इस मंदिर को सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। यह मंदिर अपनी महिमा और गरिमा के लिए विख्यात है। वैसे तो यहाँ वर्ष भर श्रधालुओं की भीड़ उमड़ती है परन्तु रामनवमी और शिवरात्रि के त्यौहार में प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के आते है | यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है।
रहस्यमय मंदिर माँ मुंडेश्वरी धाम का आश्चर्यजनक बात यह है की यहां बिना रक्त बहाये ही बकरे की बलि चढ़ जाती है मान्यता है कि यहाँ आप माता की मूर्ति पर अधिक देर तक दृष्टि नहीं डाल सकते |
शिक्षा वही जो बच्चों के मन को छू जाए,
हृदय के मंदिर में ज्ञान की सच्ची ज्योति जलाए।
नई शिक्षा नीति से बच्चों के लिए यह होगा सरल,
तब सफलता गाएगी तुम्हारे लिए सुखद-सा कल।
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के कुशल नेतृत्व में छत्तीसगढ़ सरकार ने सुशासन और समग्र विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करते हुए कार्य प्रारंभ कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा निर्धारित गारंटियों को साकार करते हुए, राज्य के लोगों की खुशहाली और समृद्धि के सपनों को साकार करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। मुख्यमंत्री श्री साय का यह दृढ़ विश्वास है कि शिक्षा ही विकास का मूलमंत्र है, और इसी कारण उन्होंने राज्य में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए विभिन्न योजनाओं और पहलों की शुरुआत की है, ताकि छत्तीसगढ़ के बच्चे आने वाले जीवन में सफल और सक्षम बन सकें। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने "सबका साथ, सबका विकास" के ध्येय वाक्य के माध्यम से एक विकसित भारत बनाने का जो लक्ष्य तय किया है, उस दिशा में राज्य सरकार पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, मुख्यमंत्री श्री साय का स्पष्ट दृष्टिकोण है कि हम छत्तीसगढ़ को एक शिक्षित, सशक्त और विकसित राज्य के रूप में आगे बढ़ाएं, ताकि हर नागरिक को एक उज्जवल भविष्य मिल सके और राज्य समग्र विकास की राह पर आगे बढ़े।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रस्तुत "प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया" योजना, जो एक विकसित भारत की परिकल्पना पर आधारित है, इसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य के 211 स्कूलों को शामिल किया गया है। इस योजना के तहत प्रत्येक स्कूल को 2-2 करोड़ रुपये की राशि आबंटित की जाएगी, ताकि इन स्कूलों को बड़े शहरों और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के आदर्श विद्यालयों के रूप में विकसित किया जा सके। छत्तीसगढ़ में चयनित 211 स्कूलों में से 193 स्कूल एलीमेंट्री (प्राथमिक) स्तर पर हैं, जबकि 18 स्कूल सेकेंडरी (माध्यमिक) स्तर पर हैं। इन विद्यालयों में छात्रों को अत्याधुनिक सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (आईसीटी) और डिजिटल कक्षा के माध्यम से शिक्षा प्रदान की जाएगी, ताकि वे वैश्विक मानकों के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसके अतिरिक्त, इन स्कूलों में विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा, स्थानीय उद्योगों के साथ इंटर्नशिप और उद्यमिता के अवसर भी प्रदान किए जाएंगे, ताकि वे रोजगार की दिशा में आत्मनिर्भर बन सकें। प्रधानमंत्री श्री मोदी की यह योजना छत्तीसगढ़ राज्य में शिक्षा के स्तर को सुधारने के साथ-साथ युवा पीढ़ी को बेहतर अवसर प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है। पीएम श्री योजना के अगले चरण में, राज्य की विशेष आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप और अधिक स्कूलों को इस योजना में शामिल किया जाएगा, ताकि राज्य भर में उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा का प्रसार हो सके।
