली मोहम्मद और रमजूलाल ने सीहोर छावनी में क्राँति का झंडा बुलन्द किया। यह 8 जुलाई 1857 का दिन था। इन्हें आदिल मोहम्मद और फाजिल मोहम्मद का सहयोग मिला और समानांतर सरकार "सिपाही बहादुर" अस्तित्व में आ गई। इस सरकार का प्रतीक चिन्ह "निशाने महावीर" और "निशाने मोहम्मद" रखा गया। निशाने मोहम्मद हरे रंग में था तो निशाने महावीर भगवा रंग में। इस निशान को हिन्दू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना गया। इसकी चिंगारी दूर तक फैली । 14 जुलाई को शुजाअत खाँ ने बैरसिया में, गढ़ी अंबापानी में हटे सिंह और उनकी बेटी हंसा ने और छीपानेर में दौलत सिंह ने स्वाधीनता का ध्वज फहराया। समय के साथ अपनी क्रूरता और धोखे से सफलता पाने केलिये इतिहास प्रसिद्ध अंग्रेज कमांडर ह्यूरोज के नेतृत्व में दिसम्बर 1957 के अंतिम सप्ताह में अतिरिक्त कुमुक महू आई, वहाँ से इंदौर और देवास आष्टा होकर सीहोर पहुँचा। सभी क्राँतिकारियों का क्रूरता पूर्ण दमन किया गया। 14 जनवरी 1858 को सीहोर छावनी के 356 सैनिकों को पेड़ों से लटका कर सामूहिक फाँसी दी गई। बैरसिया, रायसेन, बेगमगंज और छीपानेर में भी क्रूरता से क्रान्ति का दमन हुआ। किसी को भी जीवित नहीं छोड़ा गया। इसका विवरण इतिहास के पन्नों में सजीव है ।
जन जागरण और अहिंसक आँदोलन
1857 की क्रांति के पूर्व का संघर्ष सशस्त्र था किंतु सीमित। लेकिन 1857 की क्रान्ति में हुई जन भागीदारी से देश में सामाजिक जागृति का वातावरण बना और पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना का संचार हुआ। जन आँदोलनों का जो सिलसिला चला वह स्वाधीनता के साथ ही रुका। भोपाल रियासत में आरंभ हुये इन आँदोलनों में आर्यसमाज और उसके संतों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 1890 में मित्र सभा का गठन हुआ। 1905 तक इसका विस्तार भोपाल नगर सहित पूरी रियासत क्षेत्र में हुआ। और 1915 में मित्रसभा ने ही आर्यसमाज का आकार ग्रहण किया। भोपाल क्षेत्र में हुये आरंभिक जन आदोलनों में परदे के पीछे रहकर आर्यसमाज के लोगों की भूमिका महत्वपूर्ण रही। 1921 में गाँधीजी के आह्वान पर असहयोग आँदोलन आरंभ हुआ। बच्चों की प्रभात फेरी के रूप में इस आँदोलन के समर्थन में पहली गतिविधि 1922 में देखी गई। कुछ नाम उभरे। परदे के पीछे लक्ष्मण भैया, ठाकुर लालसिंह और लक्ष्मीनारायण सिंहल का एवं भोपाल में बच्चों के एकत्रीकरण के लिये एक दस ग्यारह वर्षीय बालक उद्धवदास का नाम सामने आया। भोपाल के अतिरिक्त सीहोर, रायसेन बेगमगंज आदि में भी ऐसी प्रभात फेरियाँ निकली। इसके बाद अनेक सामाजिक संगठन सामने आये। कुछ समाचार पत्रों का भी प्रकाशन आरंभ हुये जिससे जन चेतना जागृत हुई। इस जन चेतना से जो आँदोलन आरंभ हुये, नवाब प्रशासन द्वारा उनका दमन भी उतना ही क्रूरता से हुआ। भोपाल की विभिन्न समस्याओं के प्रति गाँधीजी का ध्यान भी आकर्षित कराया गया। उनके हस्तक्षेप से भोपाल नवाब ने ईशनिंदा कानून रद्द कर दिया एवं कुछ नागरिक सुविधाओं में वृद्धि भी कर दी।
1931 के बाद भारत विभाजन और संभावित नये देश पाकिस्तान की चर्चा होने लगी। भोपाल नबाब हमीदुल्ला खान का सद्भाव पाकिस्तान अभियान के प्रति था। इसका कारण उनका अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़ा होना था। इस विश्वविद्यालय के अनेक पूर्व छात्र पाकिस्तान अभियान से जुड़े थे।
समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ा। भोपाल रियासत में हिन्दु महासभा और प्रजा मंडल जैसे राजनैतिक दल अस्तित्व में आये। प्रभामंडल को काँग्रेस से संबंधित माना जाता था। अंततः भारत की स्वतंत्रता सुनिश्चित हो गई। भोपाल नवाब ने दूरदर्शिता से हिन्दु महासभा और प्रजा मंडल दोनों को विश्वास में लेकर अप्रैल 1947 में एक सर्वदलीय मंत्रीमंडल बना लिया। नवाब हमीदुल्ला खान ने जन समस्याओं से संबंधित निर्णय लेने के अधिकार तो इस मंत्रिमंडल को दिये लेकिन केंद्रीय शक्ति और नीतिगत निर्णय लेने के अधिकार अपने पास रखे। इसके साथ नवाब हमीदुल्ला खान ने अपनी रियासत को पाकिस्तान से संबंध रखने का संकेत भी दिया। इसके लिये उन्होंने कराँची क्षेत्र में भूमि क्रय की और अपनी एक बेटी आबिदा सुल्तान को पाकिस्तान भेज दिया। जिनके पुत्र शहरयार खान आगे चलकर पाकिस्तान के विदेश सचिव बने थे।
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता की इस खुशी में भोपाल में भी प्रभात फेरी निकाली गई। लेकिन किसी भवन से नवाब का झंडा न उतरा। उस समय तनाव फैल गया जब भोपाल के जुमेराती और बैरागढ़ स्थित पोस्ट ऑफिस पर वहाँ के कर्मचारियों ने तिरंगा फहराया तो उसे फाड़ दिया गया। विभाजन की त्रासदी, हिंसा और शरणार्थी समस्या में केन्द्र सरकार उलझ गई। इसका लाभ भोपाल सहित कुछ रियासतों ने उठाया उन्होंने अपनी रियासतों को भारतीय गणतंत्र में विलीन करने में हीलाहवाली करने लगीं। भोपाल नवाब भी उनमें एक थे। अपनी रियासत को भारतीय गणतंत्र में विलीन करने के विषय पर नबाब हमीदुल्ला खान की प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल और अधिकारी वीपी मेनन से कई दौर की बातचीत चली पर नतीजा नहीं निकला। इससे सर्वदलीय मंत्रिमंडल में हिन्दु महासभा के प्रतिनिधि मास्टर भैरों प्रसाद सक्सेना ने त्यागपत्र देकर आँदोलन की घोषणा कर दी। प्रजा मंडल निर्देश की प्रतीक्षा कर रही थी। प्रजा मंडल की इस असमंजस का लाभ भोपाल नवाब ने उठाया और मंत्रिमंडल का पुनर्गठन करके प्रजा मंडल के सदस्यों की संख्या बढ़ा दी। मंत्रीमंडल में प्रजा मंडल की इस सहभागिता पर प्रजा मंडल की कार्यकारिणी के भीतर मतभेद उभरे। मई 1948 तीसरे सप्ताह में प्रजा मंडल ने समस्या का समाधान निकालने एक बैठक बुलाई गई। इस चार दिवसीय बैठक का समापन 24 मई को हुआ लेकिन कोई सहमति न बन सकी। जून 1948 में एक नया समाचार पत्र नई राह का प्रकाशन आरंभ हुआ जिसके संपादक भाई रतन कुमार गुप्ता थे। इस समाचार पत्र में भोपाल नवाब और मंत्रीमंडल में शामिल प्रजा मंडल के सदस्यों के बीच हुये "कथित गुप्त समझौते" का विवरण था। इससे वातावरण बदल गया और प्रजा मंडल में नवाब समर्थक समूह अलग थलग पड़ गया लेकिन वे मंत्रिमंडल में बने रहे। उन्होंने नवाब के समर्थन में सभा सम्मेलन भी आरंभ कर दिये। जुलाई अगस्त दो माह पूरी रियासत में सर्वदलीय बैठकों का सिलसिला चला। इसकी पहल भाई उद्धवदास मेहता और ठाकुर लाल सिंह ने की । इनका साथ लक्ष्मीनारायण मुखरैया, रामचरण राय, रतन कुमार गुप्ता, शिव नारायण वैद्य, अक्षय कुमार जैन, मथुरा बाबू आदि नेताओं ने दिया और पूरी रियासत की यात्रा की । हर गाँव कस्बे में स्थानीय नेताओं को जोड़ा। इससे पूरी रियासत जन आँदोलन का वातावरण बन गया। पूरी रियासत में