इसके अलावा, नई शिक्षा नीति 2020 के तहत, कक्षा 8वीं तक के बच्चों को मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं में शिक्षा दी जाएगी। इस पहल के तहत, केंद्र सरकार सरकारी चैनलों का संचालन करेगी, जिनमें छत्तीसगढ़ी, हल्बी, गोंडी, भतरी, सरगुजिया जैसी स्थानीय भाषाओं को भी शामिल किया जाएगा, ताकि बच्चों को अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त हो सके और वे अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जुड़ी रहें। नई शिक्षा नीति में कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा को प्रमुखता दी गई है, और कक्षा 6वीं से 12वीं तक के सभी विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों जैसे भाषा, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कला, खेल, चित्रकला, संगीत और नृत्य का अध्ययन कराया जाएगा। इसके अतिरिक्त, छात्रों को 10 दिनों का शैक्षिक भ्रमण भी कराया जाएगा, ताकि वे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ जीवन के वास्तविक अनुभवों से भी अवगत हो सकें और एक समग्र दृष्टिकोण से विकास कर सकें। इस तरह, नई शिक्षा नीति राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में सुधार और छात्रों के समग्र विकास के लिए एक प्रभावी कदम है।
प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए 33 हजार शिक्षकों की भर्ती अगले सत्र में की जाएगी। समग्र शिक्षा के अंतर्गत 1086 नये पदों का सृजन किया जाएगा। स्कूलों के रखरखाव और अधोसंरचना विकास के लिए बजट में 265 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सूरजपुर एवं गरियाबंद में जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना के साथ ही जिला कोण्डागांव, सुकमा एवं बलरामपुर के विकासखण्ड कुसमी के बाइट को उन्नत करते हुए जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान बनाया जाएगा।

छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने शिक्षा के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम उठाए हैं, जिनसे राज्य के विद्यार्थियों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके। प्रदेश के 25,000 स्कूलों में पहली कक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक के लिए एक-एक इंग्लिश मीडियम सेक्शन स्थापित किया जाएगा, जिससे छात्रों को अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिलेगा और वे वैश्विक मानकों से मेल खाते हुए एक सशक्त और प्रतिस्पर्धी भविष्य की ओर अग्रसर हो सकेंगे। इसके अलावा, प्रदेश के स्कूलों में स्मार्ट क्लासेस की शुरुआत की जाएगी, जिनमें इंटरनेट और प्रोजेक्टर की सहायता से डिजिटल शिक्षा प्रदान की जाएगी, ताकि विद्यार्थियों को अत्याधुनिक तकनीकी माध्यमों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। इसके साथ ही, बच्चों की उपस्थिति, अध्यापकों द्वारा पढ़ाई का स्तर और शैक्षिक मूल्यांकन की नियमित और त्वरित निगरानी के लिए एक केंद्रीयकृत "विद्या समीक्षा केंद्र" स्थापित किया जाएगा, जो शिक्षा के मानकों को सुधारने और छात्रों के प्रदर्शन को ट्रैक करने में मदद करेगा।
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प्रदेश सरकार ने "सरस्वती सायकल योजना" के तहत अब 9वीं कक्षा की सभी छात्राओं को नि:शुल्क सायकल देने का निर्णय लिया है, ताकि उन्हें स्कूल जाने में सुविधा हो और वे बेहतर शिक्षा प्राप्त कर सकें। इसी तरह, राज्य सरकार ने छात्रवृत्ति योजनाओं में सुधार करते हुए, अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के लिए मिलने वाली छात्रवृत्ति का नाम "संत शिरोमणि गुरू घासीदास" के नाम पर और अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग की छात्रवृत्ति का नाम "वीर गुण्डाधुर" के नाम पर रखने का निर्णय लिया है, ताकि इन महान हस्तियों के योगदान को सम्मानित किया जा सके।
इसके साथ ही, प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना की तर्ज पर राज्य सरकार ने "न्यौता भोजन" योजना शुरू की है, जिसके तहत स्कूलों में बच्चों को गर्म, पका हुआ भोजन प्रदान किया जाएगा। यह योजना सामुदायिक भागीदारी पर आधारित है और इसका उद्देश्य बच्चों के पोषण स्तर में सुधार करना है। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने 21 फरवरी को अपने जन्मदिन के अवसर पर बगिया के बालक आश्रम शाला में बच्चों के बीच "न्योता भोज" आयोजित किया, जिससे इस योजना की अहमियत और सामुदायिक सहयोग को बढ़ावा मिला। यह पहल प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की "पोषण शक्ति" योजना से प्रेरित है, जो सामुदायिक सहयोग से बच्चों के पोषण को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए काम कर रही है।
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राज्य सरकार ने बोर्ड परीक्षा देने वाले विद्यार्थियों के हित में एक बड़ा निर्णय लिया है, जिसके तहत एक शैक्षिक सत्र में दो बार बोर्ड परीक्षा आयोजित की जाएगी। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल रायपुर द्वारा मार्च माह में पहली मुख्य परीक्षा आयोजित की जाएगी और दूसरी मुख्य परीक्षा जून या जुलाई में आयोजित की जाएगी, जिससे विद्यार्थियों को बेहतर अवसर मिलेगा और वे अपनी परीक्षा की तैयारी को बेहतर तरीके से कर सकेंगे। साथ ही, स्वामी आत्मानंद स्कूलों का संचालन अब शिक्षा विभाग द्वारा किया जाएगा, ताकि इन स्कूलों के संचालन में अधिक सुधार हो सके।
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नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू करने की दिशा में छत्तीसगढ़ राज्य के उच्च शिक्षा विभाग ने बड़ा कदम उठाया है। इसके तहत, राज्य के विद्यार्थियों को कॉलेज आने-जाने के लिए मासिक यात्रा भत्ता दिया जाएगा, जिसका लाभ तीन लाख से अधिक विद्यार्थियों को होगा। प्रत्येक विद्यार्थी को 6000 रुपये प्रतिवर्ष डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से सीधे उनके बैंक खाते में भेजे जाएंगे। इसके अलावा, सरकार विद्यार्थियों को नियमित अध्ययन के साथ-साथ विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे- यूपीएससी, पीएससी, सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा, और अन्य राष्ट्रीय पात्रता परीक्षाओं की कोचिंग की व्यवस्था भी करेगी। छत्तीसगढ़ सरकार ने शासकीय दूधाधारी श्री राजेश्री महंत वैष्णव दास स्नातकोत्तर संस्कृत महाविद्यालय रायपुर को विश्वविद्यालय में अपग्रेड करने का संकल्प लिया है, जिससे प्रदेश में उच्च शिक्षा के स्तर को और ऊंचा किया जा सके।

प्रदेश के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में शिक्षकों की कमी को दूर करने के लिए 4200 से अधिक रिक्त पदों पर भर्ती की जाएगी। इसके अलावा, राज्य के 15 शासकीय महाविद्यालयों में नए स्नातक विषयों का संचालन और 23 शासकीय महाविद्यालयों में नए स्नातकोत्तर विषयों की शुरुआत की जाएगी। प्रदेश के 12 महाविद्यालयों के भवनों का निर्माण और 9 महाविद्यालयों में अतिरिक्त कक्षों का निर्माण किया जाएगा, ताकि छात्रों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। शासकीय महाविद्यालय दुर्गकोंदल (जिला कांकेर) और भोपालपट्टनम (जिला बीजापुर) में छात्रावास भवन का निर्माण किया जाएगा, साथ ही 50 शासकीय महाविद्यालयों में शौचालयों का निर्माण भी किया जाएगा। प्रदेश के विश्वविद्यालयों को वार्षिक अनुदान राशि में वृद्धि की गई है, ताकि उच्च शिक्षा के संस्थानों को और बेहतर तरीके से चलाया जा सके और विद्यार्थियों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दी जा सके।