बैठकों और आँदोलन की टीमें बनाकर योजनानुसार सितम्बर 1948 में ठाकुर लालसिंह ने इछावर में, भाई उद्धवदास मेहता, लक्ष्मीनारायण मुखरैया, रतन कुमार गुप्ता शिवनारारण वैद्य ने भोपाल में सभाये करके आँदोलन का उद्घोष कर दिया। विभिन्न स्थानों पर सभाओं का यह सिलसिला दिसम्बर 1948 तक चला। जगह-जगह प्रदर्शन और लाठीचार्ज हुये। लोगों को पकड़ पकड़ कर जंगलों में छोड़ा जाने लगा। अंत में इस सर्वदलीय सभा ने 6 जनवरी 1949 से पूरी रियासत में बाजारबंद और प्रदर्शन की घोषणा कर दी। इससे नवीब प्रशासन ने दमन और बढ़ाया। जनवरी के आरंभ से ही पूरी रियासत में गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया। पूरी रियासत के सभी नेता जेल में डाल दिये गये। 6 जनवरी को भोपाल के यूनानी शफाखाना मैदान में गिरफ्तार होने वाले नेताओं में डॉ. शंकर दयाल शर्मा भी थे जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने। 6 जनवरी 1949 को ही बरेली में गोली चली। इसमें राम प्रसाद आयु 28 वर्ष और जुगराज आयु 35 का बलिदान हुआ। लाठी और गोली से सैकड़ों लोग घायल हुये। भोपाल में इस दमन आतंक और गिरफ्तारियों के बादद अधिकांश पुरुष या तो जेल में डाल दिये गये या जंगल में छोड़ दिया गया तब महिलाओं ने मोर्चा संभाला । 11 जनवरी 1949 को चौक से लेकर जुमेराती तक पूरे लोहा बाजार की सड़क महिलाओं से पट गई थी । लाठीचार्ज से तितर-बितर किया गया । जो नहीं गईं उन महिलाओं को ट्रक में भरकर जंगल छोड़ दिया गया । सीहोर के लाठीचार्ज में एक व्यक्ति बुरी तरह घायल हुआ जिसका बाद में बलिदान हुआ ।
14 जनवरी 1949 को उदयपुरा के समीप बौरास में गोली चली । इसमें छोटेलाल आयु 16 वर्ष, धनसिंह आयु 25 वर्ष, मंगल सिंह आयु वर्ष 30 वर्ष, विशाल सिंह आयु 25 वर्ष और कालूराम आयु 45 वर्ष का बलिदान हुआ।
भोपाल नबाब पुलिस ने दमन करने के सारे रिकार्ड तोड़ दिये । जिन नेताओं को बंदी बनाया गया उनके घरों में तोड़फोड़ की। इस कार्यवाही की ओर पूरे देश का ध्यान गया। हिन्दुस्तान टाइम्स के 11 जनवरी के अंक में 6 जनवरी को पुलिस की दमन कार्यवाही, नेशनल हैराल्ड के 15 जनवरी अंक में 11 जनवरी को महिला सत्याग्रहियों के दमन की विस्तृत रिपोर्ट छपी । बौरास गोलीकांड का विवरण लगभग सभी राष्ट्रीय समाचार पत्रों में आया ।
अंततः भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में वी पी मेनन 24 जनवरी 1949 को भोपाल आये । वे तीन दिन रुके और उनकी सभी पक्षों से बात हुई । इनमें भोपाल नवाब, मंत्रीमंडल के सदस्यों और सभी राजनैतिक दल के प्रतिनिधियों से अलग अलग बातचीत की । मेनन जी इस यात्रा के बाद 28 जनवरी 1949 को सभी दलों के प्रमुखों ने आँदोलन समाप्त करने की घोषणा कर दी। 29 जनवरी 1949 को मंत्रिमंडल ने त्यागपत्र दे दिया । 3 से 6 फरवरी के बीच सभी राजनीतिक बंदी रिहा कर दिये गये और भूमिगत नेता लौटने लगे ।
इसके बाद भोपाल नवाब और भारत सरकार के बीच विभिन्न स्तर की बातचीत का सिलसिला चला। अप्रैल 1949 में शर्तें तय हुई और एक माह तक समझौता गुप्त रखने की सहमति भी बनी। समझौते के अनुसार 31 मई 1949 तक सभी शासकीय भवनों और रियासत के सार्वजनिक स्थलों पर नवाब का झंडा लहराता रहा। 1 जून 1949 को सूर्योदय के साथ भारतीय तिरंगा लहरा दिया गया और भोपाल रियासत भारतीय गणतंत्र का अंग बन गई।
लेखक:- रमेश शर्मा