हर साल विजयदशमी में रावण वध देखते हैं तो मन में ऐसा होता है कि समाज में घूमने वाले रावण कम होंगे। लेकिन ये तो खूनबीज के समान है। रावणों की संख्या में बेहिसाब खण्ड हो रहा है। एक केट सौ पैदा हो रहे हैं। वो तो फिर भी विद्वान था, नीतिपाल था, भगवान शिव का उपासक था। सीता का हरण किया, लेकिन बुरी नजर से नहीं देखा। विवाह का अनुरोध किया गया परंतु विवाह नहीं किया गया। एक गलत की तुलना में उसे सजाए गए चारदीवारी पाद, मगर आज के दौर में हजारों अपराध करने के बाद भी रावण सरेआम सड़कों पर घूम रहे हैं, कोई लाज नहीं, शर्म नहीं।
दशहरा पर रावण दहन का चलन बन गया है। लोग इससे सबक नहीं लेते। रावण दहन की संख्या बढ़ाने से लाभ नहीं होगा। लोग इसे मनोरंजन के साधन के तौर पर लेते हैं। पिछले वर्ष के गुट हर ग्लोब देश के विभिन्न भागों में तीन गुणा अधिक रावण के पुतले मिले हैं। इसके बावजूद अपराध में कोई कमी आएगी, इसके बढ़ते आंकड़े देखने पर ऐसा नहीं लगता। हमें अपने धार्मिक ग्रंथों से प्रेरणा लेनी चाहिए। रावण दहन के साथ दुर्गुणों का त्याग करना चाहिए। रावण दहन का अर्थ बुराइयों का अंत दर्शाता है। हमें पुतिन की जगह बुरे लोगों को छोड़ने का संकल्प लेना चाहिए। समाज में अपराध, बुराई के रावण लगातार बढ़ रहे हैं। रिश्ते का ख़ून इसमें सबसे ज़्यादा हो रहा है। माँ, बाप, भाई, बहन, बच्चे तक की हत्या की जा रही है। गुमनाम के मामले भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
रावण सर्वज्ञ था, उसे हर वस्तु का पता चला क्योंकि वह विद्या तंत्र से परिचित था। रावण ने केवल अपनी शक्ति स्वयं को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने में सीता का अपहरण किया। अपनी छाया तक उस पर नहीं छापी। आज का रावण दुष्ट है, जाहिल है, वैश्याचारी है, नशे के लिए पत्नी को जलाता है, शादी की नियत से महिलाओं का विवाह करता है। इस कुकृत्य में शामिल हुआ तो रेप भी। धर्म के नाम पर हथियार बांधे जाते हैं, लड़ाई की शक्ति शामिल नहीं होती, इसलिए दूसरे के कंधे पर बंदूक लहराई जाती है। दुश्मन से उसका कोई वास्ता नहीं है, पराई नारी के प्रति उसके मन में कोई श्रद्धा नहीं है। आज का रावण रावण से रावण है, खतरनाक है, सर्वसहयोग है। वह महलों में रहती है। गली-कूचों में रहता है। गांव में भी है. शहर में भी है. वह गंवार भी है। पढ़ें-लिखा भी है. लेकिन राम उनके धनी नहीं हैं। बस एक दिन ऐसा ही है कि समाज से रावणपन निकलेगा खुद-ब-खुद एक दिन।
रावण की मृत्यु का मुख्य कारण विनाश था, जो उसके अंतिम विनाश का कारण था। इतिहास इस बात का गवाह है कि उचक्के पुरुष (और महिलाएं भी) कभी सुखी नहीं रहते। विपरीत लिंग के प्रति उनके जुनून के कारण कई शक्तिशाली राजाओं ने अपना राज्य खो दिया। रावण ने सीता की शारीरिक संरचना के बारे में सुना, फिर उस पर विचार करना शुरू कर दिया और अंततः गलत इच्छा पर काम करना शुरू कर दिया। अंत में रावण ही रावण की मृत्यु का मुख्य कारण बना। रावण महाज्ञानी था, लेकिन उसके अपमान के कारण उसका सर्वनाश हो गया। रावण परम शिवभक्त भी था। तपस्या के बल पर वह कई शक्तियां अर्जित करती है। रावण की तरह उसके अन्य भाई और पुत्र भी बलशाली थे। लेकिन अच्छे आचरण के कारण उनके लगातार अत्याचार बढ़ते जा रहे थे जिसके बाद भगवान ने राम का अवतार लिया और रावण का वध किया। रामायण में रावण को अधर्मी बताया गया है क्योंकि रावण ज्ञानी के बाद भी किसी धर्म का पालन नहीं करता था। यही उनका सबसे बड़ा अवगुण था। जब युद्ध में रावण की मृत्यु हुई तो मंदोदरी विलाप करने वाले थे, अनेक यज्ञों का विलोप करने वाले, धर्म मित्र को तोड़ने वाले, देव-असुर और शिक्षाओं की कन्याओं का जहां-तहां से हरण करने वाले, आज तू अपने इन में पाप कर्मों के कारण ही वध प्राप्त होता है।
रावण के जीवन से हमें जो सीखना चाहिए वह यह है कि हमें कभी भी अपने दिल में विश्वास नहीं जगाना चाहिए। किसी भी प्रकार की इच्छाओं के लिए हमें लगातार अपने हृदय की जांच करानी चाहिए। अगर है तो उसे डब्बे में दबाएँ। क्योंकि अगर अपवित्र छोड़ दिया गया है तो यह हमें पूरी तरह से नष्ट कर देगा। सब कुछ ध्यान से शुरू होता है। आज के लोग तकनीकी विशेषज्ञ और समझदार हो गए हैं कि बोस को पता चल गया है कि बुराई और अच्छाई क्या है। लेकिन फिर भी दुनिया में बुरीइयाँ बहुतायत ही जा रही हैं। जो संदेश देने के लिए रावण दहन की प्रथा शुरू की गई थी, वो संदेश तो आज कोई लेना ही नहीं चाहता।
लेखिका:-प्रियंका सौरभ
भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक एवं शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट होती है इसलिए दशहरे का उत्सव मनाया जाता है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में फसल उत्पादक अनाज घर लाता है तो उसका उल्लास और महंगाई का परिवार नहीं रहता। इस सुसमाचार के लिए वह भगवान की प्रार्थना को दर्शाता है और उन्हें प्रणाम करने के लिए प्रणाम करता है। भारत वर्ष में यह त्यौहार विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है।
दशहरा शब्द हिंदी के दो शब्द और हारा से मिलकर बने हैं। जहां दस गणित के अंक दस (10) और हार शब्द हार का सूचक है। इसलिए यदि इन दो शब्दों को जोड़ दिया जाए तो दशहरा बनता है। उस दिन का प्रतीक है जब दस्यु सिर वाले दुष्ट रावण का भगवान राम ने वध किया था। दशहरा या विजयदशमी पर्व को भगवान राम की विजय के रूप में मनाया जाता है या दुर्गा पूजा के रूप में मनाया जाता है। दोनों ही सिद्धांतों में यह शक्ति-पूजा का पर्व है। शस्त्र पूजन की तिथि यह है। हर्ष और उल्लास और विजय का पर्व है।
दशहरा भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसी दिन भगवान राम ने बुराई के प्रतीक दस सिर वाले रावण का संहार किया था तो देवताओं को स्वर्ग पर अधिकार दिलाने वाले महिषासुर का 10 दिन तक भयंकर युद्ध किया था जिसके बाद मां दुर्गा ने वध किया था। इसीलिये नामांकित विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। इसे सत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन लोग नए कलाकार होते हैं। इस दिन शस्त्र-पूजा की जाती है। इस दिन जगह-जगह जगहें दिखती हैं। बांग्लादेश का समापन होता है। रावण का विशालकाय प्राणी उसे जलाता है।
कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत में मनाया जाता है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की सड़कों पर रोशनी से सजावट की जाती है और हाथों का शृंगार कर पूरे शहर में भव्य जुलूस निकाला जाता है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालाओं से दुल्हन की तरह मनाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग संगीत, टॉर्च, लाइट के साथ नृत्य और प्रशिक्षकों का आनंद लेते हैं। पंजाब में दशहरा के नौ दिन के व्रत के अवसर मिलते हैं। इस दौरान यहां रेस्तरां का स्वागत पारंपरिक मिठाई और उपहार दिए गए। यहां भी रावण-दहन के आयोजन होते हैं और मैदानों में भी आयोजित होते हैं।
हिमाचल प्रदेश में मिनिस्ट्री का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। अन्य जगहों पर भी इस उत्सव की तैयारी दस दिन या एक सप्ताह पहले शुरू होती है। स्त्रियां और पुरुष सभी सुंदर वस्त्रों से सजाए गए ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि वाद्ययंत्रों को लेकर बाहरी बाजार हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूम धाम से जुलूस निकालकर पूजा करते हैं। देवताओं की संपत्ति को बहुत ही आकर्षक तरीके से अपनाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षण नृत्य नाटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार संबंध नगर के मुख्य स्मारक से होते हुए नगर की स्थापना की जाती है और संबंध नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ किया जाता है। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है।
महाराष्ट्र में नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित किया जाता है जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती का पूजन किया जाता है। इस दिन स्कूल जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के शोकों की पूजा करते हैं। किसी भी वस्तु को आरंभ करने के लिए विशेषकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन काफी शुभ माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश नए एवं घर का शुभ अभिषेक करते हैं। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलांगन के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है।
छत्तीसगढ़ के वन्यजीवों में दशहरे को मां दंतेश्वरी की आराधना का पर्व मनाया जाता है। दंतेश्वरी माता अरुणाचल प्रदेश की आराध्य देवी हैं जो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह पर्व पूरे 75 दिनों तक चलता है। यहां दशहरा श्रावण मास की अमावस्या से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक आता है। रेस्टॉरेंट में यह घटना लगभग 15वीं शताब्दी में हुई थी। इसका समापन आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहारी पर्व से होता है।
गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और विशिष्ट बालिकाएं सिर पर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है। गरबा नृत्य इस पर्व की शान है। पुरुष एवं स्त्रियाँ दो छोटे-छोटे रंग-बिरंगे डांडों को संगीत की लय पर बजाते हुए घूमते-घूमते नृत्य करते हैं। इस अवसर पर भक्ति, फिल्म और पारंपरिक लोक-संगीत सभी का समायोजन होता है। पूजा और आरती के बाद डांडिया रास का आयोजन पूरी रात होता है। नवरात्रि में सोने और गहनों की खरीदारी को शुभ माना जाता है।
बंगाल, ओडिशा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह बंगालियों, उड़िया और आसमिया लोगों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। बंगाल में दशहरा पूरे पांच दिन मनाया जाता है। ओडिशा और असम में चार दिन तक त्योहार है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित दावतों में जगह दी जाती है। देश के नामी कलाकारों को बुलावा कर दुर्गा की मूर्ति तैयार की जाती है। इसके साथ अन्य देवी देवताओं की भी कई मूर्तियां बनीं।
यहां दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। प्रसाद चढ़ाया जाता है और प्रसाद वितरण किया जाता है। पुरुषों में अलिंगन करते हैं जिसे कोलाकुली कहते हैं। स्त्री देवी के मोहरों पर सिन्दूर चढ़ाती हैं और देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इसके साथ ही वे भी सिन्दूर से खेलते हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। अंत में देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। मूर्ति विसर्जन यात्रा बड़ी दर्शनीय होती है।
कश्मीर के अल्पसंख्यक हिंदू नवरात्रि के पर्व को श्रद्धा से मनाते हैं। परिवार के सभी सदस्य वयस्कों को नौ दिन तक पद मिलते हैं। अत्यंत प्राचीन परंपरा के अनुसार आज तक लोग माता खेड भवानी के दर्शन के लिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय के समय विजय काल कहा जाता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।
तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक मनाया जाता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है। सबसे पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है। अगले तीन दिन कला और विद्या की देवी सरस्वती की आराधना होती है और अंतिम दिन देवी शक्ति की देवी दुर्गा की स्तुति होती है। पूजन स्थल पर अच्छे तरह के फूल और दीपक लगाए जाते हैं। लोग एक दूसरे को मीठा और कपड़े देते हैं। यहां दशहरा बच्चों के लिए शिक्षा या कला संबंधी नया कार्य सीखने के लिए शुभ समय होता है।
लेखक: रमेश सुपरमार्केट धमोरा
